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Saturday, 09 February 2013 15:42 |
नयी दिल्ली । भाकपा-माले ने दावा किया कि अफजल 1993 में बीएसएफ के समक्ष समर्पण करने के बाद उसे संसद हमले में फंसाया गया।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी :माले: लिबरेशन ने अफजल गुरू को फांसी दिए जाने को ‘‘न्याय को फांसी देना’’ बताते हुए आज आरोप लगाया कि नरेन्रद मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की चाहत रखने वाली सांप्रदायिक फासीवादी शक्तियों को खुश करने के लिए ऐसा किया गया है।
पार्टी की ओर से जारी बयान में कहा गया कि हर तरफ से विरोध का सामना कर रही कांग्रेस और संप्रग सरकार ‘भाजपा एवं सांप्रदायिक फासीवादी ताकतों की खुशामद करने के लिए बेचैन है। लेकिन देश का लोकतांत्रिक अवाम कांग्रेस तथा भाजपा की इस सांठगांठ को ध्वस्त करेगा।’ इसमें दावा किया गया कि कश्मीरी उग्रवादी अफजल 1993 में बीएसएफ के समक्ष समर्पण करने के बाद से कश्मीर
के विशेष कार्यबल के लिए काम कर रहा था और उसे संसद पर हुए हमले के मामले में फंसाया गया है। बयान में कहा गया कि निचली अदालत में बिना किसी सुबूत के उसे दोषी ठहराया गया जबकि उस समय उसकी तरफ से कोई वकील तक नहीं था। इसके बावजूद उच्चतम न्यायालय ने ‘‘भारतीय समाज के सामूहिक विवेक को संतुष्ट करने’’ के नाम पर उसकी मौत की सजा को बरकरार रखा। हांलांकि शीर्ष अदालत और उच्च न्यायालय दोनों ने निम्न स्तरीय जांच और संदिग्ध सुबूत पेश करने के लिए पुलिस को फटकार लगाई थी। भाकपा-माले ने कहा, 1984 के सिख दंगों के लिए, 1992 के सूरत और उसके बाद 2002 के गुजरात दंगों सहित मुसलमानों के खिलाफ हुए तमाम दंगो के लिए, या फिर दलितों, आदिवासियों तथा अन्य पीडित तबकों के खिलाफ जनसंहार के लिए अभी तक किसी को फांसी नहीं दी गई। (भाषा)
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