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LIVE: ‘आप’ के लिए आज अहम दिन, केजरीवाल ले सकते हैं सख्त फैसले

आपसी कलह से आम आदमी पार्टी भारी संकट में है। पार्टी के सबसे बड़े नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपने को इस कलह से अलग करने की कोशिश करते हुए दिख रहे हैं। बुधवार को इसी मसले पर चर्चा के लिए राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होने वाली है। आप के तीन वरिष्ठ सदस्यों […]
Author March 4, 2015 12:41 pm
‘आप’ में मचे घमासान पर बैठक आज,

आपसी कलह से आम आदमी पार्टी भारी संकट में है। पार्टी के सबसे बड़े नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपने को इस कलह से अलग करने की कोशिश करते हुए दिख रहे हैं। बुधवार को इसी मसले पर चर्चा के लिए राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होने वाली है। आप के तीन वरिष्ठ सदस्यों – प्रोफेसर आनंद कुमार, पार्टी महासचिव पंकज गुप्ता और दिल्ली सरकार के मंत्री गोपाल राय को भरोसा है कि बुधवार तक विवाद हल करने का रास्ता निकल आएगा।

वरिष्ठ नेता प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव की नाराजगी अभी की ही नहीं है। गाहे-बगाहे हुई कई छोटी-बड़ी घटनाओं ने पार्टी में गुटों की बुनियाद डाली। दूसरी तरफ, यह भी उतना ही सही है कि इस झगड़े से या केजरीवाल के संयोजक पद से हटने या बने रहने से दिल्ली सरकार की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। दरअसल, एक तरफ प्रशांत भूषण व योगेंद्र यादव जैसे नेताओं और केजरीवाल के बीच दूरी बढ़ी, दूसरी तरफ, इसी वजह से मनीष सिसोदिया, आशुतोष, आशीष खेतान और संजय सिंह केजरीवाल के ज्यादा करीबी बनते गए। वे पहले से भी करीबी थे, लेकिन उन्होंने अपनी ज्यादा ताकत केजरीवाल के हिसाब से काम करने में लगाई।

असल में दूसरे खेमे के लोग पार्टी को व्यक्तिवादी बनाने का विरोध करते रहे। पिछले विधानसभा चुनाव में टिकट बांटने की प्रक्रिया बदली गई और हर तरह से संपन्न उम्मीदवारों को टिकट देने का लाभ पार्टी को मिला। दागदार लोगों को टिकट देने का भारी विरोध हुआ। 17 उम्मीदवारों के नाम पर विरोध होने के बाद पार्टी ने प्रोफेसर आनंद कुमार की अगुवाई में आशीष और ऋषिकेश की कमेटी बनाई। उस कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर दो टिकट बदले गए और छह को चेतावनी दी गई। विरोध करने वाले इससे भी संतुष्ट नहीं हुए।

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चुनाव में दो करोड़ रुपए काला धन का मुद्दा भी उठा। चुनावी चंदे में पारदर्शिता लाने की मांग हुई। पैसे लेकर टिकट देने तक के आरोप लगे। इस पार्टी को खड़ा करने में बड़ी भूमिका अदा करने वाले और पार्टी के आंतरिक लोकपाल एडमिरल (रिटायर) रामदास का पत्र लीक होने और उसमें पार्टी की गुटबाजी से लेकर आपसी संवाद खत्म होने जैसे सवालों ने आप के शुभेच्छुओं को परेशान करना शुरू किया। रामदास ने पार्टी की अनेक कमियों का भी अपने पत्र में उल्लेख किया था।

यह सही है कि लोकसभा चुनाव के दौरान ही आप में मतभेद की नींव पड़ गई थी। देश भर में चुनाव लड़ने की पैरवी करने वाले योगेंद्र यादव पर पार्टी में चौतरफा हमला होने लगा। केजरीवाल खुद इतने परेशान हो गए थे कि पार्टी की बैठक में उन्होंने राजनीति तक छोड़ने की पेशकश कर दी थी। तभी से चिट्ठियों से बातचीत शुरू हुई।

