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जापान के ओहसुमी को नोबेल चिकित्सा पुरस्कार, कोशिकाओं के ‘रीसाइकल’ के लिए मिला सम्मान

जापान के योशिनोरी ओहसुमी को ‘ऑटोफेजी’ से संबंधित उनके काम के लिए इस साल का नोबेल चिकित्सा पुरस्कार दिया जाएगा।
Author स्टॉकहोम | October 3, 2016 21:04 pm
जापान के योशिनोरी ओहसुमी। (Kyodo/via REUTER)

जापान के योशिनोरी ओहसुमी को ‘ऑटोफेजी’ से संबंधित उनके काम के लिए इस साल का नोबेल चिकित्सा पुरस्कार दिया जाएगा। ऑटोफैजी एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें कोशिकाएं ‘खुद को नष्ट करती हैं’ और उन्हें बाधित करने पर पार्किंसन एवं मधुमेह जैसी बीमारियां हो सकती हैं। ऑटोफेजी कोशिका शरीर विज्ञान की एक मौलिक प्रक्रिया है जो कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त हिस्से के सही पुनर्चक्रण के लिए जरूरी है और इसकी बेहतर समझ का मानव स्वास्थ्य एवं कैंसर सहित दूसरी बीमारियों के लिए बड़ा निहितार्थ है। नोबेल ज्यूरी ने सोमवार (3 अक्टूबर) को कहा कि ओहसुमी की खोज से ‘कोशिकाएं अपनी सामग्रियों को किस तरह पुनर्चक्रित करती हैं, इसे समझने के लिए एक नया प्रतिमान स्थापित हुआ।’ ज्यूरी ने कहा, ‘ऑटोफेजी जीन में बदलाव से बीमारियां हो सकती हैं और ऑटोफेजी की प्रक्रिया कैंसर तथा मस्तिष्क से जुड़ी बीमारियों जैसी कई स्थितियों में शामिल होती हैं।’

अनुसंधानकर्ताओं ने सबसे पहले 1960 के दशक में पता लगाया था कि कोशिकाएं अपनी सामग्रियों को झिल्लियों में लपेटकर और लाइसोजोम नाम के एक पुनर्चक्रण कंपार्टमेंट में भेजकर नष्ट कर सकती हैं। इस खोज के लिए बेल्जियम के वैज्ञानिक क्रिश्चन ड डूव को 1974 में नोबेल चिकित्सा पुरस्कार मिला था। डूव ने ही ‘ऑटोफेजी’ शब्द गढ़ा था जो यूनानी भाषा का शब्द है जिसका मतलब खुद को खाना है। ज्यूरी ने इसे ‘1990 के दशक के शुरुआती सालों में किए गए शानदार प्रयोगों की श्रृंखला’ बताया, योशिनोरी ओहसुमी ने ऑटोफेजी के लिए जरूरी जीन की पहचान करने के लिए खमीर का इस्तेमाल किया। इसके बाद ओहसुमी ने खमीर में ऑटोफेजी के लिए अंतर्निहित तंत्र को स्पष्ट किया और दिखाया कि मानव कोशिकाओं में इसी तरह की उन्नत मशीनरी का इस्तेमाल किया जाता है। उनकी इस खोज ने शारीरिक विज्ञान की बहुत सारी प्रक्रियाओं में ऑटोफेजी के महत्व की समझ का रास्ता खोल दिया जैसे कि शरीर भुखमरी को लेकर खुद को कैसे ढालता है या संक्रमण को लेकर कैसे प्रतिक्रिया करता है।

ऑटोफेजी के निष्क्रिय होने के पर्किंसन, टाइप टू मधुमेह और बुजुर्गों को होने वाली दूसरी बीमारियां के साथ संबंध स्थापित किए गए हैं।
विभिन्न बीमारियों में आॅटोफेजी को निशाना बनाने वाली दवाओं के विकास के लिए काफी अनुसंधान किया जा रहा है। 71 साल के ओहसुमी ने 1974 में तोक्यो विश्वविद्यालय से पीएचडी की थी। वह इस समय तोक्यो इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में प्रोफेसर हैं। वह नोबेल पुरस्कार जीतने वाले 23वें जापानी और चिकित्सा का नोबेल जीतने वाले छठें जापानी हैं। पुरस्कार के साथ 80 लाख स्वीडिश क्रोनोर (करीब 9,36,000 डॉलर) की राशि दी जाती है। ओहसुमी ने जापान की सरकारी प्रसारण सेवा एनएचके से कहा, ‘यह किसी भी अनुसंधानकर्ता के लिए सर्वोच्च सम्मान है।’ उन्होंने कहा, ‘मेरा लक्ष्य वह करना है जो दूसरे नहीं करना चाहते। मुझे लगा कि यह (कोशिकाओं का निष्क्रिय होना) बहुत ही रोचक है। यही से सब कुछ शुरू होता है। पूर्व में इसपर उतना ध्यान नहीं गया, लेकिन हम अब ऐसे समय में हैं जब इसपर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है।’

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