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पूर्व पाक एयर कमोडोर ने लिखा- 1965 में पाकिस्तान ने भारत को हल्के में लेकर युद्ध के लिए भड़काया

पाकिस्तान के पूर्व एयर कमोडोर सज्जाद हैदर के अनुसार 1965 में ऑपरेशन जिब्राल्टर की योजना बनाने वाले पाकिस्तानी नेतृत्व ने सोचा था कि भारत युद्ध छेड़ने की हिम्मत नहीं करेगा।
1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण करने वाले कुछ पाकिस्तानी जवान। (Express archive photo)

पाकिस्तान आधिकारिक तौर पर नहीं मानता कि 1965 में कश्मीर में घुसपैठ की योजना उसने बनायी थी। पाकिस्तानी सेना के ऑपरेशन जिब्राल्टर का मकसद था कश्मीर को भारत से अलग करना। इस घुसपैठ के बाद ही भारत और पाकिस्तान के बीच पहला युद्ध ( 1965) शुरू हो गया था। युद्ध में पाकिस्तानी सेना को भारत के हाथों मुंह की खानी पड़ी थी। हालांकि पाकिस्तानी अखबार डॉन में लिखे अपने लेख में पाकिस्तानी सेना के पूर्व एयर कमोडोर सज्जाद हैदर ने माना है कि ऑपरेशन जिब्राल्टर ने ही भारत को युद्ध के लिए भड़काया और ये ऑपरेशन पाकिस्तानी शीर्ष नेताओं के दिमाग की उपज था।

सज्जाद हैदर लिखते हैं, “निस्संदेह 1965 में भारत ने बगैर किसी उकसावे के हमला नहीं किया था, ये ऑपरेशन जिब्राल्टर की विफलता और ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम से उपजे खतरे का परिणाम था। सज्जाद हैदर के अनुसार कश्मीर में घुसपैठ की योजना मूलतः जुल्फीकार अली भुट्टो और अज़ीज़ अहमद के दिमाग की उपज थी जिस पर फील्ड मार्शल से राष्ट्रपति बने अयूब खान और उनके चुने पाक सेना प्रमुख (कमांडर इन चीफ) मूसा खान ने अमल किया।”

हैदर लिखते हैं कि पाकिस्तानी नेताओं और उच्च सैन्य अधिकारियों ने युद्ध रणनीति के बारे में अपने “बैरक से बटालियन तक” के ज्ञान के आधार पर सोच लिया कि भारत चूं तक नहीं करेगा और कश्मीर खो देगा और वो युद्ध छेड़ने की हिम्मत नहीं करेगा। उन्हें लगा कि इस जीत से राष्ट्रपति की पाकिस्तान में स्थिति मजबूत होगी और उनके सभी दरबारियों का भविष्य सुनहरा हो जाएगा।

सज्जाद हैदर के अनुसार ऑपरेशन जिब्राल्टर को कोई ठोस रणनीतिक योजना के बनाए बगैर, कश्मीर के स्थानीय लोगों से किसी ज्ञात संपर्क या सहानुभूति के बिना शुरू किया गया था। हैदर के अनुसार पाक सेना ने ऑपरेशन के लिए दस्ता बनाने की योजना या तैयारी भी सही से नहीं की थी। हैदर के अनुसार करीब आठ हजार (ज्यादातर गैर-सैनिक) लड़ाकों को परिणाम के बारे में सोचे बिना मौत के मुंह में झोंक दिया गया था। इनमें से ज्यादातर लोग को मुजफ्फराबाद इलाके से भर्ती किया गया था। उनका नेतृत्व आजाद कश्मीर (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर) की एक नियमित बटालियन कर रही थी। कुछ अति प्रशिक्षित कमांडो भी उनके साथ भेजे गए थे।

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हैदर लिखते हैं कि पाकिस्तानी सेना के तत्कालिन सैन्य प्रमुख ने अपने संस्मरण में लिखा है कि “आजाद कश्मीर के लड़ाकों को रावलपिंडी में छह से आठ हफ्ते तक गोरिल्ला युद्ध के लिए प्रशिक्षित किया गया था। कुछ पल के लिए सोचिए: छह से आठ हफ्ते। हो चि मिन्ह, चाऊ एन लाई, बेन बेला और चे ग्वेरा ये सुनकर अपनी-अपनी कब्रों में करवट बदल रहे होंगे।” 1965 के युद्ध में पाकिस्तानी सेना की भूमिका का बचाव करने वाले इस लेख में हैदर लिखते हैं कि देश को अब तक ये नहीं बताया गया है कि सतही, गैर-पेशेवर और बचकाने नेतृत्व के बावजूद पाक सेना ने युद्ध में बेहतर प्रदर्शन किया था।

पाकिस्तान में हर साल 1965 के युद्ध के समय सैनिकों की बहादुरी का जश्न मनाने पर कटाक्ष करते हुए हैदर ने लिखा है, “1965 के युद्ध में हार मिलने के बाद पाकिस्तानी सेना के सबसे बड़े अधिकारी और राष्ट्रपति के करीबी लोग इस सच को छिपाने में लग गए कि उनकी गलतियों की वजह से पाकिस्तान को हजारों जानें गंवानी पड़ीं। लोगों को ये जानकार आश्चर्य होगा कि ऑपरेशन जिब्राल्टर में मरने वालों का 1965 के युद्ध से जुड़े किसी भी समारोह में जिक्र नहीं होता।” हैदर पूछते हैं, “जिन्होंने नकारापन और बेवकूफी की वो फल-फूल रहे हैं। वहीं ऑपरेशन जिब्राल्टर में कुर्बानी देने वालों की याद भी मिटा दी गई है। उनके बाल-बच्चों का क्या? क्या उन्हें शहीद नहीं घोषित किया जाना चाहिए?”

1965 में ऑपरेशन ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम के माध्यम से पाकिस्तान कश्मीर घाटी में प्रवेश के एक मात्र रास्ते अखनूर पर कब्जा करना चाहता था। हैदर के अनुसार ऑपरेशन का नेतृत्व कर रहे जनरल अख्तर हुसैन मलिक को जीत मिलने ही वाली थी कि उन्हें ऑपरेशन से अलग कर दिया गया। हैदर लिखते हैं, “उस दिन हम कश्मीर हमेशा के लिए हार गए, इसलिए नहीं कि दुश्मन ने करारा जवाब दिया था बल्कि अपने धोखेबाज और नाकारा नेतृत्व के कारण।”

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