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‘चेन्नई सुपर किंग्स और बीसीसीआई के पद में से किसी एक को चुनें श्रीनिवासन’

क्रिकेट प्रशासक एन श्रीनिवासन को उस समय करारा झटका लगा जब उच्चतम न्यायालय ने उन्हें हितों के टकराव के आधार पर बीसीसीआई का कोई भी चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया। न्यायालय ने इसके साथ ही आईपीएल काण्ड में श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मयप्पन और राज कुंद्रा की सजा का निर्धारण करने के लिये पूर्व […]
Author January 23, 2015 15:41 pm
मयप्पन और कुंद्रा आईपीएल में सट्टेबाजी के दोषी, श्रीनिवासन पर आरोप साबित नहीं : सुप्रीम कोर्ट (स्रोत: फाइल)

क्रिकेट प्रशासक एन श्रीनिवासन को उस समय करारा झटका लगा जब उच्चतम न्यायालय ने उन्हें हितों के टकराव के आधार पर बीसीसीआई का कोई भी चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया। न्यायालय ने इसके साथ ही आईपीएल काण्ड में श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मयप्पन और राज कुंद्रा की सजा का निर्धारण करने के लिये पूर्व प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता में तीन न्यायाधीशों की समिति गठित कर दी। न्यायालय के इस आदेश से चेन्नई सुपर किंग्स और राजस्थान रॉयल्स का भविष्य खतरे में पड़ सकता है।

न्यायमूर्ति तीरथ सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति एफएमआई कलीफुल्ला की खंडपीठ ने बीसीसीआई के पदाधिकारियों को इंडियन प्रीमियर लीग और चैम्पियंस लीग में व्यावसायिक हित रखने की अनुमति देने संबंधी नियमों को निरस्त कर दिया। न्यायाधीशों ने कहा, ‘‘श्रीनिवासन को आईपीएल टीम खरीदने की अनुमति देने संबंधी बीसीसीआई के नियमों में संशोधन अनुपयुक्त है क्योंकि क्रिकेट में हितों का टकराव बहुत भ्रामक स्थिति को जन्म देता है।’’

न्यायालय ने बहुतप्रतीक्षित फैसला सुनाते हुये कहा कि चेन्नई सुपर किंग्स के अधिकारी गुरुनाथ मयप्पन तथा राजस्थान रायल्स के सह-मालिक राज कुन्द्रा के खिलाफ सट्टेबाजी के आरोप साबित हो गये हैं, जबकि श्रीनिवासन के खिलाफ पर्दा डालने के आरोप ‘साबित नहीं हुये।’

उच्चतम न्यायालय ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश आर एम लोढ़ा की अध्यक्षता में एक तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जो गुरुनाथ मयप्पन और कुंद्रा के खिलाफ सजा तय करेगी। दोनों को सट्टेबाजी का दोषी पाया गया। 138 पन्नों के फैसले में श्रीनिवासन से कहा गया है कि वह तुरंत चुनें कि उन्हें बीसीसीआई प्रमुख के पद का चुनाव लड़ना है या इंडिया सीमेंट्स लिमिटेड के स्वामित्व वाली टीम चेन्नई सुपर किंग्स में बने रहना है। श्रीनिवासन इंडिया सीमेंट्स लिमिटेड के प्रबंध निदेशक हैं।

न्यायमूर्ति लोढ़ा समिति में न्यायमूर्ति अशोक भान और आर वी रवींद्रन को सदस्य बनाया गया है। समिति गुरुनाथ और कुंद्रा के लिए सजा का निर्धारण कर सकती है। आईपीएल नियमों के तहत चेन्नई सुपर किंग्स और राजस्थान रॉयल्स से जुड़े फ्रेंचाइज को रद्द किया जा सकता है।

न्यायाधीशों ने कहा, ‘‘श्रीनिवासन सहित कोई भी व्यक्ति, जिसका व्यावसायिक हित हो, बीसीसीआई में किसी भी पद के लिये अयोग्य होगा और व्यावसायिक हित के आधार पर यह अयोग्यता उस समय तक प्रभावी रहेगी जब तक ऐसे व्यावसायिक हित रहेंगे।’’ न्यायालय ने बीसीसीआई से कहा कि वह छह सप्ताह के भीतर पदाधिकारियों के चुनाव के लिये वार्षिक आम सभा की बैठक आहूत करें।

न्यायमूर्ति ठाकुर ने फैसला सुनाते हुये कहा, ‘‘आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग और सट्टेबाजी में मयप्पन की संलिप्तता की जांच पर पर्दा डालने के श्रीनिवासन के खिलाफ आरोप ‘साबित नहीं हुये’ और ‘कुल मिलाकर पर्दा डालने के मामले में श्रीनिवासन के खिलाफ सिर्फ संदेह का मामला है।’

न्यायालय ने कहा कि सिर्फ खिलाडी और टीम के अधिकारी ही नहीं बल्कि कदाचार के लिये फ्रैंचाइजी को भी दंडित करना होगा। ऐसी स्थिति में चेन्नई सुपर किंग्स और आईपीएल का भविष्य खतरे में पड़ सकता है क्योंकि आईपीएल के नियमों में खिलाडियों, टीम के मालिकों और अधिकारियों के कदाचार की स्थिति में फ्रैंचाइजी रद्द करने का प्रावधान है।

