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दिनेश खन्नाः भारत के लिए ओलंपिक पदक जीत सकती हैं सिंधु

अगले साल होने वाले ओलंपिक में यों तो ज्यादातर लोगों ने दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी सायना नेहवाल को पदक का बड़ा दावेदार मान रहे हैं लेकिन दिनेश खन्ना का मानना है कि पीवी सिंधू ओलंपिक में भारत के लिए पदक जीत सकती हैं।
Author नई दिल्ली | November 25, 2015 03:02 am

अगले साल होने वाले ओलंपिक में यों तो ज्यादातर लोगों ने दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी सायना नेहवाल को पदक का बड़ा दावेदार मान रहे हैं लेकिन दिनेश खन्ना का मानना है कि पीवी सिंधू ओलंपिक में भारत के लिए पदक जीत सकती हैं। भारतीय बैडमिंटन को भले ही आज प्रकाश पादुकोण, सैयद मोदी, पुलेला गोपीचंद, साइना नेहवाल, पीवी सिंधू, पारुपल्ली कश्यप की वजह से जाना जाता हो लेकिन भारतीय बैडमिंटन को शिखर पर पहुंचाने का श्रेय दिनेश खन्ना को जाता है। वह भी तब न तो तकनीकी तौर पर भारतीय खिलाड़ियों को सुविधाएं मिलती थीं और न ही आर्थिक रूप से कोई मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाता था। तब दिनेश खन्ना ने एशियाई बैडमिंटन में अपना दबदबा साबित किया था और पहले एशियाई चैंपियन बनने का गौरव पाया था। यह उपलब्धि हासिल करने वाले वे पहले भारतीय थे। तब एशियाई बैडमिंटन में भारत की पहचान न के बराबर थी। लेकिन दिनेश खन्ना ने कोर्ट कर कमाल कर दिखाया। यह उपलब्धि उन्होंने 1965 में हासिल की थी। पांच दशक यानी पचास साल पहले वे चैंपियन बने थे। पीएनबी मेटलाइफ जूनियर बैडमिंटन चैंपियनशिप के उद््घाटन के मौके पर उन्होंने उन यादों को साझा किया।

ओलंपिक की चर्चा करने पर उन्होंने कहा कि यों तो देश की उम्मीदें सायना नेहवाल और पीवी सिंधू दोनों से है लेकिन मैं मसझता हूं कि सिंधू ओलंपिक में कमाल कर सकती हैं। सिंधू काफी प्रतिभावान हैं और मुझे इस युवा खिलाड़ी से काफी उम्मीदें हैं। हालांकि पिछले एक-दो टूर्नामेंट में निर्णायक मौकों पर वे दबाव में दिखीं। इसकी वजह से वे चैंपियन बनने से चूक गर्इं। कई बार तो अपने से ऊंची रैंकिंग वाली खिलाड़ी को वे हरा देती हैं लेकिन अक्सर वे अपने से कम रैंकिंग वाली खिलाड़ी से हार जाती हैं। उन्हें अपनी इस कमजोरी से उबरना होगा। अभी वे बीस साल की हैं, फिट है और चैंपियन बनने के लिए यह एक सही उम्र है। आप देखेंगे कि अगले एक साल में वे चैंपियन की तरह सामने आएंगीं।

खन्ना ने कहा कि महिला वर्ग में सायना और सिंधू दोनों ही खेलेंगीं। सायना का इस साल का प्रदर्शन काफी अच्छा रहा है। आपके दो खिलाड़ी विश्व रैंकिंग में टाप-सोलह में रहते हैं तो वे ओलंपिक में खेल सकते हैं लेकिन इस रैंकिंग से बाहर होने की स्थिति में एक खिलाड़ी को ही ओलंपिक में उतरने का मौका मिल पाता है। मुझे लगता है कि सायना और सिंधू दोनों ही ओलंपिक में खेल सकती हैं। पुरुषों के वर्ग में पूछे सवाल पर उन्होंने कहा कि किदांबी श्रीकांत ओलंपिक में पदक जीत सकते हैं। हालांकि पिछले कुछ टूनार्मेंटों में उनका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है। उन्होंने कई नजदीकी मैच गंवाए हैं। उन्हें भी इस कमजोरी से उबरना होगा। इनके अलावा अजय जयराम, एचएस प्रणय और परुपल्ली कश्यप भी अच्छे खिलाड़ी हैं। उन्हें कोशिश करनी होगी कि वे अपनी रैंकिंग सुधारें। ओलंपिक के लिए यह बेहद जरूरी है।

