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जकार्ता के ईसाई गवर्नर पर ईशनिंदा का मुकदमा, हो सकती है 5 साल की सज़ा

वर्ष 2012 में एक व्यक्ति को फेसबुक पर ‘ईश्वर का अस्तित्व नहीं है’ लिखने पर ढाई साल कैद की सजा सुनाई गई थी।
Author जकार्ता | December 12, 2016 14:10 pm
जकार्ता के ईसाई गवर्नर बासुकी त्जहाजा पूर्णामा। (एपी फाइल फोटो)

जकार्ता के ईसाई गवर्नर बासुकी त्जहाजा पूर्णामा पर ईशनिंदा का मुकदमा चलाया जा रहा है। इंडोनेशिया में इस अपराध के लिए पांच साल तक की कैद का प्रावधान है। दुनिया की सबसे ज्यादा मुस्लिम बहुल आबादी वाले देश इंडोनेशिया में उनकी टिप्पणियों से नाराजगी फैल गई थी और इस मामले को देश में धार्मिक सहिष्णुता के परीक्षण के तौर पर देखा जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि इसके पीछे राजनीति है और गवर्नर के विरोधी उनके खिलाफ गुस्सा भड़काना चाहते हैं ताकि उनके समर्थक कम हो जाएं। पूर्णामा (50) बीती आधी सदी में जकार्ता के पहले गैर-मुस्लिम गवर्नर हैं और देश के छोटे से अल्पसंख्यक चीनी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। भीड़भाड़ भरे, असंगठित और प्रदूषित जकार्ता को बेहतर बनाने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ पूर्णामा बेहद लोकप्रिय हैं। लेकिन कट्टरपंथी इस्लामी समूहों की ओर से उनकी लगातार आलोचना की जाती है क्योंकि उन्हें यह पसंद नहीं है कि किसी गैर मुस्लिम को इंडोनेशिया की राजधानी का प्रभार दिया जाए। वह फरवरी में होने वाले चुनाव में खड़े होने वाले हैं।

सितंबर में प्रचार अभियान के दौरान पूर्णामा ने वहां मौजूद जनता से कहा था कि उनके विरोधियों ने मतदाताओं को एक धार्मिक उद्धरण के जरिए ‘बहकाकर’ किसी ईसाई को मत देने से रोका। उनका यह भाषण वायरल हो गया जिससे नरमपंथी और रूढ़िवादी दोनों तरह के मुस्लिम नाराज हो गए थे। पूर्णामा ने इसके लिए माफी भी मांग ली लेकिन इंडोनेशिया के शीर्ष इस्लामिक संगठन ने उनकी टिप्पणियों को ईशनिंदा घोषित कर दिया। नवंबर में एक लाख से ज्यादा मुस्लिमों ने उनके खिलाफ जकार्ता में प्रदर्शन किया था। राष्ट्रपति जोको विडोडो ने मामले को जल्द से जल्द सुलझाने का वादा किया था और पुलिस ने पूर्णामा को आधिकारिक तौर पर ईशनिंदा का दोषी करार दे दिया था।

इंडोनेशिया का संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की आजादी देता है लेकिन मान्यता केवल छह पंथों को ही प्राप्त है। वर्ष 1965 के बेहद कड़े नियमों के मुताबिक इन धर्मों का अपमान करने वाले और उनकी मान्यता से भटकने वाले व्यक्ति पर ईशनिंदा का आरोप लगाया जा सकता है और उसे जेल भेजा जा सकता है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि इन नियमों का इस्तेमाल शिया और अहमदिया मुस्लिमों जैसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ किया जाता है। वर्ष 2012 में एक व्यक्ति को फेसबुक पर ‘ईश्वर का अस्तित्व नहीं है’ लिखने पर ढाई साल कैद की सजा सुनाई गई थी।

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