पूर्वप्रधान न्यायाधीश आर एम लोढा की अध्यक्षता में न्यायाधीशों की समिति गठित करते हुये न्यायालय ने कहा, ‘‘दुराग्रह को दूर करने और तथ्यपरक तथा पारदर्शी प्रक्रिया स्थापित करने के लिये मयप्पन और कुन्द्रा को दी जाने वाली सजा के निर्धारण और टीमों के भाग्य का फैसला करने हेतु एक स्वतंत्र सिमति की आवश्यकता है।

लोढ़ा समिति बीसीसीआई के मुख्य परिचालन अधिकारी सुन्दर रमण के खिलाफ सट्टेबाजी के आरोपों की जांच करेगी और यदि वह दोषी पाये गये तो उन्हें सजा भी देगी।

न्यायालय ने कहा कि रमण के खिलाफ लगे आरोपों की भी जांच होगी और ‘‘सच्चाई जरूर सामने आनी चाहिए।’’
न्यायालय ने समिति से कहा कि वह मयप्पन, कुन्द्रा और दूसरे व्यक्तियों को नोटिस जारी करे और छह महीने के भीतर अपना काम पूरा करके रिपोर्ट पेश करे। इसके साथ ही यह समिति बीसीसीआई में सुधार लाने के बारे में भी सिफारिशें देगी।

शीर्ष अदालत ने कहा कि बीसीसीआई के नियम 6.2.4 में फरवरी, 2008 में किये गये संशोधन कानून की नजर में टिकाऊ नहीं हैं और इन्हें निरस्त करना ही होगा। इसी संशोधन के जरिये क्रिकेट प्रशासकों को आईपीएल और चैम्पियंस लीग में टीमे खरीद कर इसमें व्यावसायिक हित बनाने की अनुमति प्रदान की गयी थी।

न्यायालय ने कहा कि श्रीनिवासन बीसीसीआई का मुखिया और इंडिया सीमेन्ट्स लिमिटेड का प्रबंध निदेशक थे जो चेन्नई सुपर किंग्स की मालिक है और इसने हितों के टकराव की स्थिति पैदा कर दी। चेन्नई सुपर किंग्स की मालिक इंडिया सीमेन्ट्स में श्रीनिवासन के बहुत कम शेयर होने संबंधी दलील गुमराह करने वाली थी क्योंकि उनके परिवार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस कंपनी पर कहीं अधिक नियंत्रण है।

न्यायालय ने कहा कि किसी भी प्रशासक को खेल में व्यावसायिक हित रखने की अनुमति देने के लिये बीसीसीआई के नियमों में संशोधन ‘कर्तव्य भंग’ है और यह खेल की शुद्धता में बाधक है।

न्यायाधीशों ने कहा, ‘‘6.2.4 संशोधन ही असली खलनायक है। बीसीसीआई ने आईपीएल प्रकरण की जांच के लिये समिति गठित करते समय निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया।’’

न्यायालय ने फैसला सुनाते हुये कहा कि उसने क्या बीसीसीआई राज्य है या नहीं जैसे विभिन्न मुद्दों पर सात प्रश्न तैयार किये थे। न्यायालय ने कहा कि हालांकि सांविधानिक संरचना के दायरे में बीसीसीआई ‘राज्य’ नहीं है लेकिन बीसीसीआई के कार्य ‘सार्वजनिक कार्य’ हैं और ऐसी स्थिति में वे संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय के रिट अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

न्यायालय ने न्यायमूर्ति मुकुल मुद्गल की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय समिति की रिपोर्ट स्वीकार करते हुये कहा कि उसे मयप्पन और कुन्द्रा के टीम अधिकारी के रूप में सट्टेबाजी में शामिल होने के निष्कर्ष से असहमति व्यक्त करने की कोई वजह नजर नहीं आती है।

न्यायालय ने कहा कि हालांकि राज्य सरकार और केन्द्र सरकार बीसीसीआई को पूर्ण स्वायतता देती है जो राष्ट्रीय टीम का चयन करती है और जिसका क्रिकेट पर पूर्ण नियंत्रण है लेकिन उसने (राज्य) क्रिकेट बोर्ड के अधिकारों को चुनौती देने के लिये कोई कानून बनाना उचित नहीं समझा।

बोर्ड के सार्वजनिक कार्यो को परिभाषित करते हुये न्यायालय ने कहा कि बीसीसीआई की सिफारिश पर ही भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म श्री और अर्जुन पुरस्कार प्रदान किये जाते हैं और देश के लिये सम्मान लाने वाले खिलाड़ियों को सर्वोच्च हस्तियां सम्मानित करती हैं।

न्यायालय ने कुन्द्रा की इस दलील को दरकिनार कर दिया कि मुद्गल समिति ने उन्हें नोटिस नहीं दिया था। न्यायालय ने कहा कि समिति ने उनका पक्ष सुना था और नोटिस जारी करने बहुत अधिक औचित्य नहीं था क्योंकि समिति ने सभी नियमों का पालन किया और उनके खिलाफ सारे आरोप साबित हुये और इनकी समीक्षा की जरूरत नहीं है।

न्यायालय ने कहा कि छल का सहारा लेकर बीसीसीआई अपनी विश्वसनीयता गंवाना बर्दाश्त नहीं कर सकेगा और सारे क्रिकेट मैच एक समान स्थिति में ही खेले जाने चाहिए। न्यायालय ने कहा कि बीसीसीआई के भीतर भी संस्थागत ईमानदारी स्थापित करने की आवश्यकता है।

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