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आतंक के खिलाफ लड़ाई किसी धर्म के खिलाफ लड़ाई नहीं: भारत ने सुरक्षा परिषद में कहा

अकबरुद्दीन ने कहा, ‘‘आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई किसी धर्म से टकराव नहीं है। यह मानवतावादी मूल्यों और बर्बर ताकतों के बीच संघर्ष है।"
Author संयुक्त राष्ट्र | May 13, 2016 06:29 am
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन। (फाइल फोटो)

भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कहा है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई, किसी धर्म से ‘टकराव’ नहीं है और वैश्विक शांति तथा सुरक्षा को ‘‘सर्वाधिक गंभीर खतरा’’ बनकर उभरी इस चुनौती से निपटने के लिए गहरे वैश्विक सहयोग की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन ने कहा कि कोई खास विचारधारा आतंकवादी समूहों के लिए मार्गदर्शक का काम करती है और यह उनकी असली ताकत है। उन्होंने इस बात पर अफसोस जताया कि ‘‘संकीर्ण हित’’ उन प्रतिबंधों को लागू करने के मार्ग में बाधा पैदा करते हैं जो संभावित आतंकी खतरों को सीमित कर सकते हैं।

‘‘आतंकवाद के विमर्श और उसकी विचारधाराओं से मुकाबला’’ विषय पर सुरक्षा परिषद में खुली बहस में अकबरुद्दीन ने कहा, ‘‘आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई किसी धर्म से टकराव नहीं है। यह मानवतावादी मूल्यों और बर्बर ताकतों के बीच संघर्ष है। यह एक ऐसी लड़ाई भी है जिसे हमारे मूल्यों की ताकत और धर्मो के वास्तविक संदेशों के जरिए जीता जाना चाहिए।’’

‘‘आतंकवाद को वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए सर्वाधिक गंभीर खतरों’’ में से एक बताते हुए उन्होंने कहा कि आतंकवाद के विमर्शो से मुकाबला एक दीर्घकालिक एहतियाती प्रयास है। उन्होंने इस बात पर भी चिंता जतायी कि संकीर्ण हितों ने भी अक्सर अंतरराष्ट्रीय सहयोग के कानूनी प्रारूप को तय करने में रुकावट पैदा की है। इसने उन प्रतिबंधों के प्रभावी क्रियान्वयन को भी बाधित किया है जिनसे संभावित खतरों को रोका जा सकता था।

अकबरुद्दीन ने कहा, ‘‘इसके साथ ही निगरानी और हस्तक्षेप के जरिए आतंकवाद का प्रभावी मुकाबला भी उतना ही महत्वपूर्ण है और इसके लिए गहन अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत है।’’ भारतीय दूत ने इस बात पर जोर दिया कि वैचारिक प्रारूप इन आतंकी समूहों की असली ताकत है और अतिवादी विचारधाराओं के प्रसार को रोकने के लिए उन्हें कोई मौका या स्थान नहीं मिलना चाहिए। अकबरुद्दीन ने इस बात को रेखांकित किया कि कट्टरपंथी और निहित स्वार्थ प्रेरित व्याख्याओं को चुनौती देने के लिए स्थानीय समुदायों और धार्मिक नेताओं की सक्रिय भागीदारी जरूरी हो सकती है ताकि अधिक उदारवादी शिक्षा का प्रसार किया जा सके।

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