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अदालती चाबुक के बिना आज तक नहीं हुई दिल्ली में प्रदूषण से निपटने की पहल

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) की प्रदूषण फैलाने वाले डीजल वाहनों पर सख्ती से ट्रक चालकों से लेकर दिल्ली की सरकार तक सकते में है। लेकिन इस तरह की सख्ती के बिना 70 लाख से ज्यादा वाहनों वाली दिल्ली की आबो-हवा में सुधार की कोई संभावना नहीं दिखती है। ट्रांसपोर्टर हड़ताल करने की तैयारी में हैं […]
Author April 11, 2015 08:52 am
ईमानदार कोशिश होती तो नहीं आती यह नौबत

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) की प्रदूषण फैलाने वाले डीजल वाहनों पर सख्ती से ट्रक चालकों से लेकर दिल्ली की सरकार तक सकते में है। लेकिन इस तरह की सख्ती के बिना 70 लाख से ज्यादा वाहनों वाली दिल्ली की आबो-हवा में सुधार की कोई संभावना नहीं दिखती है।

ट्रांसपोर्टर हड़ताल करने की तैयारी में हैं और दिल्ली सरकार ने कहा है कि वह एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) के राज्यों से सहयोग लेने के लिए सोमवार को इनके साथ बैठक करेगी। इसी तरह की अफरातफरी मार्च-अप्रैल 2001 में दिखी थी जब सुप्रीम कोर्ट ने एक अप्रैल 2001 से केवल सीएनजी से चलने वाली बसों को ही राजधानी में चलाने की इजाजत देने के आदेश दिए थे। हालात ऐसे हो गए थे कि सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था ठप सी होती देख तब की मुख्यमंत्री शीला दाक्षित ने हाथ खड़े कर दिए थे।

पांच अप्रैल 2002 को सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेश के बाद केंद्र और राज्य सरकार सक्रिय हुईं और दिल्ली की पूरी सार्वजनिक सड़क परिवहन प्रणाली सीएनजी पर आ गई। उसी तरह की चुनौती दिल्ली में हर रोज दिल्ली के लिए जरूरी चीजों और दिल्ली होकर एक राज्य से दूसरे राज्य में सामान पहुंचाने वाले ट्रकों और दूसरे माल वाहक वाहनों का है।

वाहन प्रदूषण के खतरों से दिल्ली को अगाह करने से पहले से ही दिल्ली की सीमा से बाहर पेरिफेरियल सड़क बनाने की घोषणा नियमित अंतराल के बाद दिल्ली और केंद्र सरकार से समय समय पर होती रही है। 1993 में दिल्ली में भाजपा की सरकार बनने के बाद जिन प्रमुख मुद्दों पर काम शुरू करने के दावे किए गए थे उसमें एक काम पेरिफेरियल सड़क बनाने का भी था। 1996 में दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे साहिब सिंह वर्मा ने तो इसके लिए नक्शे तक बनवा दिए थे।

सड़क तो नहीं बनी लेकिन प्रस्तावित सड़क के आसपास की जमीन महंगी बिकने लगी। उसके बाद कई बार इसकी घोषणा हो चुकी है और कुछ काम भी होता दिख रहा है। लगातार आबादी बढ़ने से उन सब इलाकों के भी विस्तारित दिल्ली की भीड़ में समाने का खतरा बन गया है। 1996 में ही दिल्ली में प्रदूषण फैलाने वाली एच श्रेणी के उद्योगों को बंद करने का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने किया था।

1996 में ही एक नवंबर को विज्ञान और पर्यावरण केंद्र(सीएसई) ने एक शोधपरक लेख-स्लो मर्डर,द देलही स्टोरी आफ व्हीकुलर पाल्युशन इन इंडिया, छापा। इसमें बताया गया कि वाहन प्रदूषण के मामले में दिल्ली देश में पहले नंबर पर है। इस पर संज्ञान लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 18 नवंबर, 1996 को दिल्ली सरकार को नोटिस दिया और इस बारे में कार्ययोजना पेश करने को कहा। इसी बीच सीएसई ने एक नवंबर 1997 को देश और दुनिया के वैज्ञानिकों की जन सुनवाई आयोजित की। उसमें यह भी बताया गया कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों पर कोई काम नहीं कर रही है।

इस पर दोबारा सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस दिया और दिसंबर में केंद्र सरकार ने इस पर एक श्वेतपत्र जारी किया। इसी के आधार पर कोर्ट ने केंद्र सरकार को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 की धारा-3 के तहत राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लिए एक विशेष एजंसी पर्यावरण प्रदूषण (रोकथाम और नियंत्रण) प्राधिकरण गठित करने के निर्देश दिए। चूंकि पूर्व नौकरशाह भूरेलाल इस प्राधिकरण के अध्यक्ष नियुक्त हुए, इसलिए यह भूरेलाल कमेटी के नाम से भी चर्चित हो गया।

