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मोदी को क्लीन चिट पर जाकिया को विरोध याचिका की इजाजत PDF Print E-mail
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Friday, 08 February 2013 10:17

जनसत्ता ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी की विधवा जाकिया जाफरी को 2002 के गुजरात दंगों से संबंधित गुलबर्ग सोसायटी कांड का मामला बंद करने और मुख्यमंत्री नरेंद्र्र मोदी को क्लीन चिट देने की विशेष जांच दल की रिपोर्ट पर विरोध याचिका दायर करने की अनुमति दे दी है।

अमदाबाद की इस सोसायटी में 28 फरवरी, 2002 को हुए दंगे में जाकिया जाफरी के पति पूर्व सांसद एहसान जाफरी सहित 69 लोग मारे गए थे। न्यायमूर्ति पी सदाशिवम, न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की खंडपीठ ने गुरुवार को निर्देश दिया कि जाकिया जाफरी को इस मामले से संबंधित विशेष जांच दल की पूरी जांच रिपोर्ट मुहैया कराई जाए ताकि वे अदालत में विरोध याचिका दायर कर सकें।
अदालत ने स्पष्ट किया कि विशेष जांच दल के मुखिया की टिप्पणियों के बगैर ही यह रिपोर्ट जाकिया जाफरी को मुहैया कराई जाएगी और वे यह सामग्री मिलने के दो महीने के भीतर जांच दल की मामला बंद करने की रिपोर्ट के खिलाफ विरोध याचिका दायर कर सकती हैं। जजों ने कहा- हम साफ करते हैं कि याचिकाकर्ता 12 मई, 2010 को इस अदालत में सीलबंद लिफाफे में पेश पूरी रिपोर्ट प्राप्त करने की हकदार हैं। शीर्ष अदालत ने इसके साथ ही अमदाबाद की अदालत के 16 जुलाई और 27 नवंबर के आदेश रद्द कर दिए।
जाकिया जाफरी ने शीर्ष अदालत में पेश विशेष जांच दल के सदस्य एके मल्होत्रा की प्रारंभिक रिपोर्ट देने से अदालत के इनकार और विशेष जांच दल की मामला बंद करने की रिपोर्ट 13 मार्च को स्वीकार करने के अदालत के आदेश के खिलाफ अपील दायर की थी। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जाकिया की शिकायत पर जांच के दौरान दर्ज किए गए बयानों को अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के तहत दर्ज बयान माना जाए, जिसमें गवाहों से पूछताछ की जा सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि जांच के दौरान दर्ज किए गए बयानों का सिर्फ


मामला बंद करने के लिए विशेष जांच दल की रिपोर्ट पर फैसला करने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि मौजूदा आदेश सिर्फ जाकिया जाफरी की शिकायत तक ही सीमित है, जो आठ जून 2006 को दायर की गई थी और जिसमें 2002 के दंगों के सिलसिले में नरेंद्र मोदी व दूसरे व्यक्तियों के खिलाफ जांच की मांग की गई थी। गुजरात के अतिरिक्त महाधिवक्ता तुषार मेहता का कहना था कि राज्य सरकार इस मामले में प्रतिपक्ष की भूमिका में नहीं है। उन्होंने कहा कि विशेष जांच दल ने नौ मामलों की जांच की थी और इसमें से छह में सजा हुई है। न्याय मित्र की भूमिका निभा रहे वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन का कहना था कि जाकिया जाफरी सारी सामग्री पाने की हकदार हैं।
शीर्ष अदालत ने 12 सितंबर, 2011 को जाकिया को दस्तावेज मुहैया कराने के बारे में आदेश दिया था। शीर्ष अदालत ने ही गुलबर्ग सोसायटी में हुए नरसंहार पर विशेष जांच दल को जांच करने और अंतिम रिपोर्ट स्थानीय अदालत को सौंपने का आदेश दिया था। जाकिया ने इस मामले में जांच से संबंधित कुछ दस्तावेज मुहैया कराने से इनकार करने के निचली अदालत के आदेशों को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी। वे इस मामले को बंद करने की रिपोर्ट के खिलाफ विरोध याचिका दायर करना चाहती हैं।
जाकिया का कहना था कि ये दस्तावेज उपलब्ध कराने से इनकार करने का अदालत का आदेश उनके विरोध याचिका दायर करने में आड़े आ रहा है। जाकिया की वकील कामिनी जायसवाल का कहना था कि मामला बंद करने और दस्तावेज मुहैया नहीं कराने के 27 नवंबर के निचली अदालत के आदेश से पीड़ित का विरोध याचिका दायर करने का अधिकार प्रभावित हो रहा है। निचली अदालत का कहना था कि वे विशेष जांच दल की रिपोर्ट के खिलाफ विरोध याचिका दायर करने का अवसर गंवा चुकी है क्योंकि पर्याप्त अवसर दिए जाने के बावजूद उन्होंने ऐसा नहीं किया। इस जांच रिपोर्ट में मोदी को क्लीन चिट दी गई थी।

 

 
 

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