भारत के लिये विदेशी कोच के सवाल पर थामस और उबेर कप में भारतीय टीम के कोच रह चुके खन्ना ने कहा कि सिंगल्स मुकाबलों में भारतीय कोच अच्छा काम कर रहे हैं लेकिन डबल्स के लिए विदेशी कोच रखने की उन्होंने वकालत की। पचास साल पहले एशियाई चैंपियन बनने के क्षणों का जिक्र करते हुए पदमश्री खन्ना ने कहा कि एशियाई चैंपियनशिप 1965 में लखनऊ में हुई थी। एक साल पहले 1964 में मेरे घुटने का आपरेशन हुआ था। मैं चयन ट्रायल में उतरा था और चौथे स्थान पर रहा। मुझे इस चैंपियनशिप में कोई सीडिंग नहीं मिली थी। तब समय नंदू नाटेकर और सुरेश गोयल जैसे दिग्गज खिलाड़ी हुआ करते थे।

उन्होंने कहा कि तब मुझे यह उम्मीद भी नहीं थी कि मैंच चैंपियन बन जऊंगा। मुझे तो उम्मीद ही नहीं कि मैं दो राउंड से आगे जा पाऊंगा। मैं तो मान कर चल रहा था कि दो दौर के बाद कोर्ट के बाहर बैठ कर दूसरे खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाऊंगा। लेकिन टीम चैंपियनशिप में मलेशिया के एक-दो अच्छे खिलाड़ियों को हराने के बाद मुझे लगा कि मैं कुछ कर सकता हूं। व्यक्तिगत मुकाबलों में मैंने प्री-क्वार्टर से फाइनल तक चार सीडेड खिलाड़ियों को हराकर खिताब जीता।

पंजाब के गुरदासपुर में जन्मे 72 साल के खन्ना को 1965 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने अपने क्वार्टर फाइनल मैच को सबसे मुश्किल बताया। उन्होंने कहा कि मेरा मुकाबला तीसरी सीड जापान के वाई इतागाकी से था। मैंने पहला गेम तो आसानी से जीत लिया लेकिन दूसरे गेम में लंबी रैलियां हुर्इं। एक-एक रैली में 40-45 बार शटल नेट के इधर-उधर हुर्इं। उन्होंने कहा कि हम दोनों ही बहुत थक चुके थे। जापानी खिलाड़ी थकावट से टूट गया लेकिन मैंने खुद को संभाले रखा और मैच जीत लिया। उस समय चीफ रेफरी ने तो यहां तक कह दिया था कि अगर यह मैच तीसरे गेम में गया तो यहां दो स्ट्रेचर मंगवाकर रखने पड़ेंगे। लेकिन यह नौबत नहीं आई।

खन्ना ने सेमीफाइनल में सातवीं सीड भारत के सुरेश गोयल को हराया। फिर फाइनल में उनका मुकाबला दूसरी सीड थाईलैंड के सेंगोब रत्नासुरन से हुआ। खन्ना ने कहा कि फाइनल मैच का पहला गेम तो आसानी से जीत लिया। दूसरे गेम में भी मैं 12-6 से आगे था। तब मुझे लगा कि मैं चैंपियन बनने से सिर्फ तीन कदम दूर हूं। इससे मैं दबाव में आया। नतीजा यह हुआ कि थाई खिलाड़ी ने अंकों का फासला कम किया। लेकिन फिर मैंने खुद को संभाला और मैच 15-3, 15-11 से जीत कर चैंपियन बना।
यह पूछ जाने पर कि कामयाबी के पचासवें साल पर क्या उन्हें भारतीय बैडमिंटन संघ से कोई संदेश मिला है तो खन्ना ने कहा कि मुझे ऐसा कोई संदेश तो नहीं मिला है और हो सकता है कि उन्हें यह याद भी न हो लेकिन मैं संघ का हमेशा शुक्रगुजार रहूंगा क्योंकि मुझे उन्होंने हमेशा सम्मान दिया है और मैंने उनके साथ कई पदों पर काम किया है।

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