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मोदी या गडकरी ही नहीं, चुनावी वादों को जुमला साबित करने में नीतीश, केजरीवाल और बाकी नेताओं का भी समान हाल

बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने अच्छे दिन के नारे को गले में अटकी हड्डी बताया है।
नरेंद्र मोदी (बाएं), अरविंद केजरीवाल (दाएं ऊपर) और नीतीश कुमार।

पुरानी राजनीतिक कहावत है कि जनता की याद्दाश्त बहुत कमजोर होती है। कोई और इस पर यकीन करे न करे राजनेताओं को इस कहावत पर शायद पूरा यकीन होता है। लेकिन अब ऐसा लगने लगा है कि डिजिटल युग में इस कहावत को बदलना पड़ेगा। अब वो जमाना गया जब नेता भीड़ भरी जनसभाओं में जनता को वादों का झुनझुना थमाकर वोट बटोरते थे। चुनाव जीतने के बाद उन्हें भूले से भी अपने वादों की याद नहीं आती थी। अखबारों की कतरनों, वीडियो ऑर्काइव या रोजमर्रा की जद्दोजहद के तले दबी जनस्मृति में अगर वो वादे दर्ज होते भी थे तो उन्हें आईना बनाकर नेताओं के सामने पेश करना बहुत मुश्किल होता था। लेकिन डिजिटल क्रांति ने जनता की मुश्किल को नेताओं के गले की मुसीबत बना दिया है।अब नेताओं के वादे समय की खाई में गिरकर गुम नहीं हो जाते बल्कि वो डिजिटल लोक में जुगनुओं की तरह चमकते रहते हैं। बहरहाल, आइए एक नजर डालते हैं कि ऐसे वादों-नारों पर जिनका नेताओं ने बस इस्तेमाल किया, उन पर अमल नहीं किया।

बीजेपी के “अच्छे दिन” 

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने 2014 के आम चुनाव में इस नारे को केंद्र में रख कर कई विज्ञापन बनवाए थे और उनका रियल और डिजिटल वर्ल्ड दोनों में खूब प्रचार किया था। चुनाव में भारी बहुमत हासिल करने के बाद नरेंद्र मोदी का पहला ट्वीट था, “India has won! भारत की विजय। अच्छे दिन आने वाले हैं।” मोदी का ये ट्वीट उस साल के सबसे ज्यादा बार री-ट्वीट किए जाने वाले ट्वीट में शामिल था। इतना ही नहीं आम चुनाव जीतने के बाद पीएम मोदी ने अपनी पहली सार्वजनिक रैली में उपस्थित श्रोताओं को आश्वस्त किया कि “अच्छे दिनों का अब इंतजार नहीं करना। अच्छे दिन आ गए हैं।”

लेकिन अब पार्टी के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी अच्छे दिन के नारे को गले में लटकी हड्डी बता रहे हैं। इतना ही नहीं गडकरी ने इसे मूलतः कांग्रेसी नेता और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का दिया हुआ नारा बताया। किसी को भी उम्मीद नहीं रही होगी कि “अच्छे दिन” की आस में जिस पार्टी और नेता को वोट दे रहे हैं वो अपना आधा कार्यकाल पूरा करते करते ही उससे छुटकारा पाने की कोशिश करेगी। गडकरी ने तो  यहां तक कह दिया कि अच्छे दिन कभी नहीं आते।

बीजेपी का “काला धन”

2014 के लोक सभा चुनाव में बीजेपी ने भ्रष्टाचार और विदेशों में रखे “काला धन” को प्रमुख मुद्दा बनाया था। पार्टी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी तक ने जनता से वादा किया कि अगर वो सत्ता में आए तो 100 दिनों के अंदर विदेशों में रखा “काला धन” वापस लाएंगे और अगर वो पैसा वापस आ गया तो देश में हर आदमी के बैंक खाते में 15-20 लाख रुपये आ सकते हैं। चुनाव हुए और बीजेपी पूर्ण बहुमत से सत्ता में आ गई। बीजेपी कुछ ही महीनों में सत्ता में अपने 1000 दिन पूरे कर लेगी लेकिन बीजेपी ने जितना “काला धन” वापस लाने का वादा किया था उसका अता-पता नहीं चल रहा है।

इंतजार की आदी जनता शायद कुछ और इंतजार कर लेती लेकिन बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने उसका दिल ये कहकर तोड़ दिया कि “काला धन” चुनावी जुमला था। ऐसे में मुसीबत ये हो गई कि जनता को समझ नहीं आ रहा है कि उनके बाकी वादों को वो क्या समझे, जुमला?

अपराध मुक्त रहे बिहार, फिर एक बार नीतीश कुमार

राजनीति को संभावनाओं की कला कहते हैं और इसे एक साबित किया 2015 में हुए बिहार विधान सभा चुनाव ने। करीब 10 साल तक बीजेपी के साथ गठबंधन सरकार चलाने वाले नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जदयू ने अलग राह लेते हुए अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी लालू यादव और उनकी पार्टी राजद से हाथ मिला लिया। चुनाव से पहले हुए इसे गठबंधन को राजनीतिक जानकार बेमेल जोड़ मान रहे थे। लालू यादव के कार्यकाल को “जंगल राज” बता चुके नीतीश पर ये साबित करने का दबाव था कि उनके और लालू के गठबंधन को सत्ता मिलने पर बिहार में अपराध को बढ़ावा नहीं मिलेगा। इसी के चलते नीतीश कुमार ने नारा दिया  “अपराध मुक्त रहे बिहार, फिर एक बार नीतीश कुमार” और पूर्ण बहुमत से चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बने.

