December 08, 2016

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आपका कौशल और क्षमता का नाम है लक्ष्मी

जिसे लक्ष्मी का अनुग्रह प्राप्त नहीं होता वह सुप्त, पिछड़ा, दरिद्र, दुर्बल व बेचैन रह जाता है। इसके ऊपर की समृद्धि "ह्रींकार" कहलाती है। इसमें जड़ता लुप्त है।

लक्ष्मी को धन, संपदा, समृद्धि और ऐश्वर्य की देवी माना जाता है।

कार्तिक मास की अमावस्या सिर्फ़ साधारण अंधेरी निशा नहीं है। इस निशा में तो उषा की प्रवृत्ति समाहित है। इसीलिये तो ये रात्रि महानिशा यानि दीपावली कहलाती है। इस रात में जीवन को बदल देने वाला गुण धर्म पाया जाता है। दीपावली के दीपक को मिट्टी का दीया या स्थूल दीप भर समझना उचित नहीं है। दिवाली के दीपक का आशय तो नीयत है, मंशा है। जिसकी नियत साफ़ है, वही समृद्धि का वाहक है। यह दीपक तो समृद्धि का बस एक सूत्र मात्र है। यह स्थूल जगत स्थूल पदार्थों से निर्मित है। जब से ये सृष्टि बनी तभी से ये स्थूल रसायन भी निर्मित हुए और तब से लेकर आज तक यहीं विद्यमान हैं। काल और परिस्थितियों के साथ समय समय पर मनुष्य इनमें अपने सुख और आनंद खोजता रहा, ढूढता रहा और इन्ही भौतिक संसाधनों को वो अपनी समृद्धि समझता रहा। इन्ही में से कुछ चमकीले तत्वों को समय समय पर वो धन का नाम देता रहा। ये अलग बात है कि उसकी धन कि परिभाषा समय समय पर बदलती रही। ग्रंथों में वर्णन प्राप्त होता है कि भौतिक संसाधनों की ही प्राप्ति के लिए सकारात्मक और नकारात्मक शक्तियों नें मिलकर समुद्र को मथा, खंगाला और परिणाम स्वरूप नकारात्मक और सकारात्मक दोनो ऊर्जा प्राप्त हुई। जिसे अमृत, धन या लक्ष्मी जैसे अलन्कारों से नवाज़ा गया, जिसने कालांतर में ज़िन्दगी की सूरत भी बदली और मआनी भी। वो मंथन वस्तुतः बाह्य समुद्र से ज्यादा आंतरिक महा समुद्र का मंथन अधिक प्रतीत होता है। शायद वह मंथन भौतिक न होकर कार्मिक था, या आध्यात्मिक था।

लक्ष्मीः कौस्तुभपारिजातकसुराधन्वन्तरिश्चन्द्रमाः।
गावः कामदुहा सुरेश्वरगजो रम्भादिदेवाङ्गनाः।
अश्वः सप्तमुखो विषं हरिधनुः शङ्खोमृतं चाम्बुधेः।
रत्नानीह चतुर्दश प्रतिदिनं कुर्यात्सदा मङ्गलम्।

मंथन में जो भी रत्न निकले, उन समस्त रत्नों में दरअसल हमारी सुप्त कामना ही नज़र आती है| हमारे लिये इस भौतिक जगत में समृद्धि का पैमाना सिर्फ़ भौतिक पदार्थ ही हैं पर उसके सूत्र सिर्फ़ हमारे कर्मों से जुड़े हुए हैं। हम इसी भौतिक समृद्धि को ‘श्री’ या ‘लक्ष्मी’ कहते है। लक्ष्मी शब्द से संपत्ति का बोध होता है। दरअसल पदार्थों और तत्वों को मानव के लिए प्रचुर मात्रा में उपलब्ध कराने और उपयोगी बनाने की “क्षमता” और तकनीकी ज्ञान को ही ‘लक्ष्मी’ कहा जाता है। जिसे कम संसाधनों का भरपूर लाभ उठाने की कला आती है, बस वही ‘श्रीमान’ है। अन्यथा बाकी सब तो धनिक या धनवान है।

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लक्ष्मी को धन, संपदा, समृद्धि और ऐश्वर्य की देवी माना जाता है। आध्यात्म में गायत्री के साधन क्रम एवं तत्व दर्शन की धारा को ‘श्रृंकार’ यानि ‘श्री’ या लक्ष्मी कहते है। लक्ष्मी की उपासना से मन-मस्तिष्क और चेतना के अंदर सोई पड़ी क्षमताएं और कुशलताएं सक्रीय होने लगाती हैं,जागृत होने लगती हैं। मनुष्य की उसी योग्यता, क्षमता और गुण के आकर्षण से खिंचकर ऐश्वर्य, समृद्धि और वैभव स्वमेव चला आता है।

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मान्यताएं कहती हैं कि कार्तिक मास की अमावस्या को लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था। उसके एक दिन पहले काली का। उसके भी एक दिन पहले यानी त्रयोदशी को धनवंतरी और उसके भी एक दिन पहले यानि द्वादशी को कामधेनु का प्रादुर्भाव हुआ था। तंत्र लक्ष्मी को ‘सकार’ या ‘श्रृंकार’ कहता है। “सकार” यानी भौतिक समृद्धि, जड़ समृद्धि। लक्ष्मी की अनुकम्पा से ही वसुंधरा पर , आनंद, ऐश्वर्य, उल्लास और समृद्धि के सूत्र प्रकट होते हैं। जिसे लक्ष्मी का अनुग्रह प्राप्त नहीं होता वह सुप्त, पिछड़ा, दरिद्र, दुर्बल व बेचैन रह जाता है। इसके ऊपर की समृद्धि “ह्रींकार” कहलाती है। इसमें जड़ता लुप्त है। ह्रींकार के सूत्र माया में छिपे हैं। स्थूल जगत की पहुँच माया तक नहीं है। माया ब्रम्ह का विपरीत सूत्र है।

