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अमेरिका के सीरिया पर हमले के बाद सोना, चांदी और तेल के दाम बढ़े, जानें भारत पर क्या होगा इसका असर?

कच्चे तेल की कीमत में 1.2 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। बढ़ोतरी के बाद कच्चे तेल की कीमत 55.59 डॉलर प्रति बैरल हो गई है।
सीरिया में हमले की वजह से कच्चे तेल की कीमत के साथ-साथ सोने की कीमत में भी 0.99 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।

अमेरिका ने सीरिया पर हमला किया था। 6 अप्रैल की रात किए गए इस हमले का असर पूरी दुनिया में देखने को मिल सकता है। इस हमले के बाद से ही तेल की कीमतों में उछाल आ गया है। हमले के बाद सवाल उठ रहा है कि भारत जैसे देश जो 80% तेल मध्य पूर्वी देशों से आयात करते हैं। क्या उनके आयात की कीमतों पर असर पड़ेगा? हमले के बाद बाजार में हलचल हुई है और कुछ एक्सपर्ट्स ने भी इस बारे में अपनी राय जाहिर की है। सीरिया की असद सरकार से नाराज होकर ट्रंप के आदेश के बाद अमेरिका ने सीरिया में एयरबेस समेत अलग-अलग सैन्य ठिकानों पर 59 टॉमहॉक मिसाइल दागीं। अमेरिका ने यह कार्रवाई केमिकल अटैक के खिलाफ की है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि केमिकल हमलों के पीछे असद सरकार का हाथ है। कैमिकल हमले में बच्चों और महिलाओं समेत 100 से ज्यादा जानें जा चुकी हैं।

सीरिया में अटैक के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में हलचल हुई है। इसकी वजह से कच्चे तेल की कीमत में 1.2 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। बढ़ोतरी के बाद कच्चे तेल की कीमत 55.59 डॉलर प्रति बैरल हो गई है। वहीं सोने की कीमत में 0.99% की बढ़ोतरी हुई है। चांदी की कीमत में 0.93% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। आपको बता दें कि सीरिया मुख्य तेल उत्पादक देशों में नहीं है। सीरिया ऑर्गेनाइजेशन ऑफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (OPEC) का सदस्य भी नहीं है। भारत के ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यह बढ़ोतरी सिर्फ एक बार के लिए थी। कीमतों के लिहाज से आगे स्थिति खराब नहीं होगी।

जब विश्व स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें कम होती हैं, भारत का आयात बिल कम होता है। इससे भारत समेत तेल आयात करने वाले देशों की अर्थव्यवस्था पर बोझ कम पड़ता हैं। पिछले कुछ सालों में तेल की कीमत की बात करें तो कच्चे तेल की सबसे कम कीमत फरवरी 2016 में 33.62 डॉलर प्रति बैरल रही थी। वहीं अधिकतम कीमत की बात करें तो साल 2008 में आर्थिक मंदी के कारण कच्चे तेल की कीमत 140 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था 50-55 डॉलर की स्थिति तक आसानी से स्थिर रह सकती है। भविष्य में परिस्थिति क्या होती है, इसका जवाब देने में विशेषज्ञों ने भी असमर्थता जताई है। अगर कच्चे तेल की कीमतें कम रहेंगी तो अर्थव्यवस्था पर दबाव कम होगा।

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