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वही मुल्ला उमर, वही मौत की ‘खबर’

बीबीसी ने खबर दी कि मुल्ला उमर मारा जा चुका है तो यह तमाम मीडिया में सुर्खियां बनी। अफगान सरकार के सूत्रों के हवाले से यह भी लिखा गया कि उसकी मौत दो-तीन साल पहले ही हो चुकी है। इससे आगे-पीछे की कोई जानकारी यह कहते हुए नहीं दी गई कि सरकारी सूत्रों ने इससे अधिक कोई ब्योरा नहीं दिया है।
Author July 30, 2015 08:54 am
तालिबान प्रमुख मुल्ला उमर की मौत की खबर को व्‍हाइट हाउस ने बताया ‘विश्‍वसनीय’

बीबीसी ने खबर दी कि मुल्ला उमर मारा जा चुका है तो यह तमाम मीडिया में सुर्खियां बनी। अफगान सरकार के सूत्रों के हवाले से यह भी लिखा गया कि उसकी मौत दो-तीन साल पहले ही हो चुकी है। इससे आगे-पीछे की कोई जानकारी यह कहते हुए नहीं दी गई कि सरकारी सूत्रों ने इससे अधिक कोई ब्योरा नहीं दिया है।

इस खबर के थोड़ी देर बाद अफगानिस्तान के राष्ट्रपति के उप प्रवक्ता सैय्यद जफर हाशमी ने ट्वीट के जरिए मीडिया को प्रेस कांफ्रेंस के लिए बुलाया। फिर अफगान सरकार की तरफ से यह बयान आया कि मीडिया में मुल्ला उमर के मारे जाने की खबर देखने के बाद वह इस बात की जांच कर रही है कि क्या मुल्ला उमर की सचमुच में मौत हो चुकी है। सवाल उठता है कि अगर अफगानिस्तान सरकार के तथाकथित सूत्र के हवाले से यह खबर आई तो सरकार ने फिर इसके पक्ष में सबूत क्यों नहीं पेश किए। और यह भी कि अगर बीबीसी ने इसे ब्रेकिंग न्यूज की तरह चलाया तो वह कुछ और ब्योरा क्यों नहीं दे पाई?

ऐसा नहीं है कि उमर के मौत की खबर पहली बार आई हो। पहले भी कई बार ऐसा हो चुका है, लेकिन कभी तस्दीक नहीं हुई। तालिबान इसे नकारता रहा है। यहां तक कि तालिबान ने ईद के मौके पर इस 15 जुलाई 2015 को भी मुल्ला उमर के नाम से बधाई संदेश जारी किया।

उमर के जिंदा रहने के जितने दावे हैं, उसके नहीं रहने के भी उतने ही इशारे हैं। पूर्व अफगान तालिबान के एक मंत्री ने पाकिस्तान के एक अखबार को बताया था कि उसकी मौत 2013 में टीबी से हो चुकी है। यह भी कहा गया कि उसे अफगानिस्तान की जमीन पर ही दफनाया गया। उसके बेटे ने उसके शव की पहचान भी की।

इससे अलग, तालिबान से टूटकर अलग हुए एक ग्रुप अफगानिस्तान इस्लामिक मूवमेंट फिदायीन महाज के प्रवक्ता कारी हमजा के मुताबिक, मुल्ला उमर जुलाई 2013 में ही मुल्ला अख्तर मुहम्मद मंसूर और गुल आगा की गोलियों का शिकार हुआ। हमजा ने यह भी दावा किया कि उसके पास इस बात के सबूत हैं, लेकिन अफगान सरकार या पश्चिमी मीडिया ने इसे उस तवज्जो के साथ नहीं उठाया।

मुल्ला उमर कहां है, इस बात को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। अमेरिकी सहित कई खुफिया एजंसियां मानती हैं कि वह पाक अफगान सीमा के आसपास कहीं छुपा है जबकि कुछ का मानना है कि ओसामा बिन लादेन की तरह वह भी पाकिस्तान में शरण लिए हुए है। मुल्ला बरादर की पाकिस्तान में गिरफ्तारी के बाद इस अंदेशे को और हवा मिली कि वह क्वेटा या कराची के पास सुरक्षित जगह पर है। लेकिन उसके अते-पते को लेकर भरोसे के साथ कभी कुछ कहा नहीं गया।

एक बड़ी दिलचस्प बात इस बार मुल्ला उमर के मारे जाने की खबर की टाइमिंग को लेकर भी है। कहा जा रहा है कि तालिबान में नए मुखिया के चुनाव को लेकर बुधवार को ही एक बैठक हुई है। इसमें मुल्ला उमर की तरफ से ही नियुक्त दो सहायकों में से एक मुल्ला बरादर को मुखिया बनाए जाने को लेकर चर्चा हुई। बरादर को पाकिस्तान में गिरफ्तार किया गया था और बाद में उसे कई अन्य तालिबानी कैदियों के साथ इस दलील के साथ रिहा कर दिया गया था कि इससे तालिबान और अफगान सरकार के बीच शांति वार्ता को शुरू करने में मदद मिलेगी। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि अगर मुल्ला उमर जिंदा है तो नए मुखिया के चुनाव का सवाल क्यों? क्या तालिबान पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए ऐसा किया जा रहा है ताकि उसकी ‘सौदा करने की ताकत’ को कम किया जा सके?

इस हफ्ते के अंत में अफगान हाई पीस काउंसिल और तालिबान के प्रतिनिधियों के बीच दूसरे दौर की शांतिवार्ता होनी है जो पाकिस्तान की मदद से हो रही है। इस बातचीत का मकसद अफगानिस्तान में चौदह साल से चल रही लड़ाई को खत्म करने के लिए रास्ता तलाशना है। दूसरे दौर की बातचीत की तारीख और जगह को लेकर थोड़ा सस्पेंस है लेकिन इसका होना तय है।

सात जुलाई को पहले दौर की बातचीत की जगह को गुप्त रखा गया था। लेकिन बाद में जााहिर हुआ कि वार्ता इस्लामाबाद के नजदीक के एक हिल स्टेशन मरी में हुई थी। इस बातचीत में मुख्य तौर पर तालिबान ने अपनी कई मांगों पर जोर दिया। इसमें यूएन में तालिबान से प्रतिबंध हटाना भी शामिल था। बातचीत की औपचारिक मेज तक पहुंचने के पहले अफगान और तालिबान के प्रतिनिधियों के बीच कई अनौपचारिक दौर की बातचीत हुई।

यह अलग बात है कि सवाल इस पर भी उठते रहे हैं कि अगर तालिबान के साथ शांतिवार्ता किसी नतीजे पर पहुंच ही गई तो क्या अफगानिस्तान में सक्रिय आतंकवादियों के तमाम धड़े इसे मानेंगे। लेकिन मुल्ला उमर की मौत पर सरकारी सबूत पेश किए जाने तक और तालिबान के इसे मान लिए जाने तक यह सवाल बना रहेगा कि आखिर अभी इस खबर को ‘चलाने’ के पीछे कहीं कोई अंतरराष्ट्रीय कूटनीति तो नहीं?

(टिप्पणीकार एनडीटीवी से संबद्ध हैं)

उमाशंकर सिंह

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