इस कमेटी की शुरुआती रिपोर्टों के बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने 28 जुलाई 1998 को आदेश दिया कि दिल्ली में चलने वाली सभी बसों को धारे-धीरे सीएनजी पर लाया जाए। इसकी आखिरी तारीख 31 मार्च 2001 तय की गई। जाहिर है सरकार अपनी गति से काम करती है इसलिए 31 मार्च की समयसीमा तक केंद्र और राज्य सरकार एक दूसरे पर जिम्मेदारी टालते रहे। सीएनजी बसें मिलने से लेकर दिल्ली में सीएनजी कमी को बहाना बनाया गया और समयसीमा समाप्त होने के समय सरकार हाथ खड़े करने लगी। सुप्रीम कोर्ट ने फिर से एक अप्रैल 2001 को दोनों सरकारों को सख्त आदेश दिए।

आखिर में सीएनजी की लाइनें डलीं, उपलब्धता बढ़ी। बसें भी आने लगी। उसी नाम पर सरकार ने निजी बस मालिकों को किलोमीटर स्कीम के तहत बस लाने को प्रोत्साहित किया। बाद में वे बसें ब्लू लाइन में बदल दी गई और डीटीसी के बसों की कमी के चलते उनका दिल्ली की सड़कों पर एकाधिकार हो गया। उनके कहर को रोकने के लिए फिर अदालत ही आगे आई। कायदे से 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन के लिए मिले पैसों ने दिल्ली में नई परिवहन व्यवस्था बनाने में मदद की। अब तो मेट्रो रेल भी तेजी से फैल रही है और हर रोज 20 लाख से ज्यादा लोगों के लिए परिवहन का साधन बन गई है।

इस बीच वाहनों की संख्या लगातार बढ़ती गई। दिल्ली में भी पुराने डीजल वाहन चलते रहे। सुप्रीम कोर्ट ने 15 साल पुराने डीजल वाहनों पर रोक लगाई। लेकिन इस बीच दिल्ली के पर्यावरण पर आई रिपोर्टों ने दिल्ली की भयावह तस्वीर पेश की। आखिरकार एनजीटी ने सात अप्रैल को दस साल पुराने वाहनों पर रोक लगाने के आदेश दे दिए। अगर वास्तव में पिछले बीस साल से यह प्रयास किया जाता कि दिल्ली होकर एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने वाले वाहनों को दिल्ली के बाहर से ही रास्ता दे दिया जाए यानी पेरिफेरियल सड़क बनाने पर ईमानदारी से कोशिश होती तो आज यह नौबत नहीं आती।

दिल्ली आने वाले बहुत से वाहन तो इस तरह के हैं कि जो दूसरे राज्यों में जाने का कोई और रास्ता नहीं मिल पाने की वजह से यहां आते हैं जबकि दूसरे वे वाहन हैं जो दिल्ली के लिए हर रोज साग-सब्जी, दूध और खाने-पीने का सामान लेकर आते हैं। उनके बिना दिल्ली जी ही नहीं सकती। इस आदेश से प्रभावित वाहन चालकों का कहना है कि दिल्ली के काफी इलाकों में तो उनका प्रवेश है ही नहीं। वे तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश से 15 साल पुराने वाहन हटाने में लगे थे। ऐसे में अचानक 10 साल की सीमा होने से लाखों लोगों की रोजी-रोटी प्रभावित होगी।

यह सभी को पता है कि डीजल वायु प्रदूषण के लिए सबसे घातक है। इसलिए दुनिया के कई दूसरे देशों की तरह डीजल गाड़ियों पर एक सीमा तक पाबंदी तो देर सवेर पूरे देश में ही लगने वाली है। पर सरकार को इसका विकल्प पहले खोजना पड़ेगा। इस मामले में भी अगर केंद्र और दिल्ली की सरकार पहले से सक्रिय होती तो एनजीटी को इस तरह का कड़ा फैसला नहीं देना पड़ता क्योंकि दिल्ली को डीजल के धुंए से मुक्त करवाने के लिए सरकार ने कभी अपनी पहल पर कोई काम किया ही नहीं।

पहले सीएनजी पर व्यावसायिक वाहनों को भी अदालत के आदेश के चलते लाया गया और अब भी दस साल पुराने डीजल वाहनों को दिल्ली में चलने पर पाबंदी लगाने का काम भी अदालत के ही आदेश से होने वाला है। अभी कम कर्मचारियों का रोना रोकर दिल्ली के परिवहन मंत्री ने एनसीआर के राज्यों की सोमवार को बैठक बुलाई है जिससे सभी मिलकर अदालत के फैसले को लागू करा पाएं।

 

मनोज मिश्र

 

 

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