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अमेरिका-फिलीपीन ने किया दक्षिण चीन सागर में युद्धाभ्यास, भड़का चीन

चीनी विदेश मंत्रालय ने पेंटागन के उस बयान पर अपना रुख स्पष्ट किया है, जिसके तहत कहा गया था कि दक्षिण चीन सागर में अमेरिका-फिलीपीन की संयुक्त गश्तें ‘नियमित’ रूप से होंगी।
Author बेजिंग | April 16, 2016 18:55 pm
दक्षिणी चीन सागर (फाइल फोटो)

चीन ने दक्षिण चीन सागर में अमेरिका और फिलीपीन की संयुक्त गश्तों का ‘कड़ा विरोध’ जताते हुए कहा कि यह ‘हानिकारक’ कदम क्षेत्रीय विरोधों को भड़काएगा और इस विवादित क्षेत्र की शांति और स्थिरता को नुकसान पहुंचाएगा। चीनी विदेश मंत्रालय ने पेंटागन के उस बयान पर अपना रुख स्पष्ट किया है, जिसके तहत कहा गया था कि दक्षिण चीन सागर में अमेरिका-फिलीपीन की संयुक्त गश्तें ‘नियमित’ रूप से होंगी। मंत्रालय ने कहा कि चीन ‘किसी भी देश द्वारा किसी भी रूप में चीन की संप्रभुता और सुरक्षा का उल्लंघन किए जाने के खिलाफ कड़ा विरोध’ जताता है। विदेश मंत्रालय ने सरकारी अखबार ‘चाइना डेली’ को बताया, सैन्य आदान-प्रदान के तहत किसी तीसरे पक्ष को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। यहां यह बताने की जरूरत नहीं है कि चीन की संप्रभुता और सुरक्षा से छेड़छाड़ करने के लिए कुछ देशों को सहयोग देने से क्षेत्रीय विरोध भड़कते हैं ओर इससे क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को नुकसान पहुंचता है। चीनी रक्षा मंत्रालय ने एक बयान में कहा, दक्षिण चीन सागर में अमेरिका और फिलीपीन के बीच संयुक्त गश्तों से क्षेत्र का सैन्यीकरण हुआ है। यह क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए नुकसानदायक है।

मंत्रालय का यह बयान अमेरिका की ओर से गुरुवार (14 अप्रैल) को यह कहे जाने के बाद आया है कि उसने फिलीपीन के साथ दक्षिण चीन सागर में संयुक्त गश्त शुरू किया है और 275 सैनिक और पांच हमलावर विमान अस्थायी तौर पर फिलीपीन में मौजूद रहेंगे। अमेरिका के रक्षा मंत्री एश्टन कार्टर ने गुरुवार को मनीला में इस बात की पुष्टि की कि अमेरिका और फिलीपीन ने पहले भी इस तरह के गश्त आयोजित किए हैं। बयान में कहा गया, चीनी सेना स्थिति पर करीब से निगाह रखेगी और चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता और समुद्री हितों की दृढ़ता के साथ रक्षा करेगी। मंत्रालय ने कहा कि अमेरिका और फिलीपीन सैन्य गठबंधन को मजबूत कर रहे हैं, अग्रिम मोर्चे पर सैन्य तैनाती बढ़ा रहे हैं और विशिष्ट लक्ष्यों को लेकर संयुक्त सैन्य अभ्यास करना शीत युद्ध वाली मानसिकता को दर्शाता है। यह दक्षिण चीन सागर की शांति व स्थिरता के खिलाफ है।

मंत्रालय ने कहा, हम संबंधित पक्षों से अपील करते हैं कि वे दक्षिण चीन सागर में शांति एवं स्थिरता बनाए रखने के क्षेत्रीय देशों के प्रयासों का सम्मान करें। मंत्रालय के अधिकारियों ने अखबार को बताया कि बीजिंग इस क्रम में होने वाले बदलावों पर नजर रखेगा। उन्होंने कहा कि दक्षिण चीन सागर में सामान्य स्थिरता को ‘चीन और संबंधित देशों के संयुक्त प्रयासों के जरिए’ बनाए रखा गया है।अमेरिका और फिलीपीन के संयुक्त गश्त की खबर देते हुए ग्लोबल टाइम्स ने कहा, अमेरिका भारत और फिलीपीन को छोटे नाटो के रूप में शामिल करने की दिशा में बढ़ रहा है।