नीतीश कुमार के सत्ता संभालते ही बिहार सबसे ज्यादा आपराधिक घटनाओं को लेकर सुर्खियों में आता रहा है। ताजा मामला माफिया सरगना मोहम्मद शहाबुद्दीन के 11 साल बाद जमानत पर जेल से रिहा होने का है। इतना ही नहीं सीवान के एक पत्रकार की हत्या में जांच के घेरे में आए एक शॉर्पशूटर की पहले शहाबुद्दीन और बाद में लालू यादव के बेटे और राज्य में मंत्री तेज प्रताप यादव के साथ आई तस्वीर ने सोशल मीडिया मे हंगामा मचा रखा है। इससे पहले महज एक साल में नीतीश सरकार पत्रकार की हत्या, विधायक के बेटे द्वारा मामूली झड़प में गोली मारने और कारोबारी के अपहरण इत्यादि को लेकर सवालों में घिर चुकी है। जाहिर है नीतीश कुमार अपना चुनाव से पहले किया वादा भूल चुके हैं।

अरविंद केजरीवाल का न लाल बत्ती, न सरकारी आवास

अरविंद केजरीवाल ने जब अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार मिटाने के लिए शुरू हुए जनलोकपाल आंदोलन से अलग होकर आम आदमी पार्टी के तौर पर राजनीतिक पार्टी बनायी तो उन्होंने दिल्ली को अपना केंद्र बनाया। केजरीवाल ने 2013 में हुए दिल्ली चुनाव में जनता से वादा किया कि वो उनके विधायक और मंत्री न लाल बत्ती लेंगे और न ही सरकारी आवास लेंगे। वो आम आदमी के बीच आम लोगों की तरह रहकर जनता की सेवा करेंगे। चुनाव से पहले दिल्ली में पोस्टर नजर आने लगे जिनमें दावा किया गया कि मुकाबला आम आदमी और नेताओं के बीच है।

जनता ने “आम आदमी” को चुना। केजरीवाल और उनकी पार्टी को अपने पहले ही चुनाव में दिल्ली की कुल 70 सीटों में से 28 पर जीत मिली। उन्होंने जिस कांग्रेस के खिलाफ लड़कर चुनाव जीता था उसी के समर्थन से सरकार भी बना ली। हालांकि ये सरकार महज 49 दिन ही चली। दोबारा 2015 में केजरीवाल पुराने नारे और इरादों के साथ ही चुनावी अखाड़े में उतरे। इस बार उन्हें प्रचण्ड बहुमत मिला और उन्होंने 67 सीटों पर जीत हासिल की। लेकिन महज दो सालों में केजरीवाल और उनकी पार्टी अपने लाल बत्ती और सरकारी आवास न लेने के वादे को भूल चुकी थी।

इंदिरा गांधी का गरीबी हटाओ

भारत की पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेसी नेता इंदिरा गांधी का नारा “वो कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूं गरीबी हटाओ” शायद भारतीय राजनीतिक इतिहास के सबसे प्रसिद्ध नारों में से एक है। 1971 के आम चुनाव से पहले दिया गया “गरीबी हटाओ” के नारे का इतना जबरदस्त असर हुआ कि चुनाव से पहले अंदरूनी कलह और साख के संकट से जूझ रही इंदिरा अपने सभी विपक्षियों को पटकनी देने में कामयाब रहीं। इंदिरा और उनकी पार्टी कांग्रेस ने “गरीबी हटाओ” हटाओ के नारे को कितनी गंभीरता से लिया इसका पता इस बात से चलता है कि 2004 के आम चुनाव में बीजेपी गठबंधन के खिलाफ कांग्रेस ने नारा दिया, “कांग्रेस का हाथ, गरीब के साथ” और वो सबसे अधिक सीटें जीतकर सरकार में बनाने में कामयाब रही। इतना ही नहीं 2017 के यूपी विधान सभा चुनावों के मद्देनजर किसान यात्रा और खाट सभा कर रहे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि वो “किसान, मजदूर और गरीबों” के लिए लड़ रहे हैं।

कांग्रेस की गरीबी से इस 40 सालों से लम्बी लड़ाई का परिणाम क्या रहा, ये किसी को बताने की जरूरत नहीं है। इन पांच दशकों में सबसे अधिक समय तक देश की सत्ता में कांग्रेस पार्टी ही सत्ता में रही है। फिर भी विश्व बैंक के 2014 के आंकड़ों के अनुसार दुनिया की 20 प्रतिशत से अधिक बेहद गरीब लोग भारत में रहते हैं। इतना ही नहीं दुनिया का हर छठवां बंधुआ मजदूर भी भारत में रहता है।

Blog: नितिन गडकरी जी, “अच्छे दिन” अगर गले की हड्डी है तो पीएम मोदी से क्‍यों नहीं कहते कि इसे निकाल फेंकें

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  1. A
    anand prakash
    Sep 15, 2016 at 1:58 pm
    I will saport this reality articles
    (0)(0)
    Reply
    सबरंग