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खेल जगत की सबसे चर्चित गुरु-शिष्य जोड़ी के मिलन की कहानी: गुरु से पहली मुलाकात में नर्वस हो गए थे सचिन, नहीं चला था बल्‍ला

शुरुआती दिनों में सचिन के पास केवल एक जोड़ी क्रिकेट यूनिफॉर्म हुआ करती थी जिसे वो रोज दो बार धोते थे।
पूर्व क्रिकेटर और राज्यसभा सांसद सचिन तेंदुलकर

अगर आप पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर को जानते हैं तो बहुत संभव है कि आपने उनके पहले क्रिकेट गुरु रमाकांत आचरेकर के बारे में भी सुन रखा होगा। हो सकता है आपने ये भी सुना हो कि सचिन अपने गुरु से कैसे मिले थे लेकिन आपने ये कहानी दूसरों के ज़ुबानी सुनी होगी। आज हम आपको बताएंगे कि खुद सचिन ने खेल जगत की सबसे चर्चित गुरु-शिष्य जोड़ी के मिलन के बारे में क्या बताया है।

अपने क्रिकेट करियर के दौरान मास्टर ब्लास्टर कहे जाने वाले सचिन ने अपनी आत्मकथा “प्लेइंग इट माई वे: माई ऑटोबायोग्राफी” के दूसरे अध्याय “लर्निंग द गेम” में अपने बचपन के रुझान और रमाकांत आचरेकर से क्रिकेट सीखने पहुंचने की विस्तार से जानकारी दी है। सचिन ने अपनी आत्मकथा खेल इतिहासकार बोरिया मजूमदार के सहयोग से लिखी है।

सचिन ने लिखा है, “मैं कम उम्र से ही अपनी कॉलोनी के दोस्तों के साथ टेनिस-बॉल के साथ क्रिकेट खेलता था। मैं टीवी पर अपने पसंदीदा खिलाड़ियों सुनील गावस्कर और वेस्टइंडीज के विवियन रिचर्डस का खेल देखकर उनकी स्टाइल की नकल किया करता था।” सचिन के अनुसार बचपन में उन्हें गेंदबाजी से ज्यादा प्यार था और वो मीडियम पेस, ऑफ स्पिन और लेग-स्पिन गेंदबाजी की कोशिश किया करते थे। वो नेट में काफी देर गेंदबाजी का अभ्यास किया करते थे।

सचिन ने बताया है कि उन्होंने रमाकांत आचरेकर के नेतृत्व में ही टेनिस बॉल छोड़कर क्रिकेट बॉल से खेलना सीखा। सचिन के अनुसार उनके बड़े भाई अजित तेंदुलकर उन्हें 11 साल की उम्र में रमाकांत आचरेकर के पास लेकर गए थे। तेंदुलकर के अनुसार उनके गुरु आचरेकर ने भी 1943 में 11 साल की उम्र में ही क्रिकेट खेलना शुरू किया था। सचिन ने बताया है कि उनके भाई अजित बालमोहन विद्यामंदिर में पढ़ने के दिनों से ही आचरकेर को जानते थे। सचिन के अनुसार, “उन्हें मालूम था कि मुंबई के किसी भी स्कूल में आचेरकर सर से अच्छा क्रिकेट गुरु नहीं है, इसलिए वो मुझे शिवाजी पार्क में लगने वाले उनके समर कैम्प में लेकर गए।”

सचिन के अनुसार समर कैम्प में कोई भी शामिल हो सकता था लेकिन अंतिम चयन खुद आचरेकर करते थे। कैम्प में सब-जूनियर (15 वर्ष से कम) और जूनियर (17 वर्ष से कम) से लेकर सभी आयु वर्गों के लिए भिन्न-भिन्न नेट लगे हुए थे। सचिन की उम्र 11 साल थी इसलिए उन्होंने सब-जूनियर स्तर के नेट में ट्रायल दिया। सचिन ने बताया है, “मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन की अंडर-15 की टीम थी और सब-जूनियर स्तर के सभी बच्चों की नजर इसमें शामिल होने पर लगी रहती थी।”

सचिन ने समर कैम्प में अपने पहले दिन के बारे में लिखा है, “मैंने पहले कभी नेट में बैटिंग नहीं की थी और वो भी इतने लोग से घिरे रहकर। जब मुझसे बैटिंग के लिए कहा गया तो मैं सहज नहीं था। सर मुझे बहुत करीब से देख रहे थे। मैं उन पर प्रभाव छोड़ने में विफल रहा। जब मैंने बैटिंग कर ली तो सर ने अजित को किनारे बुलाकर कहा कि मैं शायद ज्यादा छोटा हूं और वो मुझे थोड़ा बड़े होने के बाद दोबारा लेकर आएं। मुझे उस समय नहीं पता था कि दोनों के बीच क्या बात हुई।”

sachin tendulkar with ramakant achrekar सचिन तेंदुलकर अपने गुरु रमाकांत आचरेकर को अपनी आत्मकथा देते हुए। (Express photo by Kevin DSouza)

सचिन ने आगे बताया है कि अजित ने कॉलोनी में उनका खेल देखा था इसलिए वो जानते थे कि मैं उससे ज्यादा अच्छा प्रदर्शन कर सकता था। सचिन ने बताया है, “अजित ने सर से कहा कि मैं नर्वस था और मुझे एक और मौका देने के लिए कहा। उन्होंने सर से कहा कि इस बार वो दूर से मेरी बैटिंग देखें।” सचिन के अनुसार जब उन्हें लगा कि आचरेकर सर आसपास नहीं हैं तो वो पूरी सहजता के साथ खेलने लगे और फिर आचरेकर ने उन्हें अपने कैम्प में शामिल कर लिया। सचिन ने लिखा है, “मैं बहुत खुश था और मैं कहना चाहूंगा कि इस अवसर ने मेरी जिंदगी बदल दी।”

सचिन ने अपनी आत्मकथा में ये भी बताया है कि समर कैम्प में 65 रुपये प्रवेश शुल्क लगता था और उसके अलावा 10 रुपये महीना फीस लगती थी लेकिन कुछ महीनों बाद ही उन्हें फीस दने की जरूरत नहीं पड़ी। सचिन रोज शिवाजी पार्क में सुबह 7.30 से 10.30 तक अभ्यास करते थे। उसके बाद घर जाकर लंच करके वापस पार्क में आकर शाम तक अभ्यास किया करते थे। उस समय उनके पास केवल एक जोड़ी क्रिकेट यूनिफॉर्म हुआ करती थी जिसे वो रोज दोपहर धोकर शाम को दोबारा पहनते थे। शाम को घर आकर वो दोबारा अपनी यूनिफॉर्म धोते थे। सचिन ने लिखा है, “ये तरीका काफी कारगर था लेकिन इसमें बस एक दिक्कत थी कि मेरी पैंट की जेबें हमेशा गिली रह जाती थीं और मैं हमेशा गीली पॉकेट के साथ अभ्यास करता था।” आत्मकथा में सचिन ने आचेरकर के अलावा अपने भाई अजित को भी अपने क्रिकेट करियर का श्रेय दिया है। बकौल सचिन अजित के दिए हुए टिप्स उनके लिए बैटिंग मैनुअल की तरह होते थे।

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