दक्षिण चीन सागर पर हाइनान के विशेषज्ञ लिउ फेंग ने ग्लोबल टाइम्स से कहा कि अमेरिका द्वारा दक्षिण चीन सागर में उठाए गए कदमों से प्रदर्शित होता है कि वह एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अपनी छोटी-नाटो संरचना में भारत और फिलीपीन को शामिल करना चाहता है। लगभग पूरे दक्षिण चीन सागर पर चीन के दावों को लेकर उसके और फिलीपीन, वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान के बीच विवाद रहा है। फिलीपीन इस विवाद को ‘यूएन कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ सीज’ (यूएनसीएलओएस) में लेकर गया था। न्यायाधिकरण की कार्यवाही का चीन ने बहिष्कार किया था। पीएलए नेवल मिलिट्री स्टडीज रिसर्च इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ शोधकर्ता झांग जुन्शी ने कहा कि अमेरिका संयुक्त गश्तों के जरिए दक्षिण चीन सागर में शांति को नुकसान पहुंचाएगा। कार्टर ने फिलीपीन के रक्षा मंत्री वोल्टायर गैजमिन के साथ मनीला में एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में इन गश्तों की पुष्टि की। खबरों में कहा गया है कि पहली संयुक्त गश्त मार्च में और दूसरी इस माह की शुरुआत में हुई।

कार्टर ने कहा कि अमेरिकी बलों को फिलीपीन के और अधिक सैन्य अड्डों तक पहुंच मिलेगी। इनमें से पांच की घोषणा तो पहले ही हो चुकी है। चीन के राष्ट्रीय रक्षा मंत्रालय ने कहा, अमेरिकी सेना अब लौट आई है। उसने फिलीपीन में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई है और दक्षिण चीन सागर में सैन्यीकरण को बढ़ावा दिया है। कार्टर ने भारत की तीन दिवसीय यात्रा के बाद फिलीपीन की यात्रा की। कार्टर की भारत यात्रा के दौरान भारत और अमेरिका ने सैन्य साजो सामान आपूर्ति से जुड़ा समझौता करने का फैसला किया ताकि एक दूसरे के अड्डों तक पहुंच प्राप्त की जा सके।

हालांकि पर्रीकर और कार्टर ने यह स्पष्ट कर दिया कि आगामी कुछ ‘सप्ताहों’ या ‘महीनों’ में हस्ताक्षरित होने वाले इस समझौते में अमेरिकी सैनिकों की भारत की धरती पर तैनाती को आवश्यक नहीं बनाती । इस घोषणा पर चीन ने सावधानी के साथ प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत एक प्रभावशाली देश है, जिसकी अपनी एक स्वतंत्र विदेश नीति है। हालांकि इसके साथ ही उसने यह संकेत भी दिया कि वह इस मुद्दे को रक्षामंत्री मनोहर पर्रीकर की अगले सप्ताह होने वाली यात्रा के दौरान उठा सकता है। लियु ने कहा कि चीन को रूस और फिजी जैसे देशों द्वारा समर्थित विमर्शों और बातचीत के जरिए दक्षिण चीन सागर के मुद्दे को सुलझाने का अपना रुख बरकरार रखना चाहिए। इससे पहले चीनी मंत्रालय ने जी सात देशों के विदेश मंत्रियों के दूतों को तलब कर हिरोशिमा में दिए गए बयान पर विरोध दर्ज कराया था। चीन ने इस दौरान पूर्व और दक्षिण चीन सागर की स्थितियों पर चिंता जाहिर की थी।

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