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Wednesday, 27 February 2013 09:22 |
नई दिल्ली। महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के लिए दी जाने वाली सजा में इजाफे से जुड़े विधेयक पर विचार कर रही एक संसदीय समिति ने सिफारिश की है कि यदि पीड़िता की मौत हो जाती है या निष्क्रिय अवस्था में पहुंच जाती है तो ऐसे मामलों में दोषी को मौत की सजा दी जानी चाहिए।
गृह मंत्रालय की संसद की स्थायी समिति इस बात पर भी सहमत है कि कानून में ‘बलात्कार’ शब्द की जगह ‘यौन उत्पीड़न’ कर दिया जाए। कई सदस्यों के सुझावों के बाद भी समिति ने किशोरों की उम्र पर विचार के बाबत कोई सिफारिश देने से इनकार किया क्योंकि गृह मंत्रालय ने कहा कि महिला और बाल विकास मंत्रालय मामले का अध्ययन कर रहा है। कुछ सदस्यों ने यह कहते हुए इस मुद्दे पर सिफारिश का विरोध किया कि विशेषज्ञों से विचार-विमर्श किए बिना समिति को किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहिए। समिति ने विधेयक में बदलाव की
सिफारिश के अधिकार-क्षेत्र से बाहर जाते हुए अदालतों की आधारभूत संरचना सुधारने की अनुशंसा करते हुए कहा कि त्वरित अदालते बनाने के लिए पर्याप्त कोष आबंटित करना चाहिए। समिति ने कहा कि यदि किसी वरिष्ठ अधिकारी की जानकारी में उसके किसी मातहत अधिकारी ने कोई अपराध किया है और वह तत्काल कोई कार्रवाई नहीं करता तो उसे जिम्मेदार करार दिया जाना चाहिए। उसकी इस गलती को उसकी गोपनीय रिपोर्ट में दर्ज करना चाहिए। पिछले दिसंबर में लोकसभा में पेश विधेयक की जगह संसद के चालू बजट सत्र में एक नया विधेयक पेश किया जाएगा। नया विधेयक इस महीने की शुरुआत में पारित आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश की जगह लेगा। समिति ने अध्यादेश को मंजूरी दिए जाने के बावजूद विधेयक का अध्ययन कर अपनी सिफारिशें देने का फैसला किया ताकि उन्हें नए विधेयक में शामिल किया जा सके। समिति ने 2012 के विधेयक के अलावा न्यायमूर्ति जेएस वर्मा समिति की सिफारिशों और अध्यादेश का भी अध्ययन किया है। (भाषा)
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