यादव की चिट्ठी के जवाब में सिसोदिया की चिट्ठी, फिर माफी और कुल मिलाकर यह साबित-सा हो गया कि मनीष जो लिख रहे हैं, उसमें कहीं न कहीं केजरीवाल की सहमति है। इसीलिए इन नेताओं के तमाम प्रयास के बावजूद पार्टी ने दिल्ली से बाहर चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी। इतना ही नहीं, भाजपा के कुछ नेताओं के कांग्रेस और आप के विधायकों को तोड़कर सरकार बनाने के प्रयास से डरे आप के नेता 20 मई को उपराज्यपाल को विधानसभा भंग न करने के अनुरोध वाला पत्र दे आए थे।

जबकि वे ही सुप्रीम कोर्ट में विधानसभा भंग करवाने का मुकदमा लड़ रहे थे। असहज स्थिति होने पर उन्होंने दूसरे ही दिन अपनी गलती मान कर विधानसभा भंग करने की मांग कर डाली। यह फैसला भी कुछ ही लोगों का था।

इस बार हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में देश भर के लोग लगे। नतीजे अनुमान से अच्छे आए। लेकिन चुनाव ने आप के नेताओं में खटास बढ़ा दी। योगेंद्र यादव को पार्टी संयोजक बनाने या केजरीवाल पर ‘एक पद-एक व्यक्ति’ का नियम लागू करने की सलाह देने वाला शांतिभूषण का बयान तो अभी आया, इससे पहले भी उन्होंने पार्टी के कामकाज पर सवाल उठाए थे। ऐसे बयानों को लेकर राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) के सदस्य और उनके पुत्र प्रशांत भूषण पर भी सवाल उठने लगे। काफी समय तक बात ढकी रही, लेकिन अब सार्वजनिक हो गई कि प्रशांत भूषण के विचार भी अपने पिता से अलग नहीं हैं।

दूसरा पक्ष अब इसे खुल कर कहने लगा है कि 14 फरवरी को शपथ ग्रहण के बाद केजरीवाल ने दिल्ली से बाहर पार्टी को ले जाने को अहंकार बताया, वह सीधा हमला यादव और प्रशांत भूषण पर था। बावजूद इसके यादव लगातार पार्टी को देश भर में ले जाने की बात करते रहे। इसमें कहीं न कहीं विचारों की भी लड़ाई दिखने लगी है। केजरीवाल और उनके करीबी पार्टी को दिल्ली में ही केंद्रित करना चाहते हैं जबकि दूसरे लोग भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र सरकार के खिलाफ देश भर में चल रहे विरोध को एकजुट कर आंदोलन चलाना चाहते हैं। पार्टी बनने की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही पार्टी सत्ता में आ गई। पार्टी की सर्वोच्च संस्था राष्ट्रीय कार्यकारणी है जिसमें महज 23 लोग थे। शाजिया इल्मी और अशोक अग्रवाल के इस्तीफे के बाद यह संख्या 21 रह गई है, जिसमें अनेक राज्यों और समुदायों की भागीदारी ही नहीं है। इसी तरह हर रोज के कामकाज पर नजर रखने के लिए बनी पीएसी में न कोई महिला है और न ही पड़ोस के राज्यों के प्रतिनिधि।

अब तक तो यही माना जा रहा है कि पीएसी से योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण आदि की विदाई होगी क्योंकि विवाद ने तमाम सीमाओं को लांघ दिया है। केजरीवाल के मन के खिलाफ ज्यादातर लोग नहीं जा सकते हैं। केजरीवाल ने इन दोनों के साथ सख्त रवैया अपनाने के संकेत दिए हैं। केजरीवाल के पुराने साथियों में से एक संजय सिंह ने पार्टी के अंदरूनी संवादों वाले पत्रों को लीक करवाए जाने को लेकर दुख जताया। पिछले कई दिनों से चल रहे आरोप प्रत्यारोप और सफाई के बीच सुलह की कोशिश करने वालों ने अभी हार नहीं मानी है।

आनंद कुमार कहते हैं कि सब कुछ ठीक हो जाएगा। पार्टी को कोई भी नेता कमजोर करना नहीं चाहता है। बुधवार को कार्यकारणी होने तक माहौल बदलने का कोशिश हो रही है। संभव है कि तत्काल कोई कारवाई न हो और पार्टी को होने वाले नुकसान को कम करने की कोशिश की जाए। इसीलिए यह भी संभव है कि पार्टी में टूट बचाने के लिए खुद केजरीवाल कहीं पार्टी संयोजक पद छोड़ने की पेशकश न कर दें। हालांकि वे कह चुके हैं कि बुधवार की इस बैठक में शामिल नहीं होंगे।

 

मनोज मिश्र

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