ताज़ा खबर
 

BCCI को झेलनी पड़ी सुप्रीम कोर्ट की नाराज़गी, लोढ़ा समिति की सिफारिश लागू करने का मामला

सुप्रीम कोर्ट ने जोर दिया कि बीसीसीआई द्वारा धन के वितरण सहित सभी फैसलों में पारदर्शिता, निष्पक्षता एवं वस्तुनिष्ठता सबसे महत्वपूर्ण पहलू हैं।
Author नई दिल्ली | October 7, 2016 01:57 am
बीसीसीआइ अध्यक्ष अनुराग ठाकुर। (फाइल फोटो)

देश में क्रिकेट के सुधार के लिए न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा समिति के निर्देशों को लागू करने में ‘बागी तेवरों’ तथा राज्य संगठनों को ‘जल्दबाजी में’ करीब 400 करोड़ रुपए बांटने को लेकर भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (बीसीसीआई) को गुरुवार (6 अक्टूबर) को उच्चतम न्यायालय की नाराजगी का सामना करना पड़ा। शीर्ष अदालत ने पूर्व प्रधान न्यायाधीश लोढ़ा की अध्यक्षता वाली समिति के निर्देशों के क्रियान्वयन के मुद्दे पर शुक्रवार (7 अक्टूबर) को आदेश देने का फैसला किया। शीर्ष अदालत ने यह फैसला तब किया जब बीसीसीआई के वकील ने ‘कल (शुक्रवार) तक बिना शर्त यह शपथपत्र’ देने से इंकार किया कि वह राज्य संगठनों को कोष देना बंद करने के बारे में निर्देश प्राप्त करेंगे और समिति की सिफारिशों का पालन करेंगे।

प्रधान न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, ‘आपको बागी तेवर नहीं दिखाने चाहिए। इससे आपको कोई लाभ नहीं होने जा रहा।’ पीठ ने जोर दिया कि बीसीसीआई द्वारा धन के वितरण सहित सभी फैसलों में पारदर्शिता, निष्पक्षता एवं वस्तुनिष्ठता सबसे महत्वपूर्ण पहलू हैं। पीठ बीसीसीआई के इस रवैये से आहत थी कि शीर्ष अदालत और लोढ़ा समिति के फैसले और निर्देश वैधानिक प्रावधानों के विपरीत हैं। जब न्यायमित्र के रूप में वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने न्यायाधीशों का ध्यान बीसीसीआई के हलफनामे की ओर दिलाने पर पीठ ने कहा कि इन्हें स्वीकार करने में बीसीसीआई की अनिच्छा ‘रणनीति’ या ‘साजिश’ का हिस्सा है।

उन्होंने उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों का भी जिक्र किया और न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) मार्कंडेय काटजू को इसमें शामिल करने पर बोर्ड की आलोचना की जिन्होंने शीर्ष अदालत की गरिमा कमतर करने के लिए शीर्ष अदालत के फैसले तथा न्यायमूर्ति लोढ़ा समिति की बातों के खिलाफ ‘अनुचित टिप्पणियां’ की थीं। पीठ ने कहा, ‘जब आप उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश बन जाते हैं तो आप उस संस्था का हिस्सा हो जाते हैं जिससे गरिमा जुड़ी हुई है।’ पीठ ने सवाल किया कि क्या कोई पूर्व न्यायाधीश फैसलों के बारे में बात करता है, मीडिया से बात कर सकता है या संवाददाता सम्मेलन आयोजित कर सकता है। सुब्रमण्यम ने कहा कि बीसीसीआई को न्यायमूर्ति काटजू की टिप्पणियां लिखित में मिली थीं। हालांकि उसने बाद में खुद को उनसे दूर किया लेकिन हलफनामे में उनके नजरिये का प्रमुख रूप से जिक्र किया था।

उन्होंने कहा कि बाध्यकारी फैसले का पालन नहीं करने पर बीसीसीआई दीवानी और फौजदारी दोनों तरह की अवमानना के लिए जिम्मेदार है। उन्होंने सवाल किया कि क्या कोई संस्था फैसले को उलटने के लिए तरीके और उपाय खोज सकती है। जवाब है ‘नहीं’। यह दीवानी के साथ साथ फौजदारी अवमानना है। उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत के फैसले के बाद के बीसीसीआई के सभी फैसलों को शून्य घोषित किया जाए। वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि शीर्ष अदालत को यह आदेश देना चाहिए कि बीसीसीआई पदाधिकारी ‘साफ छवि वाले’ अदालत की तरफ से नियुक्त प्रशासकों का ‘स्थान’ लें। सुब्रमण्यम की दलीलों का संज्ञान लेते हुए पीठ ने सवाल किया कि पदाधिकारियों को नजरअंदाज करने वाले कौन लोग हो सकते हैं। अदालत ने कहा कि वह लोढ़ा समिति से यह कह सकती है कि बीसीसीआई को निर्देशों का पालन करने के लिए एक और अवसर दिया जाए।

शीर्ष अदालत ने कहा, ‘दो विकल्प हैं। या तो हम कहें कि आप सिफारिशों का पालन करें या हम समिति से कहें कि उन्हें इसका पालन करने के लिए एक और मौका दिया जाए। वे बेहतर जानते हैं कि किस तरह के लोग प्रशासक हो सकते हैं।’ बिहार क्रिकेट संघ ने अपने सचिव आदित्य वर्मा के जरिये कहा कि समिति को बीसीसीआई के प्रशासक नियुक्त करने की शक्ति होनी चाहिए। पीठ शुक्रवार को अपना फैसला सुनाएगी। पीठ ने कहा कि बीसीसीआई मामले को टाल नहीं सकती और राज्य संगठनों को सुधार का उल्लंघन करने नहीं दे सकती। पीठ ने कहा कि ‘उन्हें कोष देने को तुंरत रोका जाना चाहिए’ क्योंकि यह ‘सार्वजनिक धन’ है तथा इस बात पर पूरी तरह से पारदर्शिता होनी चाहिए कि ‘धन किस तरह से खर्च किया जा रहा है।’ पीठ ने इस बात पर नाखुशी जताई कि एक अक्तूबर को आम सभा की बैठक से दो दिन पहले 29 सितंबर को 400 करोड़ रुपए बांटे गए।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on October 6, 2016 11:49 pm

  1. No Comments.