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भारतीय स्वतंत्रता दिवस पर संयुक्त राष्ट्र के हॉल में गूंजा ‘जय हो’

रहमान की पहचान कम बोलने वाले व्यक्ति के रूप में है। कंसर्ट शुरू होने से पहले उन्होंने कहा कि उन्होंने एक लंबा भाषण तैयार किया लेकिन फिर वह भाषण न देने का फैसला किया है।
Author संयुक्त राष्ट्र | August 17, 2016 02:09 am
अमेरिकी झंडा

आॅस्कर विजेता संगीतकार एआर रहमान ने 70वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर खचाखच भरे प्रतिष्ठित संयुक्त राष्ट्र महासभा के हॉल में अपनी प्रस्तुति से लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने कर्नाटक संगीत की किवदंती कही जाने वाली प्रख्यात कलाकार एमएस सुब्बुलक्ष्मी के संगीत, सूफी गीतों और अपने चर्चित गीत ‘जय हो’ के जरिये समां बांधा। संयुक्त राष्ट्र हॉल में प्रस्तुति देने वाले 49 वर्षीय रहमान सुब्बुलक्ष्मी के बाद दूसरे भारतीय फनकार हो गए हैं। यह हॉल वैश्विक नेताओं के लिए दुनिया को संबोधित करने वाला सामान्य मंच है। इस कंसर्ट का आयोजन संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन ने शंकर नेत्रालय के साथ मिलकर भारत के 70वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर किया था। शंकर नेत्रालय भारत का सिविल सोसाइटी संगठन है। रहमान ने सुब्बुलक्ष्मी को इस कंसर्ट के जरिए उनकी शताब्दी जयंती पर श्रृद्धांजलि दी। सुब्बुलक्ष्मी द्वारा संयुक्त राष्ट्र में दी गई प्रस्तुति के भी इस वर्ष 50 साल पूरे हो रहे हैं।

भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजी गईं अब तक की पहली संगीतकार सुब्बुलक्ष्मी को संयुक्त राष्ट्र के दिवंगत महासचिव यू थांट ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में अक्तूबर 1966 में प्रस्तुति देने के लिए आमंत्रित किया था। इसी के साथ वह वहां प्रस्तुति देने वाली पहली भारतीय बन गई थीं। भारत के 70वें स्वतंत्रता दिवस पर आयोजित समारोह में दर्शकों में राजदूत, राजनयिक और भारतीय अमेरिकी थे जिन्होंने रहमान के मंच पर आते ही जबर्दस्त तालियों की गड़गड़ाहट के साथ उनका स्वागत किया। रहमान पारंपरिक भारतीय पोशाक में थे। सोमवार करीब तीन घंटे तक चले इस कंसर्ट में रहमान और उनके साथियों ने सुब्बुलक्ष्मी के संगीत और रचनाओं पर प्रस्तुति दी। कंसर्ट का एक मुख्य आकर्षण सनशाइन आर्केस्ट्रा के छात्रों की प्रस्तुति भी थी। सनशाइन आर्केस्ट्रा एआर रहमान फाउंडेशन की पहल है जो वंचित युवाओं को संगीत सिखाता है। संयुक्त राष्ट्र के मंच पर प्रस्तुति देने के लिए तैयार छात्रों को प्रोत्साहित करते हुए रहमान ने कहा, ‘आज से आप खास हो गए हैं। आप वंचित नहीं रहे।’ रहमान की दो बहनों ने भी जाने माने गायक जावेद अली और प्रसिद्ध तालवादक शिवमणि के साथ प्रस्तुति दी।

संयुक्त राष्ट्र के मंच पर एक तरफ अपने वाद्ययंत्रों के बीच बैठे रहमान ने एक के बाद एक मंत्रमुग्ध करने वाली प्रस्तुुति दी और उनके सहयोगियों ने सुब्बुलक्ष्मी के कर्नाटक संगीत की दिल को छू जाने वाली प्रस्तुति दी। तालियों की जबर्दस्त उत्साहवर्धक गड़गड़ाहट के बीच रहमान ने ‘दिल से’ और ‘बॉम्बे’ फिल्म के अपने कुछ बेहद लोकप्रिय गानों की भी प्रस्तुति दी, साथ में ‘वंदे मातरम’ की धुन भी सुनाई। जब कसंर्ट खत्म होने वाला था तब रहमान और उनके समूह ने सूफी गीतों पर प्रस्तुति दी जिनमें ‘ख्वाजा मेरे ख्वाजा’, ‘कुन फाया कुन’ और ‘मौला, मौला’ शामिल थे।

कंसर्ट का समापन लोकप्रिय गीत ‘जय हो’ से हुआ जो कि ‘स्लमडॉग मिलिनेयर’ फिल्म का गाना है। इसके लिए रहमान ने आॅस्कर और कई वैश्विक प्रतिष्ठित पुरस्कार अपनी झोली में डाले थे। जैसे ही रहमान और उनकी मंडली ने गाना शुरू किया वैसे ही दर्शक धुन पर थिरकने लगे। कंसर्ट के अंत में रहमान ने अमन की अपील करते हुए कहा कि एक दूसरे की जान लेने से दुनिया की परेशानियां हल नहीं होंगी। रहमान ने कहा, ‘हम अब भी एक दूसरे को मार रहे हैं। मैं अपनी जिंदगी में एक ऐसी दुनिया को देखना चाहता हूं कि जहां लोग लड़ते न हों और एक दूसरे को मारते न हों, लेकिन टकरावों को हल करने के लिए बेहतर तरीकें खोजें। आओ ऐसी उम्मीद करें कि हम अपने जीवनकाल में यह बदलाव देख पाएं।’

रहमान की पहचान कम बोलने वाले व्यक्ति के रूप में है। कंसर्ट शुरू होने से पहले उन्होंने कहा कि उन्होंने एक लंबा भाषण तैयार किया लेकिन फिर वह भाषण न देने का फैसला किया है। उनके संगीत को उनकी तरफ से बात करने दें। सुब्बुलक्ष्मी को श्रद्धांजलि देते हुए रहमान ने कहा कि उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में उनके जन्म होने से पहले वाले साल में प्रस्तुति दी थी। उन्होंने कहा कि वह हमारे लिए एक केस स्टडी हैं कि एक व्यक्ति एक नम्र शुरूआत से विजय प्राप्त कर सकता है और वह (सुब्बुलक्ष्मी) जाति और वर्ग व्यवस्था से ऊपर उठकर गायक बनने के आकांक्षी गायकों के लिए एक प्रेरणास्रोत बन गईं। कंसर्ट से पहले दर्शकों को संबोधित करते हुए विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर ने भारतीय स्वाधीनता संघर्ष में संगीत की महत्ता बताई और इसकी भूमिका को एक करने वाला करार दिया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता की ओर हमारी यात्रा का प्रतिनिधित्व ‘वंदे मातरम’ और जन गण मन’ ने किया। अकबर ने कहा कि अन्य देश पहले बने और फिर उनका राष्ट्र गान बना लेकिन भारत का पहले राष्ट्र गान बना फिर वह एक राष्ट्र बना।

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