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चुइंगम के ज़्यादा इस्तेमाल से पाचन तंत्र पर बुरा असर

इस शोध का प्रकाशन पत्रिका 'नैनोइम्पैक्ट' में किया गया है।
Author , न्यूयॉर्क/नई दिल्ली | February 21, 2017 19:26 pm
चुइंगम की थोड़ी मात्रा ज्यादा प्रभाव नहीं डालती, लेकिन दीर्घकालिक प्रयोग आंत की कोशिकाओं के अवशोषण के उभारों को कम कर सकती है। (फाइल फोटो)

चुइंगम से लेकर ब्रेड तक में डाले जाने वाले संरक्षक पदार्थो से छोटी आंत की कोशिकाओं के पोषक पदार्थो के शोषित करने की क्षमता और रोगाणुओं को रोकने की क्षमता में कमी आ सकती है। शोध के मुताबिक, टाइटेनियम डाईऑक्साइड यौगिक का अंतर्ग्रहण करीब टाला नहीं जा सकता। यह हमारे पाचन तंत्र में टूथपेस्ट के जरिए पहुंच सकता है, जिसमें टाइटेनियम डाईऑक्साइड सफाई के लिए इस्तेमाल किया जाता है। ऑक्साइड का इस्तेमाल कुछ चॉकलेटों में चिकनाहट लाने के लिए भी किया जाता है।

न्यूयॉर्क के बिंघमटन विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर ग्रेतचेन महलेर ने कहा, “टाइटेनियम ऑक्साइड एक आम खाद्य संरक्षक है और लोग इसे एक लंबे समय से अधिक मात्रा में खाते आ रहे हैं, चिंता मत कीजिए यह आपको मारेगा नहीं, लेकिन हम इसके दूसरे सूक्ष्म प्रभावों में रुचि रखते हैं और समझते हैं कि लोगों को इस बारे में जानना चाहिए।”

शोधकर्ताओं ने कोशिका कल्चर मॉडल के जरिए छोटी आंत का अध्ययन किया। चुइंगम की थोड़ी मात्रा ज्यादा प्रभाव नहीं डालती, लेकिन दीर्घकालिक प्रयोग आंत की कोशिकाओं के अवशोषण के उभारों को कम कर सकती है। इन अवशोषण करने वाले उभारों को माइक्रोविलाई कहते हैं। माइक्रोविलाई के कम होने से आंत की रोकने की क्षमता कमजोर होगी, उपापचय धीमा होगा और कुछ पोषक पदार्थ, जैसे- आयरन, जिंक और वसा अम्ल का अवशोषण काफी मुश्किल होगा। इस शोध का प्रकाशन पत्रिका ‘नैनोइम्पैक्ट’ में किया गया है।

नकारात्मक विचारों का अर्थ हो सकता है तनाव: अध्ययन

क्या आपके दिमाग में लंबे समय से नकारात्मक विचार चले आ रहे हैं? क्या आप अकसर चिड़चिड़ापन महसूस करते हैं? एक नए अध्ययन का मानना है कि यदि आपमें इनमें से कोई लक्षण दिख रहा है तो आप संभवत: तनाव का शिकार हैं। ऑनलाइन परामर्श एवं भावनात्मक स्वास्थ्य पोर्टल ‘योर दोस्त’ द्वारा संचालित अध्ययन में कहा गया कि ‘नकारात्मक विचार तनाव का एक बड़ा लक्षण है।’ इस अध्ययन में इस बात को रेखांकित किया गया है कि तनाव जैसे मनोवैज्ञानिक मुद्दों को अकसर नजरअंदाज किया जाता है। इसके साथ ही यह अध्ययन कहता है कि 50 प्रतिशत मामलों में ‘चिड़चिड़ापन’ और ‘नकारात्मक विचार’ तनाव की शुरुआत का संकेत हो सकते हैं। ये संकेत खानपान और सोने की अनियमित आदतों के जरिए भी दिख सकते हैं।

यह अध्ययन कहता है, ‘41 प्रतिशत प्रतिभागियों को लगा कि जब वे तनाव में थे तब उनकी खाने और सोने से जुड़ी आदतें बदल गई थीं। 39 प्रतिशत लोगों के स्वभाव में बदलाव आए।’ अध्ययन में यह भी कहा गया कि ‘भारत की 14 प्रतिशत जनसंख्या भारी तनाव वाले क्षेत्र में है और इसके लिए विशेषज्ञों के हस्तक्षेप की जरूरत होती है’ और इनमें से 58 प्रतिशत लोग किसी परामर्शदाता के पास जाने का रुझान रखते हैं। इसमें कहा गया, ‘तनाव प्रभावित लोगों में से सिर्फ छह प्रतिशत लोगों ने मनोविज्ञानी से बात की थी। शेष 52 प्रतिशत लोगों ने संगीत सुनकर और सोकर खुद को तनाव मुक्त कर लिया।’

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