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झूठ के विज्ञापन PDF Print E-mail
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Tuesday, 04 March 2014 11:40

पुंज प्रकाश

जनसत्ता 04 मार्च, 2014 : कुछ समय पहले केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद ने निर्णय लिया कि झूठे विज्ञापनों और ऐसा विज्ञापन करने वाली मशहूर हस्तियों पर नकेल कसने के लिए एक समिति का गठन किया जाएगा और उपभोक्ताओं को यह अधिकार होगा कि विज्ञापन में किए गए दावे पूरे नहीं होने पर वे उस हस्ती और कंपनी, दोनों के खिलाफ हर्जाने के लिए मुकदमा दायर कर सकते हैं। यानी, आने वाले दिनों में बहुत सारे फिल्मी सितारों और खिलाड़ियों पर ऐसा मुकदमा होना तय है क्योंकि लोकप्रियता के पैमाने पर सबसे ऊपर होने के चलते विज्ञापन कंपनियों की पहली पसंद यही होते हैं। ऐसी जानी-मानी हस्तियों की जीवनशैली की नकल करना एक ‘परंपरा’ है। इसलिए इन्हें विभिन्न विज्ञापनों में ऐसे पेश किया जाता है, जैसे यह उनके व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित हो। जबकि सच्चाई इसके एकदम उलट होती है। कोई करोड़ों में खेलने वाला शख्स भारतीय मध्यवर्ग को लक्षित उत्पादों का इस्तेमाल भला क्यों करेगा! चाहे खाने-पीने, पहनने की चीजें हों, सौंदर्य प्रसाधन या कुछ और!

‘पेप्सी’ और ‘कोक’ के कैसे-कैसे विज्ञापन हैं, हम सब जानते हैं। ‘डर आगे जीत है’ वाला डरावना ‘स्टंट’ भी है। सोडा के नाम पर शराब का विज्ञापन होता है। मोबाइल फोन, जूतों, बाल उगाने, रंग चढ़ाने आदि के विज्ञापन याद कीजिए। भारत जैसे देश में गोरे रंग को लेकर जो पागलपन है, उसे भुनाने में कोई किसी से कम नहीं। ‘मर्द होकर औरतों वाली क्रीम लगाते हो’ जैसी वाहियात टिप्पणी भी है। लगे हाथ नहाने के साबुनों के विज्ञापन भी याद कीजिए। दमकती-महकती त्वचा और पता नहीं क्या-क्या। कुछ साबुन तो ऐसे दावे के साथ बाजार में उपलब्ध हैं, मानो वे साबुन नहीं, बल्कि कोई जादू हों। टीवी पर टिकिया इधर से उधर गई नहीं कि कपड़े झकाझक सफेद। ‘डियो’ और ‘परफ्यूम’ के विज्ञापन तो लड़के-लड़कियों के पटने-पटाने और बिस्तर तक घसीट ले जाने की गारंटी का पर्याय ही बन गए हैं। मोबाइल, टेलीफोन, इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियां उपभोक्ता से ऐसे दावे करती हैं कि क्या कहना। मर्दानगी और संतानोत्पत्ति की गारंटी वाले विज्ञापन तो हैं ही।

टीवी, अखबार, इंटरनेट, मोबाइल और पत्र-पत्रिकाएं आज विज्ञापन को आम जनता तक पहुंचाने का प्रमुख माध्यम


हैं। पर ये खुद किसी प्रकार की कोई जवाबदेही तो दूर, नैतिक जिम्मेदारी तक का निर्वाह करने से कतराते हैं। अखबारों में बलात्कार की खबरों के नीचे ही अंग मोटा-पतला करने के विज्ञापन और बाबाओं की पोल खोलने वाले चैनल पर रोज किसी बाबा का प्रवचन आम बात है। आजकल एक नया चलन भी है ‘रियल लाइफ हीरोज’ से विज्ञापन कराने का, जो आसानी से अपने हीरोपन को चंद पैसों के चक्कर में आकर विज्ञापनों के सुपुर्द कर देते हैं। आज हर वह चीज विज्ञापन के दायरे में है जो बाजार का हिस्सा बन बिक सकती है। विज्ञापन हमारी इंद्रियों से होते और हमारे दिल-दिमाग पर राज करते हुए हमारे चयन को प्रभावित करते हैं। बाजार अब मदर्स डे, फादर्स डे, वेलेंटाइन डे जैसे विज्ञापनों के जरिए हमारी संवेदनाओं को भी भुनाने तक से नहीं चूकता।

कुछ विज्ञापन सुंदर, संवेदनशील और सच्चे भी हैं। लेकिन ज्यादातर झूठ का मायाजाल  बुन रहे हैं। यह किसी सेलिब्रिटी के माध्यम से एक झूठ को बार-बार और अलग-अलग तरीके से बोल कर सच बनाने की साजिश है, जिस पर निश्चित रूप से लगाम लगनी चाहिए। साथ ही, जिस माध्यम से ये विज्ञापन आम जनता तक पहुंचते हैं, उसकी भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। इसके अलावा, सत्ता पाने के लिए अधिकतर राजनीतिक पार्टियां भी भ्रामक और लोकलुभावन दावे करती रहीं हैं। वे भ्रामक विज्ञापन नहीं तो और क्या हैं? इनके मायाजाल से नियम-कानून, समिति आदि बना देने से मुक्ति नहीं मिल पाएगी। जन-जागृति के बिना यह काम अधूरा ही रहेगा। जब तक उपभोक्ता भ्रम के शिकार होते रहेंगे, इस गलाकाट प्रतियोगिता के समय में लोग भ्रम का मायाजाल रचते रहेंगे।

 

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