सतीश सिंह जनसत्ता 23 मई, 2013: किंवदंतियों की बात करें तो दुनिया की सभी सभ्यताओं में नदियों से भगवान का रिश्ता रहा है। नदियों को देवी-देवता की संज्ञा दी जाती रही है। भारत में भी नदियों को देवी का दर्जा दिया गया है।
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पुष्परंजन
जनसत्ता 22 मई, 2013: रविवार दोपहर बाद से कोई बहत्तर घंटे तक दस किलोमीटर की परिधि में दक्षिण दिल्ली का वह इलाका सीलबंद था, जहां चीनी प्रधानमंत्री ली केचियांग ठहरे थे। ली के लिए शायद इतनी चौकसी पाकिस्तान,
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कुमार प्रशांत जनसत्ता 21 मई, 2013: ऐसा संभवत: पहली बार हुआ कि सर्वोच्च न्यायालय ने कोयला घोटाले जैसे गंभीर मामले की सुनवाई के दौरान सरकार को भी और सीबीआइ को भी उनकी भूमिका की और मर्यादा की याद ही नहीं दिलाई बल्कि
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अनिल चमड़िया
जनसत्ता 20 मई, 2013: अब संसद के चलने की दो मुख्य स्थितियां साफ हो गई हैं। पहली यह कि संसद तब चलेगी जब कोई संवैधानिक संकट खड़ा होगा।
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सुनील जनसत्ता 18 मई, 2013: जब पूरी दुनिया के मजदूर एक मई को मजदूर दिवस मनाने की तैयारी कर रहे थे, उसके ठीक एक सप्ताह पहले बांग्लादेश में एक हजार से ज्यादा मजदूर एक जर्जर इमारत के ढहने से दब कर मर गए।
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अख़लाक़ अहमद उस्मानी जनसत्ता 17 मई, 2013: प्रधानमंत्री, मुहम्मद अलगनोशी (ट्यूनिसिया के पूर्व प्रधानमंत्री)/ अगर हमने नाप ली तुम्हारी ताकत/ तो संविधान की शमा तुम थाम नहीं पाओगे/ हम बेन अली (ट्यूनिसिया के पूर्व
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अरुण कुमार ‘पानीबाबा’ जनसत्ता 16 मई, 2013: राजग के विभिन्न घटकों में मतैक्य हो या न हो, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हाइकमान इस निर्णय में कोई परिवर्तन नहीं करेगा कि आगामी लोकसभा चुनाव में उसके राजनीतिक दल यानी
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अरुण कुमार ‘पानीबाबा’
जनसत्ता 15 मई, 2013: वर्तमान लोकसभा अपना कार्यकाल पूरा कर सकेगी, इसकी संभावना लगातार क्षीण हो रही है। कई नेताओं के बयानों से स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि अगली लोकसभा के लिए आम चुनाव
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अपूर्व जोशी जनसत्ता 14 मई, 2013: कर्नाटक में कांग्रेस को मिली शानदार जीत को अगले आम चुनाव से जोड़ कर भले ही पार्टी के बड़े नेता अपने सुनहरे भविष्य के दावे कर रहे हों, सच्चाई इसके ठीक उलट है।
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बनवारी
जनसत्ता 13 मई, 2013: कर्नाटक की सत्ता में कांग्रेस की वापसी सुनिश्चित थी, और इस संभावना को कांग्रेस ही नहीं, उसके राज्यस्तरीय प्रतिद्वंद्वी भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) के नेता भी मान कर चल रहे थे।
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शीतला सिंह जनसत्ता 11 मई, 2013: हम जिसे केंद्रीय जांच ब्यूरो कहते हैं, सर्वोच्च न्यायालय की दृष्टि में वह और कुछ नहीं, बल्कि सरकारी ‘पिंजरे का तोता’ है जिसके कई मालिक हैं।
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