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पेशावर : तालिबानी कहर, 25 मौत, हमलावरों ने बाचा खान विश्वविद्यालय में बरसार्इं गोलिया

उत्तर पश्चिमी पाकिस्तान के अशांत खैबर पख्तूनख्वा सूबे में बुधवार सुबह भारी हथियारों से लैस तालिबान के आत्मघाती हमलावर मशहूर बाचा खान विश्वविद्यालय में घुस गए और छात्रों और शिक्षकों पर अंधाधुंध गोलीबारी की।
Author पेशावर | January 21, 2016 04:17 am
तालिबानी हमले के बाद बाचा खान विश्वविद्यालय परिसर में बिखरा खून। (photo: Agency)

उत्तर पश्चिमी पाकिस्तान के अशांत खैबर पख्तूनख्वा सूबे में बुधवार सुबह भारी हथियारों से लैस तालिबान के आत्मघाती हमलावर मशहूर बाचा खान विश्वविद्यालय में घुस गए और छात्रों और शिक्षकों पर अंधाधुंध गोलीबारी की। इस खूनी हमले में कम से कम 25 लोग मारे गए और 50 अन्य घायल हो गए। पाक सुरक्षा दस्तों का दावा है कि सभी हमलावरों को मार गिराया है। सेना के एक प्रवक्ता ने देर शाम बताया कि हमलावर चार से दस लोग हो सकते हैं। अपुष्ट सूत्रों ने आतंकी हमले में मरने वालों की तादाद तीस तक बताई है। अंतरराष्ट्रीय बिरादरी ने इस हमले की भर्त्सना की है। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमले की निंदा करते हुएमृतकों के प्रति संवेदना जताई है।

पेशावर पुलिस ने बताया कि बंदूकधारी प्रांत के चारसद्दा जिला स्थित बाचा खान विश्वविद्यालय में घुस गए और उन्होंने कक्षाओं और छात्रावासों में छात्रों और शिक्षकों पर गोलियां चलानी शुरू कर दीं। यह विश्वविद्यालय पेशावर के दक्षिण पश्चिम में करीब 50 किलोमीटर दूर स्थित है। इस विश्वविद्यालय का नाम प्रसिद्ध गांधीवादी नेता और स्वतंत्रता सेनानी खान अब्दुल गफ्फार खान उर्फ बाचा खान के नाम पर रखा गया है। जब विश्वविद्यालय परिसर के भीतर विस्फोटों और भारी गोलीबारी की आवाज सुनी गई, तब वहां बादशाह खान की बरसी के मौके पर एक काव्य संगोष्ठी चल रही थी। बादशाह खान का 20 जनवरी, 1988 को निधन हो गया था।

पाकिस्तान तहरीके-इंसाफ पार्टी के नेता और प्रांतीय सांसद शौकत यूसुफजई ने कहा कि विश्वविद्यालय में सुबह हुए आतंकवादी हमले में एक प्रोफेसर समेत 25 लोगों की मौत हो गई और 50 अन्य लोग घायल हो गए। घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। शहर के सभी अस्पतालों में आपात स्थिति की घोषणा कर दी गई है। इलाके में सभी स्कूलों को बंद कर दिया गया है। इससे पहले पेशावर में दिसंबर, 2014 को सेना संचालित एक स्कूल में तालिबान आतंकियों ने हमला कर 150 लोगों की जान ले ली थी। यूसुफजई ने कहा कि इस हमले को चार से दस हमलावरों ने अंजाम दिया। उन्होंने कहा, इस प्रकार के कायरतापूर्ण हमले आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में सरकार के इरादों को हिला नहीं सकते। हमले के तुरंत बाद सुरक्षा बलों की एक बड़ी टुकड़ी घटनास्थल पर पहुंची और छात्रों को सुरक्षित बाहर निकालना शुरू कर दिया।

पाकिस्तान सेना के बल भी पेशावर से विश्वविद्यालय के लिए रवाना हुए और उन्होंने वहां पहुंचकर अभियान शुरू किया। सेना के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल असीम सलीम बाजवा ने ट्विटर पर लिखा कि विश्वविद्यालय को खाली कराने के सुरक्षा बलों के अभियान के दौरान चार आतंकवादी मारे गए। उन्होंने ट्वीट किया, निशानेबाजों ने छत पर दो और आतंकवादियों को मार गिराया। अब तक चार आतंकवादी मारे गए हैं। सेना ने पूरी इमारत और छत पर कब्जा कर लिया है। बाजवा ने कहा, सैन्यबल ब्लॉक दर ब्लॉक के आधार पर विश्वविद्यालय को खाली करा रहे हैं।

इससे पहले विश्वविद्यालय ब्लॉक के भीतर से गोलीबारी कर रहे दो आतंकवादियों को सेना ने मार गिराया। आतंकवादियों को विश्वविद्यालय के दो ब्लॉकों में सीमित कर दिया गया और सैन्य बल और कमांडो ने अभियान में हिस्सा लिया। सेना ने कहा कि अभियान पूरा हो गया है और सुरक्षा बलों ने सभी आतंकियों को मार गिराया। तहरीके-तालिबान पाकिस्तान ने इस हमले की जिम्मेदारी लेते हुए कहा कि उसके चार हमलावरों ने इसे अंजाम दिया। आतंकी समूह के एक प्रवक्ता ने मीडिया घरानों को फोन कर कहा कि यह हमला पेशावर स्कूल में हमले के बाद से सुरक्षा बलों द्वारा मारे गए उसके लोगों का बदला है। उसने हमले जारी रहने की चेतावनी दी।

विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ फजल रहीम ने बताया कि विश्वविद्यालय के अंदर 3,000 से अधिक छात्र और 600 अतिथि थे जो अब्दुल गफ्फार खान की बरसी के मौके पर काव्यगोष्ठी के लिए वहां आए थे। सेना प्रमुख जनरल राहिल शरीफ पेशावर के कोर कमांडर और दूसरे शीर्ष सैन्य अधिकारियों के साथ घटनास्थल पर पहुंचे जहां उन्हें अभियान की जानकारी दी गयी। खैबर पख्तूनख्वा के गर्वनर सरदार महताब अहमद खान भी वहां मौजूद थे। जियो टीवी ने अपनी खबर में बताया कि मृतकों में रसायन विभाग के प्रोफेसर हामिद हुसैन शामिल हंै।

खबर में कहा गया, बाहर निकलने के बाद विश्वविद्यालय के एक शिक्षक ने बताया कि रसायन विभाग के अध्यक्ष हामिद आतंकवादियों की गोलीबारी में मारे गए हैं। खबर में बताया गया है कि आतंकी उनके कक्ष में घुसे और हामिद के सिर में गोली मारी। उनकी तुरंत मौत हो गई। राष्ट्रपति ममनून हुसैन और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने आतंकवादी हमले की निंदा की और सुरक्षा एजंसियों को विश्वविद्यालय को जल्द से जल्द आतंकवादियों से खाली कराने का निर्देश दिया।

प्रधानमंत्री शरीफ के प्रवक्ता ने बताया कि प्रधानमंत्री खुद स्थिति पर नजर रख रहे हैं और उन्हें ताजा गतिविधियों की जानकारी दी जा रही है। शरीफ ने आतंकवादी हमले में लोगों की कीमती जानें चली जाने पर दुख व्यक्त किया और कहा कि निर्दोष छात्रों और नागरिकों पर हमला करने वालों का कोई धर्म नहीं होता। उन्होंने कहा, सरकार उनका सफाया करने के लिए प्रतिबद्ध है। नेशनल असेंबली के स्पीकर और डिप्टी स्पीकर, पंजाब, खैबर पख्तूनख्वा और सिंध के मुख्यमंत्रियों और तहरीके -इंसाफ के प्रमुख इमरान खान ने भी हमले की निंदा की है।

ब्रिटेन के दौरे पर गए प्रांत के मुख्यमंत्री परवेज खट्टक अपना दौरा बीच में ही छोड़ते हुए वापस लौट रहे हैं। विपक्षी आवामी नेशनल पार्टी ने दस दिनों के शोक की घोषणा की है। डॉन की खबर के अनुसार, खैबर-पख्तूनख्वा के सांसद अरशद अली ने कहा कि हमलावर विश्वविद्यालय की दीवारें फांदकर उसमें घुसे। रेस्क्यू 1122 के एक अधिकारी के हवाले से डॉन ने कहा कि छात्रावास का छात्र खंड प्रभावित हुआ है और पीड़ितों में अधिकतर को गोलियां लगी हैं। इसमें कहा गया कि एधी के एक स्वयंसेवी ने कम से कम 15 लोगों के शव देखे थे।

सरहदी गांधी की बरसी पर हुआ खूनखराबा

बाचा खान विश्वविद्यालय का नाम सरहदी गांधी के नाम से विख्यात रहे स्वतंत्रता सेनानी और ‘खुदाई खिदमतगार’ खान अब्दुल गफ्फार खान के नाम पर रखा गया है। छह फरवरी 1890 में जन्मे सरहदी गांधी यानी बादशाह खान पश्तो के ‘बाचा खान’ या पाचा खान के नाम से लोगों के बीच मकबूल थे। फिरंगी राज में पख्तूनों को जंगे-आजादी के लिए लामबंद किया और महात्मा गांधी के सिद्धांतों पर आस्था जताई। वे अमनपरस्त और अध्यात्मिक इंसान थे और जिन्ना की विभाजनकारी मांग के खिलाफ थे। 1929 में बादशाह खान ने ‘खुदाई खिदमतगार’ आंदोलन के जरिए गोरी हुकूमत की नींद उड़ा दी थी। बंटवारे के बाद वे पाकिस्तान में तानाशाह हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाते रहे और उन्हें कई बार जेल में बंद रहना पड़ा। पाकिस्तान जाने के बाद भी वे भारतीय नेताओं के संपर्क में रहे। 1987 में उन्हें भारत रत्न से नवाजा गया था। एक साल बाद 20 जनवरी 1988 को पेशावर में उनकी मौत हो गई। उनकी अंतिम इच्छा के मुताबिक उन्हें अफगानिस्तान के जलालाबाद में दफनाया गया।

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