“लक्ष्मी के धागे नीयत, सद्आचरण, क्षमा और परोपकार में गुंथे हुए हैं। धन और पदार्थ हस्तगत करनें कि प्रत्यक्ष पद्धति कुछ भी प्रतीत होती हो, पर इसके रहस्य तो सिर्फ कर्म में ही छिपे हुए हैं. आध्यात्म में धन प्राप्ति का सिरा पूर्व के कर्मों से जुड़ा दिखाई देता है. धन का प्रचुर मात्रा में होना ही ऐश्वर्य और सुख का परिचायक नहीं है। बुद्धि और विवेक के के अभाव में धन व्यक्ति के पराभव का भी कारण बन सकता है।”

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तंत्र के अनुसार लक्ष्मी का आसन कमल है। कमल स्वयं में ही मधुरता का प्रतीक है जो कीचड़ में उत्पन्न होकर भी उपासना में शामिल है। जो स्वयं चारों ओर से त्यज्य पदार्थों से घिरा होने के बावजूद भी मासूम है, कोमल है, पवित्र है। लक्ष्मी स्त्री स्वरूपा हैं। क्योंकि स्त्री स्वयं में शक्ति का पुंज है। उनके मुखारविन्द पर ऐश्वर्यमयी आभा है। उनका एक मुख और चतुर्हस्त, दरअसल एक लक्ष्य और चार विचारों (दूर दृष्टि, दृढ़ संकल्प, नियम/अनुशासन, परिश्रम) को प्रतिबिंबित करते हैं।

लक्ष्मी की मुद्रा में समाहित संदेश शायद यही है कि यदि दूरदृष्टि और दृढ़ संकल्प के साथ अनुशासन पूर्वक पूर्ण शक्ति व सामर्थ्य से किसी भी कार्य को किया जाए तो सफलता अवश्य उसका चरण चुम्बन करती है और लक्ष्मी सदैव उसके पास विराजमान रहती हैं। लक्ष्मी की आशीर्वाद मुद्रा से अनुग्रह और अभय तथा दान मुद्रा से उनकी उदारता का भी बोध होता है। यानि ये मुद्रा धन हासिल करने की बड़ी शर्त प्रतीत होती हैं। उनके हस्त में कमल उनके सौंदर्य को परिलक्षित करते हैं।

लक्ष्मी के तीन वाहन कहे जाते हैं, उलूक, गज और गरुण।
-उलूक नकारात्मक परिस्थितियों में सकारात्मक सोच का प्रतीक है। वह भीड़ से हटकर विचार करने की शक्ति की तरफ इशारा करता है। अर्थात वह तब देखने की क्षमता रखता है जब सामान्य जन को नज़र नहीं आता। यह प्रवित्ति नितांत व्यापारिक है. उलूक निर्भयता व क्षमता का भी प्रतीक है।
-गज बुद्धिमत्ता व शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। वह शक्तिशाली परंतु विनम्र जीव है। वह इशारा करता है कि शक्ति सदैव विनम्रता में ही लिपटी हुई है। या शक्तिशाली व्यक्ति सदैव विनम्र होता है। उसे अपनी शक्ति के प्रदर्शन की आवश्यक्ता नहीं होती।
– गरुण लक्ष्मी के पति का वाहन होने के कारण लक्ष्मी का वाहन कहा जाता है। गरुण अपनी दूरदृष्टि, एक लक्ष्यता, दृढ़ता और कुशलता का प्रतीक है।

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लक्ष्मी का अभिषेक करने वाले दो गजराज मनोयोग और श्रम की ओर इशारा करते हैं। अगर लक्ष्मी को व्यावहारिक रूप से समझें तो लक्ष्मी भौतिक संसाधन प्राप्ति की वह क्षमता हैं, जो दूरदृष्टि, अलग सोच, मनोयोग, संकल्प शक्ति, श्रम, अनुशासन, विनम्रता, उदारता और अभयता से ही प्राप्त होती है। आवश्यकता है स्वयं के अन्दर परिवर्तन की। तंत्रशास्त्र की मान्यताएं भक्तिमार्ग से अलग है। तंत्रशास्त्र के सूत्र नीति से हटकर वैज्ञानिक हैं और हठयोग पर आधारित है। तंत्र यानी विज्ञान अपनी तकनीकी क्षमता से लक्ष्मी को और समस्त भौतिक वैभव को हासिल कर लेना चाहता है। तंत्रशास्त्र की पद्धति टेक्निकल है, वैज्ञानिक है। दीपावली का काल अपनें लक्ष्य सिद्धि का काल है, चेतना को चेतन से जोड़ने का काल है| स्वयं के उत्थान का काल है।

(यह आध्यात्मिक गुरु एवं ज्योतिषिय चिंतक सदगुरु आनन्द जौहरी के विचार हैं।)

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First Published on October 29, 2016 9:12 am

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