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सीटी बजी और आधी सदी आंखों के सामने से पलभर में गुजर गई

87 साल की सुमिता मंडल शनिवार सुबह से ही बेचैन थीं उनकी आंखें रह-रह कर सामने की पटरियों की ओर चली जाती थीं।
Author कोलकाता | April 13, 2017 05:03 am
मैत्री एक्सप्रेस।

प्रभाकर मणि तिवारी

87 साल की सुमिता मंडल शनिवार सुबह से ही बेचैन थीं उनकी आंखें रह-रह कर सामने की पटरियों की ओर चली जाती थीं। आखिर जब उन्होंने दूर से डीजल इंजन की सीटी की आवाज सुनी तो उनके चेहरे पर मुस्कान उभरी। अगले कुछ ही पलों के दौरान लगभग आधी सदी उनकी आंखों के सामने से गुजर गई। कोई 60 साल पहले अपने मां-बाप और पति के साथ वे इसी ट्रेन से खुलना से यहां आई थीं। देश विभाजन से ठीक पहले। शनिवार को जब कोई 52 साल बाद खुलना (बांग्लादेश) से आने वाली पहली पैसेंजर ट्रेन ने सीमा पार पेट्रापोल स्टेशन पर प्रवेश किया तो वे अपने साथ यादों की सौगात भी साथ लेकर आई। इससे पुरानी यादें और जख्म हरे हो गए। कई लोग अपने माता-पिता के हाथ थामे इसी ट्रेन से आखिरी बार अपने वतन से यहां आए थे। वर्ष 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान यह ट्रेन सेवा बंद हो गई थी। अब दोबारा शुरू हुई इस ट्रेन सेवा ने कई को अचानक उनके बचपन में पहुंचा दिया है। उनके लिए यह महज एक ट्रेन नहीं बल्कि यादों की धरोहर है।

90 साल की कुमुद हाजरा की आंखें भी इस ट्रेन को देखते ही नम हो उठीं। उनके जेहन में अपनी शादी के बाद के उन दिनों की यादें ताजा हो गईं जब वे इसी ट्रेन से अपने माता-पिता से मिलने खुलना जाती थीं। 40 के दशक में शादी के बाद वे अपने पति के साथ बंगाल के उत्तर 24-परगना जिले के जयंतीपुर गांव में बस गई थीं। हाजरा कहती हैं कि इस ट्रेन ने उस दौर की यादों पर पड़ी समय और धूल की परतें साफ कर दी हैं। शादी के बाद वे इसी ट्रेन से अपने पति के साथ यहां आई थीं। उसके बाद वर्ष 1965 में भारत-पाक युद्ध के दौरान इसके बंद होने तक इसी ट्रेन से वे अपने माता-पिता और दूसरे रिश्तेदारों से मिलने अपने मायके जाती थीं। अब उनको खुशी और गम दोनों हैं। खुशी इस बात की कि अब बाकी लोगों को उस पीड़ा से नहीं गुजरना होगा जिससे वे कोई आधी सदी से गुजरी हैं और गम इसका कि अब इस उम्र में अपनी बीमारियों के कारण वे इस ट्रेन से सफर नहीं कर सकेंगी।

वर्ष 1947 में देश के विभाजन से बहुत पहले से ही कोलकाता से खुलना और जसोर तक नियमित ट्रेन सेवा थी। विभाजन के बाद भी यह सेवा जारी रही। लेकिन 1965 में भारत-पाक युद्ध के दौरान इसे रोक दिया गया था। वर्ष 1971 में मुक्ति युद्ध के बाद पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लादेश बनने के बावजूद यह ट्रेन सेवा बंद ही रही। 52 साल बाद इस मार्ग पर इंजन की सीटी और ट्रेन की गड़गड़ाहट की आवाज सुनने के लिए बेचैन लोग तय समय से बहुत पहले से ही पेट्रापोल स्टेशन और पटरियों के किनारे जम गए थे।पेट्रापोल के पास नरहरिपुर गांव के पंचानन राय कहते हैं कि इस ट्रेन से जिंदगी आसान हो जाएगी। पहले हमें बांग्लादेश जाने के लिए सड़क से लंबी दूरी तय करनी होती थी। अब इस ट्रेन ने खुलना को और करीब ला दिया है।

स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि इस सेवा के नियमित होने के बाद आयात-निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। इलाके के ज्यादातर लोग इस धंधे से जुड़े हैं। पहले सड़क मार्ग से सीमा पार जाने में उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना होता था।लेकिन इलाके के लोगों को एक और तकलीफ है। फिलहाल पेट्रापोल को कोलकाता से जोड़ने वाली कोई ट्रेन नहीं है। इसलिए स्थानीय लोग अब कोलकाता तक एक लोकल ट्रेन चलाने की मांग कर रहे हैं। फिलहाल कोलकाता की ट्रेन पकड़ने के लिए उनको बनगांव स्टेशन तक जाना पड़ता है। रेलवे के अधिकारियों का कहना है कि इसके लिए पटरियों का विद्युतीकरण जरूरी है। पूर्व रेलवे के डिवीजनल रेलवे मैनेजर बासुदेव पांडा कहते हैं कि इसके लिए जल्दी ही केंद्र को एक प्रस्ताव भेजा जाएगा।

 

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