December 10, 2016

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छठ पूजा 2016: ये पुरानी कहानियां बनाती हैं इस पर्व को खास, पढ़ें कैसे हुई इसकी शुरुआत

Chhath Puja: दीपावली के छठ पर्व की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। यह पर्व कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को मनाया जाने वाला पर्व है।सूर्य की उपासना के लिए मनाया जाने वाला यह पर्व खास तौर पर पूर्वी भारत के बिहार झारखंड पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है।

छठ महापर्व

दीपावली के छठ पर्व की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। यह पर्व कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को मनाया जाने वाला पर्व है। सूर्य की उपासना के लिए मनाया जाने वाला यह पर्व खास तौर पर पूर्वी भारत के बिहार झारखंड पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। हिंदुओं में मनाया जाने वाला यह त्योहार प्रवासी भारतीयों के साथ साथ विश्वभर मे प्रचलित व प्रसिद्ध हो गया है। इस खास पर्व की शुरुआत कब हुई और कैसे हुई इससे जुड़ी कई कहानियां प्रचलित हैं। इस खास मौके पर हम आपको बताते हैं। इस पर्व से जुड़ी कुछ खास कहानियां जिन्हें सुनकर आपको इस व्रत की महिमा के बारे में पता चलेगा।

राजा प्रियंवद की कहानी: छठ पूजा के पीछे की एक कहानी राजा प्रियंवद को लेकर है। कहा जाता है कि राजा प्रियवंद की कोई संतान नहीं थी तब राजा ने इसके लिए एक यज्ञ कराने की सोची। महर्षि कश्यप ने पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ कराकर प्रियंवद की पत्नी मालिनी को आहुति के लिए बनाई गई खीर खाने को दी। इससे राजा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई लेकिन वो पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ। प्रियंवद पुत्र को लेकर शमशान लेकर गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं और उन्होंने राजा प्रियंवद से कहा कि वो सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं और इसी कारण वो षष्ठी कहलातीं हैं। उन्होंने राजा प्रियंवद से उनकी पूजा करने और दूसरों को पूजा के लिए प्रेरित करने को कहा। जिसके बाद राजा प्रियंवद ने पुत्र इच्छा के कारण देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। तभी से छठ पूजा पूत्रों की दीर्घ आयु के लिए मनायी जाती है।

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भगवान राम और लंका विजय से जुड़ी कहानी: छठ पूजा से जुड़ी एक और कहानी है। इसके मुताबिक विजयदशमी के दिन लंकापति रावण के वध के बाद भगवान राम अयोध्या पहुंचते हैं। रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए भगवान राम ने ऋषि-मुनियों की सलाह से राजसूर्य यज्ञ किया। इस यज्ञ के लिए अयोध्या में मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया गया। मुग्दल ऋषि ने मां सीता को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने की सलाह दी। इसके बाद मां सीता मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी। इसके बाद से ही यह पर्व मनाया जाता है।

योद्धा कर्ण और माता कुंती से जुड़ी कहानी: एक मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। जिसकी शुरुआत सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्य की पूजा करके की थी। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे और वो रोज घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बने। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही परंपरा प्रचलित है। छठ पर्व के बारे में एक कथा और भी है। इस कथा के मुताबिक जब पांडव अपना सारा राजपाठ जुए में हार गए तब दौपदी ने छठ व्रत रखा था। इस व्रत से उनकी मनोकामना पूरी हुई थी और पांडवों को अपना राजपाठ वापस मिल गया था। लोक परंपरा के मुताबिक सूर्य देव और छठी मईया का संबंध भाई-बहन का है। इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की आराधना फलदायी मानी गई।

बिहार और उत्तर भारत में है विशेष महत्व: छठ पूजा उत्तर भारत खासकर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है। इस दौरान सूर्य भगवान को अर्घ्य देकर उपासना की जाती है। कार्तिक महीने की चतुर्थी से शुरू होकर सप्तमी तक मनाया जाने वाला ये त्यौहार चार दिनों तक चलता है। इस बार छठ पूजा की तिथि चार नवंबर से लेकर सात नवंबर तक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए भगवान सूर्य की अराधना की जाती है। इस दिन सूर्य की भी पूजा की जाती है। माना जाता है जो व्यक्ति छठ माता की इन दिनों पूजा करता है छठ माता उनकी संतानों की रक्षा करती हैं।

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First Published on November 3, 2016 11:22 am

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