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हादसे का सबक

दक्षिणी दिल्ली के एंड्रयूजगंज इलाके में बुधवार को अचानक लगी आग से कई झुग्गियां खाक हो गर्इं। इससे यही साबित हुआ कि बार-बार ऐसे हादसे होने के बावजूद एक ओर जहां स्थानीय लोग सावधानी बरतना जरूरी नहीं समझते, वहीं राजधानी में चाक-चौबंद व्यवस्था का दावा करने वाला प्रशासन भी लापरवाह बना रहता है। एक झुग्गी […]
Author November 7, 2014 15:23 pm

दक्षिणी दिल्ली के एंड्रयूजगंज इलाके में बुधवार को अचानक लगी आग से कई झुग्गियां खाक हो गर्इं। इससे यही साबित हुआ कि बार-बार ऐसे हादसे होने के बावजूद एक ओर जहां स्थानीय लोग सावधानी बरतना जरूरी नहीं समझते, वहीं राजधानी में चाक-चौबंद व्यवस्था का दावा करने वाला प्रशासन भी लापरवाह बना रहता है। एक झुग्गी में अचानक आग लगी और देखते ही देखते बस्ती के बड़े हिस्से में फैल गई। उसने दो दर्जन से ज्यादा झुग्गियों को अपनी चपेट में ले लिया। राहत की बात है कि इस हादसे में कोई हताहत नहीं हुआ। लेकिन प्रशासन की शिथिलता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सूचना मिलने के बाद अग्निशमन दल को घटनास्थल पर पहुंचने में आधे घंटे से ज्यादा वक्त लगा। जबकि यह झुग्गी बस्ती एक संभ्रांत इलाके के पास है। दमकल के आने तक स्थानीय लोग आपसी सहयोग से आग बुझाने की कोशिश करते रहे। लेकिन आग लगने की घटना में इतनी देरी बहुत कुछ खाक कर देने के लिए काफी होती है। यही वजह है कि इसके बाद आग इतनी फैल चुकी थी कि उस पर काबू पाने में दो घंटे से ज्यादा का समय लग गया। यह कोई नई बात नहीं है। ज्यादातर घटनाओं में आग बुझाने वाली गाड़ियां काफी नुकसान हो जाने के बाद पहुंचती हैं। यह अपने आप में अग्निशमन सेवा की एक बड़ी खामी की ओर संकेत करता है। पर यह भी तथ्य है कि घटना स्थल तक पहुंचने के रास्ते में कबाड़ और लकड़ी का ढेर जमा था, जिसके चलते अग्निशमन वाहनों को प्रवेश में दिक्कत हुई। सवाल है कि प्रशासनिक महकमों से जुड़े जो अधिकारी या कर्मचारी सड़कों से लेकर गलियों तक में मामूली अतिक्रमण जैसी स्थितियों को नियंत्रित करते दिखते हैं, उन्हें इस झुग्गी बस्ती की ओर रुख करना क्यों जरूरी नहीं लगा। आग से बचाव सहित किसी भी आपात स्थिति में सुरक्षा इंतजामों को सुनिश्चित करना, अग्नि सुरक्षा अधिनियम के तहत उनकी जांच और उन पर निगरानी रखना और दोषियों को कठघरे में खड़ा करना आखिर किसकी जिम्मेदारी है?

सब जानते हैं कि हर साल गरमी का मौसम शुरू होते ही झुग्गी बस्तियों में आग लगने की घटनाएं बढ़ जाती हैं। ऐसे हर हादसे के बाद प्रशासन की ओर से आगे सावधानी बरतने का भरोसा दिलाया जाता है। लेकिन कुछ दिनों की सक्रियता के बाद फिर सब कुछ पहले जैसी कोताही और अव्यवस्था के हवाले हो जाता है। निस्संदेह आग से बचाव के प्रति लोगों में जागरूकता का अभाव ऐसी घटनाओं के पीछे एक बड़ा कारण है। पर किसी भी हादसे का सबक यही है कि वे सारे एहतियाती उपाय किए जाएं, जिनसे भविष्य में वैसी स्थिति नहीं आए। झुग्गी बस्तियों में रहने की दुश्वारियों को देखते हुए और गैर-कानूनी तरीके से बस्तियां बसा लेने की समस्या पर काबू पाने के मकसद से काफी समय से कमजोर तबके के लिए रिहाइशी कॉलोनियां बसाने पर जोर दिया जाता रहा है। शीला दीक्षित सरकार ने झुग्गी बस्तियों में रहने वालों को सस्ते घर उपलब्ध कराने की महत्त्वाकांक्षी योजना शुरू तो की थी, पर उससे अपेक्षित नतीजे नहीं निकल सके। जब तक झुग्गी बस्तियों के लिए पक्के मकानों और साफ-सुथरे वातावरण में रहने की व्यवस्था बनाने को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई जाती, इन लोगों को आग लगने से दर-बदर होने और संक्रामक बीमारियों से जूझते रहने जैसे संकटों से निजात दिलाना संभव नहीं हो सकता।

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