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भारत के लिए उम्मीद के साथ अंदेशे भी कम नहीं PDF Print E-mail
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Thursday, 08 November 2012 09:58

प्रदीप श्रीवास्तव, नई दिल्ली। माना जा रहा है कि ओबामा की जीत से अमेरिका-भारत द्विपक्षीय संबंधों की निरंतरता बनी रहेगी। अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर बराक ओबामा की  लगातार दूसरी बार जीत पर भारत के राजनयिक और औद्योगिक क्षेत्र में खुशी के साथ शंकाए भी हैं। अपने चुनावी दौरे के समय उन्होंने जिस तरह  महात्मा गांधी और भारत का जिक्र किया था उससे लगता है कि यह संबंध और प्रगाढ़ हो सकते हैं। इसी तरह विश्व स्तर पर भी  जिस तरह से राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में तेजी से बदलाव हो रहे हैं उसमें ओबामा के दोबारा जीतने पर अमेरिकी विदेश नीति में किसी तरह के बदलाव की चिंता  खत्म हुई है। पर भारतीय उद्योग कुछ क्षेत्रों कों, खासकर आई टी क्षेत्र कों शंका के नजरिए से देख रहा है। अपने पहले चुनाव की तरह इस बार भी चुनाव प्रचार के दौरान बराक ओबामा ने आउट सोर्सिंग के खिलाफ बोला है। हालांकि आईटी  सेक्टर के ही कई उद्योगपतियों का यह भी मानना है कि चुनावी भाषण में बोलना और उस पर अमल करना दोनों अलग मामले हैं। व्यावहारिक तौर पर ओबामा अमेरिकी कंपनियों के दबाब की भी अनदेखी नहीं कर सकते। व्यवसाय क्षेत्र में अमेरिकी वीजा  प्रणाली में चुनावी प्रचार के कुछ दिनों पहले उठाए सख्त कदमों को लेकर भी यहां इसी नजरिेए से देखा गया है।
ओबामा के चुनाव पर गोदरेज समूह के अध्यक्ष ए गोदरेज ने इसे भारत के लिए अच्छा बताया। आउट सोर्सिंग पर उनके नजरिए को ले कर भारतीय आईटी क्षेत्र की चिंताओं के बारे में पूछने पर गोदरेज ने गुड़गाव में एक समारोह से अलग  मीडिया से कहा कि दोनों बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच कुछ चिंताए जरूर है। आउट सोर्सिंग को लेकर भी हैं। इस का समाधान हो जाएगा। भारती ग्रुप के अध्यक्ष सुनील भारती मित्तल ने कहा कि  पिछले चुनाव में भी काफी कुछ कहा गया था। बिल क्लिंटन ने भी अपने चुनाव के दौरान इस पर काफी जोर दिया था। पर इससे हमारे बिजनेस और संबंधों पर कोई असर नहीं पड़ा। 
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वह बिल क्लिंटन के बाद दूसरे ऐसे डेमोकेट्रिक राष्ट्रपति हैं जो लगातार दूसरी बार वाइट हाउस में पहुंंच रहे हैं। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और  प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ओबामा को मुबारकबाद दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति के इस चुनाव को राजधानी के साथ देश के कई हिस्से में लोगों ने


दिलचस्पी से देखा। आम भारतीयों में ज्यादातर लोग यही चाहते थे कि ओबामा जीतें। इसके पीछे उनका अश्वेत होना भी एक वजह है। सूत्रों के मुताबिक यहां विदेश मंत्रालय में ओबामा के चुनाव पर अमेरिकी नीति से जुड़ेअधिकारियों में संतोष है। इसकी बड़ी वजह यही है कि दुनिया भर में राजनीति और आर्थिक क्षेत्र में जिस तरह से उलट पुलट हो रहा है उसमें अमेरिकी विदेश नीति में कमोबेश स्थिरता बने रहने की अब निश्चिंतता है। 
ओबामा जब पहली बार नवंबर 2008 में चुने गए थे तो उस समय नई दिल्ली में यह शंका थी कि उनके आने के बाद जार्ज डब्ल्यू बुश के समय में जो रिश्ते प्रगाढ़ हूए उनमें बदलाव न आए। बुश ने भारत के साथ रणनीतिक रिश्ते कायम किए थे। भारत को विश्व के आभिजात्य न्यूक्लियर क्लब में शामिल होने में मदद की। उर्जा, शिक्षा, विज्ञान एंव प्राद्यौगिकी, आंतकवाद वगैरह 25 क्षेत्रों में भारत अमेरिका के बीच उच्चस्तरीय संवाद शुरू हुए। ओबामा ने भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों को लेकर अमेरिकी प्रशासन की यह नीति जारी रखी। हाल में ही सऊदी अरब स ेआंतकवादी फसीह का जो प्रत्यर्पण हुआ था वह अमेरिका के दबाब की वजह से संभव हो सका। सामरिक क्षेत्र में ओबामा के पिछले चार साल के कार्यकाल में रिश्तों में गहराई आई है। पिछले साल दोनों देशों के 56 साझा सैन्य अभ्यास हुए।
ओबामा ने अपने चुनाव प्रचार में महात्मा गांधी और नेल्सन मंडेला की परंपराओं का उल्लेख करते हुए कई बार कहा कि उन्हें ऐसे वास्तविक बदलाव लाने के लिए ‘समय’की जरूरत है जिन्हें उन महान नेताओं ने शुरू किया था। न्यूयार्क में चुनावी भाषण में उन्होंने कहा कि दुनिया भर में गांधी, नेल्सन मंडेला ने जो किया वह काफी कठिन था। उसमें समय लगा।  उसमें एक राष्ट्रपति :के कार्यकाल:से ज्यादा समय लगता है। उसमें एक से ज्यादा लोगों की जरूरत पड़ती है।
दूसरी तरफ ओबामा के इस कार्यकाल में भारत को अमेरिकी दबाब का भी सामना करना पड़ा। कुल तेल आयात का 75 फीसद हिस्सा ईरान से भारत लेता था। सन 2008 के बाद इसमेंकटौती करनी पड़ी। अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की वापसी के बाद की अमेरिकी नीतियों को लेकर भी भारत में चिंताएं है। वैसे भी विश्व के बड़े लोकतांत्रिक देश होने के कारण दोनों सभी मुद्दों पर समान राय रख भी कैसे सकते हैं? दोनों की अपनी मजबूरिया हैं।

 

Last Updated on Thursday, 08 November 2012 10:09
 
 

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