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Thursday, 28 February 2013 09:22 |
सुरेंद्र सिंघल, देवबंद। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर देवबंद के सोच में इतनी नरमी तो आई है कि वह उन पर बात करने और सहज प्रतिक्रिया देने को तैयार है।
यह बदलाव दो कारणों से आया है। एक मुसलिम नेतृत्व मोदी को लेकर पहले जितना कट्टर नहीं है दूसरे 2002 के दंगों के बाद मोदी गुजरात में एक दशक से अमन और चैन कायम रखने में सफल रहे हैं। इसका सकारात्मक असर लोगों पर साफ दिखता है। देवबंदी मुसलमानों की देवबंद में दो इस्लामिक शिक्षण संस्थाएं हैं। ये संस्थाएं सियासी मामलों पर आमतौर से प्रतिक्रियाएं नहीं देती हैं लेकिन सभी जानते हैं कि दारूल उलूम के गुजराती और उदार मोहतमिम मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी को उनके विरोधियों ने मोदी समर्थक होने का आरोप चस्पा कर पद से हटा दिया था। जाहिर है इन संस्थाओं में अंदरूनी तौर पर राजनीतिक हलचलों पर चिंतन भी होता है और उससे उनके महत्त्वपूर्ण फैसले भी प्रभावित होते हैं। दारूल उलूम के प्रगतिशील छवि के नायब मोहतमिम मौलाना अब्दुल खालिक मद्रासी कहते हैं कि मजलिस-ए-शूरा ने संस्था के उलमा पर सियासी बयान देने पर रोक लगाई हुई है। दारूल उलूम पूरी तरह से एक मजहबी शिक्षा का केंद्र है। यही वजह है कि यह संस्था न किसी पार्टी का समर्थन करती है और न ही विरोध। दारूल उलूम के जनसंपर्क अधिकारी अशरफ उस्मानी का कहना है कि संस्था अपनी गैर-राजनीतिक छवि बनाए रखना चाहती है इसलिए यहां के जिम्मेदार राजनीतिक मामलों पर प्रतिक्रिया नहीं देते हैं। मोदी पर मुसलिमों की सोच और उनके प्रधानमंत्री बनने के दावे पर इस संस्था के एक बड़े आलिम ने नाम न छापने के आग्रह पर कहा कि दक्षिण भारत और उत्तर भारत के लोगों के नज़रिए में काफी फर्क है। इधर के लोग मजहब परस्ती और जातीयता से गहरे तक प्रभावित रहते हैं जबकि साउथ में ऐसा नहीं है। मोदी के गुड गवर्नेंस और विकास संबंधी दावों पर उनका कहना है कि मुसलिम सबसे पहले अमन और सुरक्षा चाहता है बाद में विकास। उनका मानना है
कि मोटे तौर पर सभी राजनीतिक दलों का एक सा नजरिया है। मुसलिमों के पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं लेकिन वह उसी पर भरोसा जताता है जो उसके हितों की पैरवी करता है। उनका कहना है कि गुजरात के मुसलिम व्यावसायिक तबके के मोदी का चुनाव में समर्थन करने की बातें सामने आ रही हैं लेकिन मुसलिमों की यह सोच देशा भर में बनेगी कहना अभी थोड़ा मुशिकल है। देवबंदी मुसलिमों के सामाजिक, सियासी और मजहबी संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद के दोनों धड़ों के शीर्ष नेतृत्व की राय मोदी को लेकर एकदम जुदा है। एक धड़े के महासचिव व पूर्व सांसद मौलाना महमूद मदनी जहां कहते हैं कि मोदी पर बर्फ पिघल रही है तो वहां उनके चाचा और दूसरे धड़े के अध्यक्ष मौलाना अरशाद मदनी का रुख बेहद कड़ा है। अरशद मदनी और उनके समथर्कों ने ही पूर्व मोहतमिम वस्तानवी की दारूल उलूम से विदाई की कहानी लिखी थी। दारूल उलूम वक्फ से लंबे अरसे से जुड़े आलिम और लेखक मौलाना अब्दुल्ला जावेद कहते हैं कि मुसलमान कांग्रेस से खफा हैं। जहां तक उत्तर प्रदेश का ताल्लुक है मुसलिम सपा के पक्ष में रहेगा। बीजेपी और नरेंद्र मोदी के मुताल्लिक उनका कहना है कि दोनों का मुसलमान समर्थन नहीं करेगा। भाजपा जब तक अपनी सोच नहीं बदलेगी और साथ ही उन्हें हर स्तर पर हिस्सेदारी और सम्मान नहीं देगी तब तक वे भाजपा से दूर ही रहेंगे। अलबत्ता जावेद को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से कोई शिकायत नहीं है। वे दो टूक कहते हैं कि देश को वाजपेयी जैसा नेतृत्व आज चाहिए। यदि यह भाजपा से भी आता है तो देश स्वीकार कर लेगा। देवबंद के आम मुसलमान भाजपा और मोदी दोनों पर बंटे हैं। कुछ का कहना था कि लोग महंगाई और भ्रष्टाचार से आजिज आ गए हैं जबकि भाजपा सरकार में लोग सकून से थे। ऐसे में भाजपा और मोदी अछूत नहीं हैं। लोग उन्हें वोट दे सकते हैं। दूसरे लोगों की राय में भाजपा अभी भी अपनाने लायक नहीं है भले ही उनके पास उपयुक्त विकल्प का अभाव है।
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