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Saturday, 23 February 2013 12:04 |
जनसत्ता ब्यूरो नई दिल्ली । विशेषज्ञों को लगता है कि चिदंबरम के लिए आम बजट को जवाबदेह बनाना बड़ी चुनौती है।
विशेषज्ञों को लगता है कि खजाने की तंग हालत और आम चुनाव से पहले लोकप्रियता हासिल करने की राजनीतिक मजबूरियों के बीच वित्त मंत्री पी चिदंबरम के लिए आम बजट को जवाबदेह बनाना बड़ी चुनौती है। गिरती घरेलू वृद्धि दर, ऊंची मुद्रास्फीति, राजकोषीय घाटे व चालू खाते के घाटे के साथ साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था के संकटों के बीच पेश किए जा रहे 2013-14 के बजट में निवेशकों का विश्वास बहाल करने के साथ ही राजकोषीय घाटे को सीमित रखने की बड़ी चुनौती है। वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजंसियों को उंगली उठाने का अवसर भी नहीं देना चाहेंगे वित्तमंत्री। चिदंबरम ने कहा है कि अगला बजट ‘दायित्वपूर्ण बजट’ होगा। बावजूद सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए 2014 के आम चुनाव से पहले इस आखिरी पूर्ण बजट में आम आदमी को खुश रखने की दरकार भी अस्वाभाविक नहीं है। विशेषज्ञों के मुताबिक वित्त मंत्री के लिए राजस्व बढ़ाना सबसे बड़ी चुनौती है। दस साल में सबसे कम वृद्धि कर रही मौजूदा अर्थव्यवस्था में नए कर लगाना या कर का बोझ बढ़ाना वृद्धि और निवेश दोनों ही दृष्टि से जोखिम भरा होगा। राजकोषीय संतुलन के उपाय के तौर पर योजनाओं के बजट में कटौती का विकल्प भी हो सकता है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, स्कूलों में मध्याह्न भोजन, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन जैसे कार्यक्रम यूपीए के प्रमुख कार्यक्रम हैं। इन पर बजट में बड़ा आबंटन करना मजबूरी है। कच्चे तेल के दाम बढ़ने से सबसिडी का बोझ अलग बढ़ रहा है। अगले साल फरवरी में संसद में केवल लेखानुदान ही पास होगा क्योंकि मई तक आम चुनाव होने हैं। वित्त मंत्री लगातार यह कह रहे हैं कि अगले वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा कम करके 4.8 फीसद पर लाया जाएगा। चालू वित्त वर्ष में इसे 5.3 फीसद के दायरे में रखने के भरसक प्रयास जारी हैं। पिछले बजट अनुमान में इसे जीडीपी के 5.1 फीसद तक सीमित रखने का लक्ष्य था। वाणिज्य व उद्योग मंडल एसोचैम की प्रत्यक्ष कर समिति के अध्यक्ष वेद जैन के मुताबिक सरकार देश में वस्तु व सेवाकर (जीएसटी) लागू करने की दिशा में बढ़ रही है। जीएसटी में उत्पाद व सेवाशुल्क समाहित हो जाएंगे और इनकी एक ही दर होगी। यह एक दर 14 फीसद से ऊपर रहने का अनुमान लगाया जा
रहा है। इस लिहाज से मौजूदा उत्पाद व सेवा कर की दरों को प्रस्तावित जीएसटी के अनुरूप लाने की दिशा में बजट में पहल हो सकती है। सरकार ने 2008-09 में वैश्विक वित्तीय संकट के परिणामस्वरूप पेट्रोलियम को छोड़ अन्य उत्पादों पर उत्पाद शुल्क चरणबद्ध ढंग से कम करके 14 फीसद से घटाकर 8 फीसद पर ला दिया था। 2010-11 के बजट में इसे बढ़ाकर आठ से 10 फीसद कर दिया गया था। राजकोषीय सुधार की जरूरत को देखते हुए पिछले बजट में इसे 10 से बढ़ाकर 12 फीसद कर दिया गया। खजाने की पतली हालात को देखते हुए इसे आगामी बजट में फिर से 14 फीसद किया जा सकता है। कुछ विश्लेषकों का तो यहां तक कहना है कि कंपनी कर की दर में भी वृद्धि हो सकती है। जबकि दूसरी तरफ संयत्र एवं मशीनरी पर मूल्यहृास दर में रियायत देते हुए इसे मौजूदा 15 फीसद से बढ़ाकर 25 फीसद किया जा सकता है। वैश्विक बाजार में संकटों के कारण निर्यात की स्थिति भी अच्छी नहीं है। पिछले साल अप्रैल के बाद से लगातार निर्यात में गिरावट का रुख बना हुआ है। बमुश्किल जनवरी में 0.82 फीसद निर्यात वृद्धि दर्ज की जा सकी है। इससे पहले मई से दिसंबर तक निर्यात में लगातार गिरावट का रुख बना रहा। वाणिज्य व उद्योग मंत्री आनंद शर्मा को आखिर कहना पड़ा कि चालू वित्त वर्ष के दौरान निर्यात कारोबार 300 अरब डालर के आसपास रह सकता है। पिछले वित्त वर्ष में 306 अरब डालर का निर्यात किया गया। इस साल के लिए 360 अरब डालर का निर्यात लक्ष्य रखा गया था। निर्यातकों के शीर्ष संगठन ‘फैडरेशन आॅफ इंडियन एक्सपोर्टर्स आॅरगनाईजेशन (फियो)’ की मांग है कि सरकार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय उत्पादों के आक्रामक विपणन के लिए एक निर्यात विकास कोष बनाया जाना चाहिए। जिसमें आयकर अधिनियम के तहत कर कटौती का लाभ मिलना चाहिए। फियो ने कहा है कि विनिर्माण क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देने के वास्ते निर्यात से जुड़ी इकाईयों के विस्तार और आधुनिकीकरण में मानक के अनुरूप भारित कटौती का लाभ भी मिलना चाहिए। संगठन ने निर्यात लागत को कम रखने के लिए निर्यातित माल पर राज्यों में लगने वाले मूल्य वर्धित कर (वैट), पेट्रोलियम पदार्थों के बिक्री कर, खरीद कर, कारोबार कर, चुंगी, इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी वगैरह रिफंड करने पर जोर दिया है। फियो के मुताबिक इससे विशेष तौर पर उपभोक्ता वस्तुओं के निर्यातकों को दो से तीन फीसद का फायदा होगा।
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