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बच्चों की आंखों में कैद हो रहे बलूचों के कातिल: दिलशाद बलूच

बच्चों को ऐसी तालीम दी जा रही जिससे वे अपनी जड़ों से कट जाएं। स्कूलों में पढ़ाया जाता है कि इकबाल और जिन्ना ही तुम्हारा इतिहास है।
Author October 3, 2016 01:59 am
बलूचिस्‍तान से निर्वासित होकर कनाडा में रहने वाले बलूच नेता माज्‍दाक दिलशाद बलोच।

बलूचिस्तान में औरतों के क्या हालात हैं। इस सवाल पर बलूच आजादी कार्यकर्ता मजदक दिलशाद बलूच कहते हैं कि सबका एक ही जैसा हाल है और सब एक ही तरह से बहादुरी से जुल्मी हुकूमत का सामना कर रहे हैं। वहां औरतों की जनसंख्या…इस सवाल पर दिलशाद बलूच कहते हैं कि मैं आपको अचानक से पक्का आंकड़ा तो नहीं बता सकता लेकिन बराबरी पर दिखती हैं, घर-सड़क, बाहर और स्कूल हर जगह बराबरी पर दिखती हैं। कहीं-कहीं तो मर्दों से ज्यादा दिखती हैं। बहुत जुल्म सहा है और सहते हुए आगे बढ़ रहे हैं। हां औरतों को मर्दों से ज्यादा जुल्मों का सामना करना पड़ता है। महिलाओं की अस्मत लूटी जा रही है।

दिलशाद बहुत साफ जबान में उर्दू मिश्रित हिंदी बोल रहे थे। हालांकि उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान ने जोर से उर्दू मुझ पर मुसल्लत की है। बलूचिस्तान के माहौल के बारे में कहते हैं कि हमारी कबीलाई संस्कृति है। वे कहते हैं कि कबीलाई संस्कृति सबसे ज्यादा आजाद ख्याल रहती है और जम्हूरियत के जज्बे के कारण वह किसी के जेरे कब्जा नहीं रह सकती है। बलूच नेता कहते हैं कि हम एक भौगोलिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान हैं। हमारे यहां हिंदू को हिंदू बलूच बताते हैं। वहां हिंदू आराम से रहते हैं। दिल्ली में 5000 बलूचिस्तान हिंदू एसोसिएशन हैं। यह मिसाल हर क्षेत्र में नहीं मिलेगी। बलूचिस्तान का सिख, मुसलमान, ईसाई सब एक राष्टÑ की पहचान हैं। दिलशाद कहते हैं कि संसाधनों से भरा एक इलाका और छोटी सी आबादी। बलूचिस्तान उपनिवेश बनाने के लिए सर्वश्रेष्ठ योग्यता रखता है और पाकिस्तान की लालची नजर सिर्फ हमारे संसाधनों पर थी इसलिए उसने हमारा नामोनिशां मिटाने की कोशिश की।किसी भी देश, सभ्यता या संस्कृति के वाहक बच्चे ही होते हैं।

दिलशाद कहते हैं कि पाकिस्तान ने हमारा भूगोल, इतिहास और संस्कृति सब मिटाने की ठान ली है। हमारे बच्चों को ऐसी तालीम दी जा रही जिससे वे अपनी जड़ों से कट जाएं। स्कूलों में पढ़ाया जाता है कि इकबाल और जिन्ना ही तुम्हारा इतिहास है। मीर ओ बलूच के बारे में नहीं बताया जाता। पाकिस्तान सरकार के बनाए स्कूल में बच्चों को पाकिस्तान का कौमी तराना गाना सिखाया जाता है। किताबों में बलूच का मतलब बार्बेरिक (जंगली/बर्बर)और खानाबदोश बताया जाता है। लेकिन आजाद ख्याल बच्चे बलूचिस्तान की बातें भी करते हैं और अपना कौमी तराना भी गाते हैं। पाकिस्तान से आए शिक्षक फौजी अफसरों से इन बच्चों की शिकायतें करते हैं और बच्चों पर फौज जुल्म ढाती है। हर बच्चे के घर में कोई शहीद है या गायब है। वे देख रहे हैं कि कैसे बलूच लोगों को मार कर उनकी आंखें, गुर्दे निकाल कर खोखली लाशों को उनके घर के आगे फेंक दिया जाता है। लाशों पर भी पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे गोद दिए जाते हैं।
बलूच बच्चों की आंखों में अपने लोगों के कातिल कैद हो रहे हैं। और पाक फौज का यही जुल्म बलूचों की आजादी के लिए लड़ने के लिए नायक पैदा कर रहे हैं। हमारी आजादी किसी खास कबीले या फौज की लड़ाई नहीं है। छात्र, घरेलू महिलाएं, इंजीनियर और हर कामगार की लड़ाई है। इस साल पंद्रह अगस्त को लालकिले से उठा बलूचिस्तान का नाम और उसके बाद बदला माहौल। इस पर दिलशाद कहते हैं कि हम नरेंद्र मोदी जी के बहुत शुक्रगुजार हैं और अब यह महसूस कर बहुत हिम्मत बंध रही है कि हम अकेले नहीं हैं। इसका असर तो दूर तक दिख रहा है। दिल्ली की सड़कों पर किसी बलूच से कोई पूछ बैठता है कि आप लोग वही हैं न जिसकी बात मोदी जी ने की थी। हम चाहते हैं कि अंतरराष्टीय मंच पर 9/11 (अमेरिका में ट्वीन टावर पर हमला) की बात हो तो बलूचिस्तान में पाक के आतंक की भी बात हो।

 

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First Published on October 3, 2016 1:59 am

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