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आखिर क्यों मौत की सज़ा सुनाने के बाद जज तोड़ देते हैं अपने पेन की निब

बॉलीवुड फिल्मों में आपने अक्सर देखा होगा जब जज किसी को मौत की सज़ा सुनाते हैं तो वह कहते हैं कि ये अदालत दफा 30 2 के तहत ताजेराते-ए-हिन्द(taaziraat-e-Hind) मुज़रिम को फांसी की सजा सुनाती है।
फांसी की सज़ा सुनाते ही पेन तोड़ने की प्रथा आज से नहीं बल्कि अंग्रेजों के जमाने से चलता आ रहा है।

बॉलीवुड फिल्मों में आपने देखा होगा, जब जज मौत की सजा सुनाते हैं तो वह कहते हैं कि यह अदालत दफा 302 के तहत ताजेराते-ए-हिन्द (Taaziraat-e-Hind) मुज़रिम को फांसी की सजा सुनाती है। यह कहने के बाद वे पेन की निब तोड़ देते हैं। लेकिन आपने कभी सोचा है कि वे सजा सुनाने के बाद ऐसा क्यों करते हैं? फांसी की सजा सुनाते ही पेन तोड़ने की प्रथा आज से नहीं बल्कि अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही है। पहले भी जब किसी मुज़रिम को फांसी की सजा सुनाई जाती थी तो पेन की निब तोड़ दी जाती थी। कारण यह था कि इस पेन ने किसी के मौत पर हस्ताक्षर किए हैं, लिहाजा इससे अब कोई और काम नहीं किया जा सकता है। फांसी की सजा दुनिया की सभी सजाओं में सबसे बड़ी सजा होती है। यह आम अपराधियों को नहीं सुनाई जाती। यह उन्हीं को सुनाई जाती है, जिन्होंने कोई जघन्य अपराध किया हो।

मौत की सजा देने वाले इस पेन ने उस शख्स की जिंदगी छीन ली है। जज फैसला सुनाने के समय किए गए पेन की निब इसलिए भी तोड़ते है, क्‍योंकि ऐसा करके वे अपने आप को इस अपराध से मुक्‍त करते हैं कि उन्‍होंने किसी की जिंदगी खत्‍म कर दी। वे ऐसा इसलिए भी करते हैं, ताकि उन्हें अपने फैसले पर अफसोस न हो और वे उसके बारे में ज्यादा सोचें भी नहीं

यह एक रिवाज की तरह है, जिसे सालों से हर जज लगातार अपना रहे हैं। दुनिया भर के कई देशों में अभी भी फांसी की सजा बरकरार है। 56 देशों ने अभी तक मौत की सजा को पहले की तरह ही मान्य रखा है। वहीं, 103 देशों ने इस सजा को खत्म किया जा चुका है। जबकि छह देश ऐसे भी हैं, जो समान्य अपराधों के लिए इस सजा को समाप्त कर चुके हैं।

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