December 08, 2016

ताज़ा खबर

 

सऊदी अरब में पहली बार चुनाव लड़ने वाली महिला ने बयां किया दर्द…

फादिया डॉक्यूमेंट्री में कहती हैं, "मौत दो तरह की होती है। एक जब अल्लाह इंसान के जिस्म से रूह निकाल लेता है लेकिन उससे भी बुरी मौत वो होती है जिसमें आदमी जीता तो है लेकिन उसका कोई निशान नहीं होता।"

सऊदी अरबी की महिलाएं (फाइल फोटो)

सऊदी अरब महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा पाबंदी वाले देशों में एक है लेकिन जब साल 2011 में सऊदी प्रशासन ने महिलाओं को नगरपालिका का चुनाव लड़ने की इजाजत देने की घोषणा की तो पहली बार किसी देश के नगरपालिका चुनाव अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आए। नए कानून के तहत दिसंबर 2015 में नगरपालिका चुनाव हुए और करीब 900 महिलाओं ने चुनाव में हिस्सा लिया। चुनाव परिणाम आए तो पूरे देश में 21 महिला प्रत्याशी (कुल सीटों का करीब एक प्रतिशत) विजयी घोषित की गईं। लेकिन सऊदी महिलाओं द्वारा इतिहास में पहली बार किसी भी तरह का चुनाव लड़ने का अनुभव कैसा रहा ये न्यूयॉर्क टाइम्स की पत्रकार मोना अल नग्गार ने अपनी नई डॉक्यूमेंट्री “लेडीज फर्स्ट” में दिखाया है।

नगरपालिका पार्षदों के पास सड़कों और नालियों के रखरखाव और देखभाल के अलावा कोई काम नहीं होता फिर भी सऊदी महिलाओं के चुनाव लड़ना आजादी की एक नई आहट की तरह था। लेकिन मोना की डाक्यूमेंट्री से साफ है कि ये चुनाव केवल दिखावा भर था। चुनाव जीतने वाली महिलाओं को नगरपालिका की बैठकों में जाने की इजाजत तक नहीं है। वो केवल टेलीकॉन्फ्रेंशिंग के जरिए इन बैठकों में हिस्सा ले सकती हैं।

वीडियो: लापता साथी की खोज के लिए जेएनयू के छात्रों ने किया प्रदर्शन- 

मोना ने चुनाव घोषित होने के बाद नगरपालिका चुनाव लड़ने वाली तीन महिलाओं के चुनाव प्रचार पर नजर रखनी शुरू की। मोना ने डॉक्टर फादिया, रीम अल सुवैह और लूजैन अल हैथलव से संपर्क किया। हालांकि सामाजिक कार्यकर्ता लूजैन को प्रशासन ने चुनाव नहीं लड़ने दिया। लूजैन खुले आम पर्दा, महिलाओं को गाड़ी न चलाने देने का विरोध करती रही हैं। जो दो प्रत्याशी चुन लड़ सकीं उनका अनुभव भी ज्यादा अच्छा नहीं रहा। सऊदी महिलाओं की हालत पर टिप्पणी करते हुए फादिया डॉक्यूमेंट्री में कहती हैं, “मौत दो तरह की होती है। एक जब अल्लाह इंसान के जिस्म से रूह निकाल लेता है लेकिन उससे भी बुरी मौत वो होती है जिसमें आदमी जीता तो है लेकिन उसका कोई निशान नहीं होता।”

Read Also: सऊदी अरब में राजकुमार को ही दे दी फांसी, किया था दोस्त का मर्डर

डॉक्यूमेंट्री के अनुसार सऊदी अरब में नगरपालिका चुनाव के दौरान महिलाओं को प्रचार की इजाजत नहीं दी गई। फादिया के पास प्रचार करने का एकमात्र माध्यम था, “स्नैपचेट” जबकि पुरुष प्रत्याशी आराम से प्रचार कर सकते थे। सऊदी अरब में महिलाओं को यात्रा, नौकरी और बैंक अकाउंट खोलने के लिए अपने पतियों या अभिभावक की इजाजत लेनी होती है। चुनाव में पुरुष प्रत्याशी महिलाओं वोटरों की परवाह भी नहीं करते क्योंकि देश के कुल दो करोड़ वोटरों में केवल एक लाख 30 हजार महिला वोटर हैं। इसलिए उनकी जीत या हार पर महिला वोटरों के मतों का ज्यादा असर नहीं होता। चुनाव लड़ने वाली महिलाओं के लिए सबसे दुखदायी ये रहा कि सऊदी सरकार केवल जीतने वाले के नाम की घोषणा करती है इसलिए चुनाव हारने वाली जान नहीं सकतीं कि उन्हें कितना वोट मिला था या वो जीत के कितने करीब पहुंची थीं।

डाक्टर फादिया ने चुनाव में केवल स्नैपचैट के जरिए प्रचार किया। (न्यूयॉर्क टाइम्स की डाक्यूमेंट्री लेडीज फर्स्ट का स्क्रीन शॉट) डाक्टर फादिया ने चुनाव में केवल स्नैपचैट के जरिए प्रचार किया। (न्यूयॉर्क टाइम्स की डाक्यूमेंट्री लेडीज फर्स्ट का स्क्रीन शॉट)

लेकिन चुनाव के उलट शिक्षा के मामले में सऊदी महिलाएं पुरुषों से काफी आगे हैं। डॉक्यूमेंट्री के अनुसार सऊदी अरब में स्नातक लड़कियों की संख्या लड़कों से करीब दोगुनी है। सऊदी अरब में पहला गर्ल्स स्कूल 1960 में खुला था। यानी पिछले पांच दशकों में शिक्षा के मामले में महिलाएं पुरुषों से काफी आगे रही हैं। लेकिन शिक्षा में ये महिलाएं भले ही आगे निकलती जा रही हों सऊदी अरब का इस्लामी प्रशासन अभी उन्हें बराबर नागरिक मानने को नहीं तैयार है। सऊदी में अभी तक महिलाओं को गाड़ी चलाने की इजाजत नहीं है ऐसे में अपनी जिंदगी की दिशा खुद तय करने की अधिकार देने के बारे में सोचना फिलहाल संभव नहीं दिखता।

Read Also: अमेरिकी युवती से ऑनलाइन फ्लर्ट करने पर सऊदी अरब के किशोर को जेल, ललचाने वाले वीडियो बनाने का आरोप

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on October 24, 2016 12:44 pm

सबरंग