मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
अपने ही दांव में उलझ गए आडवाणी PDF Print E-mail
User Rating: / 3
PoorBest 
Thursday, 08 November 2012 09:55

विवेक सक्सेना, नई दिल्ली। भाजपा में आई सुनामी का निशाना भले ही नितिन गडकरी रहे हों, पर उसका शिकार लालकृष्ण आडवाणी बन गए हैं। नेताओं व संघ में यह धारणा है कि उन्होंने अपने निजी हित के लिए इस मामले को इतना तूल दिलवाया। उनकी योजना पार्टी पर काबिज होने की थी। 
गडकरी को उनकी कंपनियों के कारण जिस तरह से राम जेठमलानी ने कठघरे में खड़ा करने की कोशिश के तहत उन्हें व आडवाणी को पत्र लिखे, उसे भाजपा व संघ के तमाम वरिष्ठ नेताओं ने पसंद नहीं किया है। यह माना जा रहा है कि इसके पीछे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में आडवाणी की सहमति थी। इस कार्रवाई का एकमात्र उद्देश्य गडकरी को दोबारा अध्यक्ष बनने देने से रोकना था, जिससे कि उनके नाम पर सहमति बनाई जा सके। सूत्रों के मुताबिक मंगलवार को वे अपनी इन दो मांगों पर अड़ गए थे कि संघ व पार्टी यह एलान करें कि वे न तो गडकरी को दोबारा अध्यक्ष बनाएंगे और इसके साथ ही किसी को अंतरिम अध्यक्ष घोषित कर दिया जाएगा।
किसी ने भी उनकी इन मांगों को मानने पर सहमति नहीं जताई। आडवाणी का अड़ियल रुख देख कर एस गुरूमूर्ति ने उन्हे समझाने की कोशिश की, जिन्हें संघ का ही प्रतिनिधि माना जाता है। सुषमा स्वराज व अनंत कुमार ने भी उनके घर जाकर उनसे अनुरोध किया कि वे शाम को होने वाली कोर ग्रुप की बैठक में हिस्सा लें, पर वे इसके लिए तैयार नहीं हुए। दिल्ली में होते हुए भी नहीं आए। इससे संघ उनसे काफी नाराज हो गया और उसने नितिन गडकरी को पूरी तरह से पाक साफ घोषित करने का फैसला करवाते हुए सुषमा स्वराज व अरूण जेटली से इस बारे में साझा बयान जारी करवा दिया।
भाजपा सूत्रों के मुताबिक संघ व पार्टी के कुछ नेताओं का मानना था कि यह सारा विरोध अभियान वे नेता चला रहे हैं जो या तो संघ विरोधी रहे हैं अथवा जिनका संघ से कुछ लेना देना नहीं। राम जेठमलानी को पहले से ही पार्टी


में ‘भाड़े का सैनिक’ माना जाता है जो अपनी लड़ाई लड़ने के लिए क भी ‘राजनीति के अफगानिस्तान में तो कभी चेचेन्या’ चले जाते हैं। जिन तीन नेताओं की सहमति होने का उन्होंने दावा किया उनमें से जसवंत सिंह हों या यशवंत सिन्हा अथवा शत्रुघ्न सिन्हा, किसी को भी संघ अपने परिवार का सदस्य नहीं मानता है। वे पहले भी इस तरह के विवाद खड़े करते आए हैं, हालांकि अभी तक इन तीनों ने जेठमलानी के दावे का समर्थन या खंडन नहीं किया है। सूत्रों के मुताबिक संघ ने यह फैसला करवा कर राम जेठमलानी व आडवाणी दोनों को ही उनकी हैसियत बता दी है। वह इस तिकड़ी से बेहद खफा है। कोर ग्रुप से गडकरी को पाक साफ घोषित करने का फैसला करवा कर उसने यह संदेश दे दिया है कि उसके या पार्टी के लिए आडवाणी का कोई महत्व नहीं है। इसकी एक वजह यह भी रही कि उसका मानना था कि गडकरी की आड़ में उसे निशाना बनाया जा रहा है। इस घटना ने मुरली मनोहर जोशी को हाशिए पर लाने में पार्टी के नेताओं की साजिश की याद ताजा करवा दी। वैसे भी नरेंद्र मोदी के दबाव में ही नितिन गडकरी ने राम जेठमलानी को पार्टी में लेकर उन्हें राज्यसभा दिलवायी थी।
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि आडवाणी के लिए सबसे ज्यादा दिक्कत उनके करीबी पैदा कर रहे हैं। अक्सर उनकी रणनीति में यह दबाव स्पष्ट नजर आ जाता है। वे आडवाणी की तुलना टी सीरीज के दिवंगत मालिक गुलशन कुमार से करते हैं जो अपने छोटे भाई को हीरो बनाने पर उतारू थे। किशन कुमार को यह बात अच्छी तरह से पता थी कि वे अभिनय के क्षेत्र में सफलता हासिल नहीं कर सकते हैं पर गुलशन कुमार इस सत्य को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं थे। इसीलिए वे उन्हें लेकर फिल्में बनाते रहते थे। यही स्थिति आडवाणी की भी है। वे यह सच स्वीकार कर चुके हैं कि वे अगले प्रधानमंत्री नहीं बन सकते हैं पर उनके करीबी इस सच को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं है।

 

Last Updated on Thursday, 08 November 2012 10:08
 
 

आप की राय

क्या दिल्ली पुलिस की तफ्तीश आइपीएल स्पॉट फिक्सिंग के मास्टर माइंड तक पहुंच पाएगी?