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Thursday, 21 February 2013 10:25 |
रुचिरा गुप्ता। अगर बलात्कार किसी फायदे के लिए किया जाता है तो यह बलात्कार नहीं हैं। अगर बलात्कार किसी गरीब या निम्न जाति की महिला के साथ किया जाता है तो यह बलात्कार नहीं, बल्कि ‘यौन-कार्य’ है।’
अगर हमारे राजनेताओं और नीति-निर्माताओं, जो दंड विधि संशोधन विधेयक में से शोषण के स्पष्ट रूपों में से वेश्यावृत्ति को हटाना चाहते हैं, की ओर से वेश्यावृत्ति की पीड़ित व शिकार रही लाखों महिलाओं की अनुभव की गई हिंसा को नकार दिया जाता है, तो इससे इन महिलाओं को यही संदेश मिलने वाला है। 18 फरवरी, 2013 को अध्यक्षीय दंड विधि; संशोधन अध्यादेश में वेश्यावृत्ति को स्पष्ट रूप से शोषण के रूप में परिभाषित किया गया। लेकिन अब विधि मंत्रालय में कुछेक ने इसे पलटने के लिए आंदोलन छेड़ दिया गया है। उनका बहाना है कि अगर वेश्यावृत्ति को शोषण के रूप में परिभाषित कर दिया गया तो इससे वेश्यावृत्ति में पड़ी लड़कियों की आजीविका छिन जाएगी। हकीकत यह है कि इससे वेश्यावृत्ति में पड़ी लड़कियों की आजीविका नहीं, बल्कि उनकी आजीविका प्रभावित होगी जो उनकी खरीद-फरोख्त करते हैं। देह-व्यापारियों की ओर से कमाया जाने वाला पैसा ही इस कारोबार को चलाता है। ये गरीब और नीची जाति की लड़कियों की खोज में रहते हैं, जिससे उन्हें वेश्यावृत्ति के धंधे में फंसा सकें। वास्तव में, वेश्यावृत्ति में फंसी ज्यादातर लड़कियों को यौन-उद्योग, ऋण-बंधक के रूप में रखता है। उनसे अक्सर कहा जाता है कि उनके परिवारों ने कुछ पैसा उधार लिया हुआ है, जिसे चुकाने के लिए वे यह काम कर रही हैं। ये लड़कियां, जिनके स्कूल कम उम्र में ही छुड़ा दिए जाते हैं। जो लगातार बलात्कार का शिकार होती चली जाती हैं, अंतत: गिनती ही भूल जाती हैं कि वे कितनी बार इस दुष्कर्म का शिकार हो चुकी हैं। और इन्हें यह भी नहीं मालूम होता कि ऋण कितना है और यह चुकता कब होगा। यहां तक कि जिन्हें इस काम के पैसे मिलते हैं, उनकी आमदनी में नकदी के साथ-साथ रोग और हिंसा भी शामिल होते हैं। उन्हें गरीबी में और भी गहरे धकेलते चले जाते हैं। गरीबी की वजह से वेश्यावृत्ति के चंगुल में पड़ी लगभग कोई भी महिला आखिरकार वेश्यावृत्ति के जरिए गरीबी से बाहर नहीं निकल पाती। हां, अगर मृत्यु-दर पर नजर डाली जाए तो ये इतनी खुशनसीब जरूर होती हैं कि जिंदा रह पाती हैं। इस उद्योग की महिलाओं को उड़न यौनकर्मी यानी ‘फ्लाइंग सेक्स वर्कर’ कहा जाता है। ये वेश्याओं के टोले में कमरा किराए पर लेती हैं। पैसा कमाने और दिन-प्रतिदिन ऋण जाल में और गहरे धंसते चले जाने के लिए रोज यहां आती हैं। उनकी आमदनी का एक बड़ा हिस्सा दूसरों को चला जाता है। मकान-मालिक जो बढ़ा-चढ़ाकर किराया वसूलते हैं। दलाल, जो उनकी कमाई में से एक बड़ा हिस्सा ले लेते हैं। चिकित्सक या नीम-हकीम, जो इस धंधे से उन्हें मिली हिंसा और रोगों से छुटकारा दिलाने के नाम पर बड़ी रकम वसूल लेते हैं। पुलिस, जो उनके लिए पैसा खाती है। पैसा उधार देने वाले, जो उनसे ऊंची ब्याज दर वसूलते हैं। रक्षक, जो उनसे हिफाजत के लिए पैसे लेते हैं। शरीर के साथ बार-बार होने वाली ज्यादती बर्दाश्त कर पाने के लिए जो इन्हें शराब और नशीली दवाएं मुहैया कराते हैं। और वे जरायमपेशा लोग जो इन्हें लाते हैं और
