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बालकृष्णन के खिलाफ राष्ट्रपति के उच्चतम न्यायालय से परामर्श मांगने संबंधी एनजीओ की अर्जी खारिज PDF Print E-mail
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Tuesday, 12 February 2013 20:27

नयी दिल्ली। केंद्र सरकार ने देश के पूर्व प्रधान न्यायाधीश और उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश रहने के दौरान कदाचार के आरोपों में न्यायमूर्ति के जी बालकृष्णन को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से हटाने के लिए राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय से परामर्श मांगने की मांग करने संबंधी गैर सरकारी संगठन की अर्जी खारिज कर दी है।
सरकार ने कहा कि उच्चतम न्यायालय में उनके कार्यकाल के दौरान कथित दुर्व्यवहार के दृष्टांतों के लिए उनके खिलाफ राष्ट्रपति के उच्चतम न्यायालय से परामर्श मांगने की सिफारिश नहीं की जा सकती।
गृह मंत्रालय ने गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज को भेजे पत्र में कहा, ‘‘प्रधान न्यायाधीश के तौर पर उनका आचरण मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम की धारा 5:2: के तहत उनके मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के तौर पर बने रहने के संबंध में राष्ट्रपति के उच्चतम न्यायालय से परामर्श मांगने का प्रासंगिक आधार नहीं लगता।’’
कॉमन कॉज ने बालकृष्णन के खिलाफ एक शिकायत दायर की थी। एनजीओ ने आरोप लगाया था कि पूर्व प्रधान न्यायाधीश और उनके रिश्तेदारों ने बालकृष्णन के उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश रहने के दौरान अपनी कानूनी आय से अधिक संपत्ति जमा की है। इस आरोप का बालकृष्णन ने खंडन किया है।
गृह मंत्रालय ने कहा कि बालकृष्णन की एनएचआरसी अध्यक्ष के तौर पर उनकी भूमिका को शीर्ष अदालत में उनके न्यायिक कार्यों का विस्तार नहीं कहा जा


सकता। उसने कहा कि उचित कार्रवाई के लिए पूर्व प्रधान न्यायाधीश से संबंधित सभी दस्तावेज विधि मंत्रालय के पास भेज दिये गये हैं।
गृह मंत्रालय के उप सचिव पी के आहूजा द्वारा लिखे गए पत्र में कहा गया है, ‘‘एनएचआरसी के काम में जांच करना, हस्तक्षेप करना, मानवाधिकार के उल्लंघन की समीक्षा करना और अध्ययन करना और समाज के विभिन्न तबके में मानवाधिकार साक्षरता का प्रसार करना शामिल है। आयोग के इन कार्यों को बालकृष्णन द्वारा उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर किए जा रहे न्यायिक कार्यों का विस्तार नहीं कहा जा सकता।’’
बालकृष्णन को वर्ष 2000 में उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनाया गया था और 14 जनवरी 2007 को उन्हें भारत का प्रधान न्यायाधीश बनाया गया था। 12 मई 2010 को सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें एनएचआरसी अध्यक्ष नियुक्त किया गया।
सरकार को राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय से परामर्श मांगने की अनुशंसा करने का निर्देश देने के लिए कोई भी आदेश देने से इंकार करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा था कि अगर आरोपों में कोई सचाई है तो पूर्व सीजेआई के खिलाफ जांच के लिए मंत्रिपरिषद की सलाह पर शीर्ष अदालत से परामर्श मांगने की जिम्मेदारी राष्ट्रपति पर है।
एनएचआरसी अध्यक्ष को राष्ट्रपति के आदेश से तभी हटाया जा सकता है जब राष्ट्रपति द्वारा परामर्श मांगे जाने पर उच्चतम न्यायालय इस तरह की अनुशंसा करता है।

 
 

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