December 03, 2016

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13 साल बाद वही जज, वही याची, वही फिल्म और राष्ट्रगान का मुद्दा लेकिन फैसला?

साल 2003 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जज के तौर पर जस्टिस दीपक मिश्रा ने करण जौहर की फिल्म से राष्ट्रगान वाला दृश्य हटाने का आदेश दिया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फैसला पलट दिया था।

जस्टिस दीपक मिश्रा (बीच में) मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जज रह चुके हैं।

बुधवार (30 सितंबर) जब सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस दीपक मिश्रा के नेतृत्व वाली पीठ ने श्याम नारायण चौकसे की याचिका पर फैसला सुनाते हुए देश के सभी सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान चलाए जाने का आदेश दिया तो सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। लेकिन ये पहला मौका नहीं था जब जस्टिस मिश्रा याची श्याम नारायण चौकसे की राष्ट्रगान के “अपमान” संबंधी याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। 13 साल पहले जब जस्टिस दीपक मिश्रा मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में जज थे तब भी उन्होंने राष्ट्रगान को सम्मान देने से जुड़ी याचिका की सुनवाई की थी। उस मामले में भी अदालत में याचिका दायर करने वाली याची श्याम नारायण चौकसे ही थे। खास बात ये है कि 13 सालों बाद जस्टिस मिश्रा का फैसला भी लगभग वही रहा।

इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए चौकसे ने इसे “महज संयोग” बताया कि सुप्रीम कोर्ट में उनकी जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई जस्टिस मिश्रा की पीठ ने की। चौकसे ने दावा किया कि उन्होंने अपनी याचिका में राष्ट्रगान के अपमान के कई हालिया उदाहरणों के साथ विभिन्न अदालतों के पुराने फैसलों का भी जिक्र किया था। चौकसे ने साल 2003 में चौकसे ने निर्माता-निर्देशक करण जौहर की फिल्म “कभी खुशी कभी गम” में राष्ट्रगान का अपमान का मुद्दा अदालत में उठाया था। चौकसे ने अपनी याचिका में दावा किया था कि फिल्म में एक दृष्य में राष्ट्रगान को कमतर करके दिखाया गया है। चौकसे ने अदालत में ये शिकायत भी की थी कि जब राष्ट्रगान शुरू हुआ तो सिनेमाघर में कोई खड़ा भी नहीं हुआ।

चौकसे की याचिका पर सुनवाई करते हुए जुलाई 2003 में डिविजन बेंच के फैसले में जस्टिस मिश्रा ने राज्य के सभी सिनेमाघरों को आदेश दिया था कि फिल्म को तब तक न दिखाया जाए जब तक कि राष्ट्रगान वाले कथित दृश्य को हटा न दिया जाए। जस्टिस मिश्रा ने अपने फैसले में उस दृश्य को “राष्ट्रीय चरित्र के विपरीत और राष्ट्रीय भावनाओं को आहत करने वाला” बताया था। हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने 2004 में खारिज कर दिया था लेकिन जब चौकसे ने एक पुनर्विचार याचिका दायर की तो सर्वोच्च अदालत उस पर फिर से विचार करने को तैयार हो गई। नवंबर 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म को बगैर किसी दृश्य को हटाए सिनेमाघरों में दिखाए जाने की इजाजत दे दी थी।

हाई कोर्ट के जज के तौर पर जस्टिस मिश्रा ने अपने फैसले में लिखा था, “राष्ट्रगान का किसी भी तरह अपमान करने को राष्ट्रविरोधी गतिविधि माना जा सकता है।” हाई कोर्ट ने कहा था कि किसी को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर पूर्ण निजी स्वतंत्रता के सिद्धांत का प्रतिपादन करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था, “राष्ट्रगान भारत का सम्मान, गर्व और प्रतीक है और मूलतः ये भारत की संप्रभुता और अखंड़ता का प्रतीक है, इसलिए हर नागरिक के लिए इसका सम्मान करना जरूरी है।” हाई कोर्ट के फैसले में जस्टिस मिश्रा ने ये भी कहा था कि ये कहना सही नहीं है कि फिल्म में राष्ट्रगान गाए जाने पर दर्शकों का खड़ा होना जरूरी नहीं है लेकिन तब उन्होंने इस मामले पर कोई आदेश नहीं दिया था।

वहीं करण जौहर की फिल्म पर हाई कोर्ट में दिए जस्टिस मिश्रा के फैसले के खिलाफ याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वीएन खरे के नेतृत्व वाली तीन जजों की बेंट ने 19 अप्रैल 2004 को हाई कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया था। जस्टिस खरे ने अफने फैसले में कहा था कि फिल्म में राष्ट्रगान गाए जाने पर दर्शकों का खड़ा होना जरूरी नहीं है। चौकसे की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए 31 अक्टूबर 2005 को सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आरसी लाहोटी ने चौकसे की पुनर्विचार याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि इस मामले के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं जिस पर अदालतक को विचार करना होगा।  बाद में ये मामला 15 नवंबर 2006 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वाईके सब्बरवाल के नेतृत्व वाली तीन सदस्यीय पीठ के सामने आया।  इस बार अदालत ने यह कहते हुए फैसला आगे के लिए टाल दिया कि इस मामले में कानून साफ नहीं हैं और इस पर उचित मामले में विचार किया जाएगा।

 

वीडियोः चर्चा: फिल्म से पहले सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य

वीडियोः सुप्रीम कोर्ट का आदेश- सिनेमाघरों में फिल्म शुरु होने से पहले बजाया जाए राष्ट्रीय गान

 

 

 

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First Published on December 1, 2016 8:36 am

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