जो इनका यौन-उद्योग से परिचय कराते हैं। एक और सवाल अक्सर मुझसे पूछा जाता है कि वेश्यावृत्ति से बाहर निकली महिलाएं भूखी तो नहीं मरेंगी? वास्तविकता यह है कि वेश्यावृत्ति में महिलाएं चालीस की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते भूख और मौत, दोनों का ही शिकार हो जाती हैं। चकले का दस्तूर महिलाओं को बीस का दशक पार करते न करते निचोड़ कर बाहर फेंक देता है। वेश्यावृत्ति एक ऐसा धंधा है, जिसमें अनुभव और उम्र बढ़ने के साथ-साथ आमदनी बाकी पेज 8 पर उङ्मल्ल३्र४ी ३ङ्म स्रँी ८ घटने लगती है। एक वेश्या महिला के जीवन का सफर ऋण-बंधक से शुरू होता है और आकस्मिक मौत पर खत्म हो जाता है। बीच के कुछ सालों में उसे अपनी आमदनी का कुछ हिस्सा रखने दिया जाता है। लेकिन यह आमदनी, अपने बिस्तरे का भुगतान करने, अपने व बच्चों के कपड़े खरीदने, अपने खाने-पीने का सामान खरीदने, अपनी साज-सज्जा का सामान खरीदने में चली जाती है। इसके अलावा आमदनी डॉक्टरी बिल का भुगतान करने, बच्चों के स्कूली खर्चे उठाने, जिस्म के साथ होने वाली ज्यादती को बर्दाश्त कर पाने के लिए ली जाने वाली शराब व नशीली दवाओं का खर्चा उठाने, महाजन से लिए गए उधार का ब्याज चुकाने व दलाल को अपनी सुरक्षा के लिए पैसा देने में खर्च हो जाती है। चकले चलाने वाले वेश्याओं पर दबाव डालने लगते हैं कि वे अपनी जगह अपनी बेटियों को भेजना शुरू करें। अपने फुटपाथ पर सोने और भूखे मरने के अंदेशे से भयभीत हों, कई वेश्याएं उनके दबाव में आ जाती हैं। जितनी भी वेश्याओं से मैं मिली हूं, सभी उस दुर्भाग्य से अपनी बेटियों को बचाए रखना चाहती हैं, जिसका वे शिकार हुईं। वे सोचती हैं कि किसी दिन समाज उनका साथ देगा और उन्हें व उनकी बेटियों के संरक्षण के लिए कानून बनाएगा। उन सभी को दोषी करार देगा, जिन्होंने उनके साथ बलात्कार किया। उन्हें खरीदा और बेचा। और इनके साथ लगातार विश्वासघात होता जाता है। इसीलिए जिस शब्द का प्रयोग वेश्याएं सबसे अधिक करती हैं, वह है-धोखा। उनके साथ परिवार के सदस्य धोखा करते हैं, जो उन्हें भेज देते हैं। दलाल और एजंट धोखा देते हैं, जो उन्हें खरीदते और बेचते हैं। वे ग्राहक धोखा करते हैं, जो उनसे बलात्कार करते हैं और वह समाज और वह देश धोखा करता है, जो उनका साथ नहीं देता। एक देश, जिसने उनके विकल्पों के अभाव को केवल इसलिए नजरंदाज किया कि उनका जन्म गरीब, नीची जाति की लड़कियों के रूप में हुआ है। वही देश, जो आयोग नियुक्त करके और कानूनों में संशोधन करके बलात्कार के लिए दंडाभाव को समाप्त करने की दिशा में कड़ी मेहनत कर रहा है। क्या ये कानून केवल ऊंची जाति और ऊंचे वर्ग की महिलाओं के संरक्षण के लिए हैं? दस साल की उम्र में ही बिहार से बेच दी गई 28 वर्षीय फातिमा नट धुनिया पूछती है, ‘जिन्होंने हमारे सपने रौंद डाले, उन्हें कभी दोषी नहीं ठहराया जाएगा?’ क्या निम्न जाति की गरीब महिलाओं के बलात्कार को इस तरह नजरंदाज किया जाना चाहिए , विशेषकर अगर यह बलात्कार फायदे के लिए किया गया हो तो? क्या हम उनके बलात्कार को शोषण मानने के लिए भी तैयार नहीं हैं? क्या वेश्यावृत्ति में पड़ी हमारे देश की लाखों महिलाओं के साथ एक बार फिर धोखा हुआ है?
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