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चीन-भारत संबंधों में तनाव : मेनन

मेनन ने कहा कि चीन के साथ वर्तमान नीति 1988 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के दौरे के समय से अपनाई गई थी जो तीन दशक से चली आ रही है और अब यह कारगर उपाय नहीं है।
Author वाशिंगटन | October 13, 2016 04:43 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन का कहना है कि चीन भारत संबंध तनाव की स्थिति में हैं। इनके पुनर्वालोकन की जरूरत है क्योंकि बदल चुके हालात में वर्ष 1988 की व्यवस्था ‘कारगर उपाय’ नहीं है। मेनन ने बताया ‘भारत चीन संबंध तनाव की स्थिति में हैं। आप यह तनाव देख सकते हैं ….मसूद अजहर को आतंकवादी का दर्जा देना, एनएसजी (परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह), मेरा मतलब है कि मुझे यह सब गिनाने की जरूरत नहीं है। ….इसलिए इस रिश्ते में तनाव तो है।’ भारत में इस सप्ताह के अंत में होने जा रहे दो दिवसीय ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत पहुंचने से पहले मेनन ने कहा ‘यह सब संबंधों में तनाव के संकेत हैं जहां दोनों देशों के बीच पर्याप्त रणनीतिक संवाद नहीं है।’ बहरहाल, पूर्व विदेश सचिव ने कहा कि द्विपक्षीय संबंधों को लेकर वह निराशावादी नहीं हैं। उन्होंने अपनी किताब ‘च्वाइसेज : इनसाइड द मेकिंग आॅफ इंडियाज फॉरेन पॉलिसी’ में लिखा है ‘मैं भारत चीन संबंधों के भविष्य के बारे में निराशावादी नहीं हूं।’ इस किताब का विमोचन पिछले सप्ताह ब्रूकिंग इंस्टीट्यूट में हुआ था और यह दुनिया भर के स्टोर्स में अगले सप्ताह नजर आएगी।

विदेश नीति के पहलू पर मेनन ने कहा कि निश्चित रूप से वह निरंतरता बनाए रखने के मोदी सरकार के प्रयासों को देखते हैं। वर्ष 2011 से 2014 तक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे मेनन ने कहा कि कई चीजें की गईं, उदाहरण के लिए बांग्लादेश के साथ भूमि सीमा समझौता, अमेरिका के साथ संबंधों में भी प्रयास किए गए हैं, ‘लुक ईस्ट’ से ‘एक्ट ईस्ट’ तक कई चीजें पहले भी हुर्इं और निरंतर जारी हैं। मेनन ने कहा ‘निरंतरता अच्छी है’। इससे पता चलता है कि यह भारत की नीति है और इसे आगे भी बढ़ाया जाएगा। वर्ष 2006 से 2009 तक विदेश सचिव की भूमिका निभा चुके मेनन ने कहा ‘लेकिन इसकी अपनी सीमाएं हैं। अगर हालात बदलते हैं… एशिया प्रशांत में सत्ता का संतुलन बदल रहा है, चीन का उदय हो रहा है तो निश्चित रूप से चीन के साथ संबंधों का पुनर्वलोकन करने की जरूरत है।’ मेनन ने कहा कि चीन के साथ वर्तमान नीति 1988 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के दौरे के समय से अपनाई गई थी जो तीन दशक से चली आ रही है और अब यह कारगर उपाय नहीं है।

उन्होंने कहा ‘यह मूलत: इस प्रकार है कि हमारे जो भी जटिल मुद्दे हैं, उन पर हम चर्चा करेंगे। लेकिन खुद को उन संबंधों का विकास करने से नहीं रोक सकते जिनमे हम सहयोग कर सकते हैं। और इसी तरह यह हमारा सबसे बड़ा कारोबारी भागीदार बन गया। या वह विश्व मंच पर हमसे सहयोग कर रहा है जहां हमारे साझा हित हैं। हमने डब्ल्यूटीओ, जलवायु परिवर्तन वार्ताओं पर साथ-साथ काम किया।’उन्होंने कहा कि चीन बदल गया, भारत बदल गया। स्थिति बदल गई। इसलिए अब तक जो चला आ रहा था, वह अब काम नहीं करेगा। भारत-चीन के संबंध तनाव की स्थिति में हैं। मेनन ने कहा ‘आपको एक नई व्यवस्था तलाशने की जरूरत है, संबंधों में एक नया समीकरण, जो आपको चीनियों के साथ बातचीत कर बनाने की जरूरत है। आपके और उनके मुख्य हित क्या हैं, कहां यह हित आपस में टकराते हैं, कहां तनाव है और आप इससे किस तरह निपटने जा रहे हैं।’ अपने शानदार राजनीतिक करियर में चीन में भारतीय राजदूत की भूमिका निभा चुके मेनन ने चेताया कि ऐसा न होने पर आप इसे बिल्कुल धीरे-धीरे वाली स्थिति में छोड़ देंगे जो कि खतरनाक है। क्योंकि यह कोई नहीं जानता कि इनमें से कौन सा मुद्दा खतरनाक बन सकता है और आपके लिए समस्या बन सकता है।

 

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First Published on October 13, 2016 4:43 am

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