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मदुरै मंदिर में हिंदी साइनबोर्ड लगाने पर छिड़ा विवाद PDF Print E-mail
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Wednesday, 06 February 2013 15:46

मदुरै । मदुरै जिला प्रशासन को तमिल और अंग्रेजी के साथ ही हिंदी में साइनबोर्ड लगाने के अपने ताजा कदम को विरोध प्रदर्शनों के चलते पीछे हटाना पड़ा है।

साठ के दशक में भीषण हिंदी विरोधी आंदोलन के गवाह रहे राज्य में मदुरै जिला प्रशासन को तमिल और अंग्रेजी के साथ ही हिंदी में साइनबोर्ड लगाने के अपने ताजा कदम को विरोध प्रदर्शनों के चलते पीछे हटाना पड़ा है ।
मंदिरों के लिए प्रसिद्ध इस शहर में आने वाले सैंकड़ों पर्यटकों की मदद की उम्मीद में ये साइनबोर्ड लगाए गए थे लेकिन लोगों के विरोध के बाद इन्हें हटाना पड़ा है ।  कई स्थानीय संगठनों द्वारा इसका विरोध किए जाने के बाद कलेक्टर अंशुल मिश्रा ने यह बात कही।
उत्तर भारत से ताल्लुक रखने वाले मिश्रा ने सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर लिखा, ‘‘ हमारे तमिल बहन भाइयों की भावनाओं का सम्मान करते हुए , मैं तीन भाषाओं में साइनबोर्ड लगाने और इन बोर्डो में हिंदी भाषा के इस्तेमाल संबंधी मैं अपना आदेश वापस लेता हूं । मैं यहां तमिलनाडु के लोगों की सेवा के लिए हूं न कि अपनी मातृ भाषा को आगे बढ़ाने के लिए ।’’
अधिकारियों ने बताया कि तमिल देसा पोथू उदामाई काची जैसे कुछ समूहों ने इस प्रकार के साइनबोर्ड लगाने के कदम को मिश्रा द्वारा हिंदी को बढ़ावा दिया जाना करार


देते हुए विरोध किया था । इन संगठनों ने इस महीने इस मुद्दे पर विरोध किया था।
हालांकि टूर आपरेटरों और इस उद्योग से जुड़े लोगों ने कलेक्टर के कदम का स्वागत किया और इस प्रकार के तत्वों की मांग को खारिज किया । उनका कहना है कि इस प्रकार के कदम से तमिलनाडु या इसके लोगों के विकास में मदद नहंी मिलेगी।
एक टूर आपरेटर वेणुगोपाल ने कहा, ‘‘ कोई व्यक्ति जितनी अधिक भाषाएं जानता होगा, उसे रोजगार हासिल करने में उतनी ही अधिक सुविधा होगी ।’’
एक आटोरिक्शा चालक ने कहा कि हिंदी में साइनबोर्ड से तीर्थयात्रियों को मदद मिलेगी और वे धोखाधड़ी से बच सकेंगे । उन्होंने कहा, हर किसी को नहंी पता कि मीनाक्षी मंदिर रेलवे स्टेशन से हाथ भर की दूरी पर है लेकिन इसके लिए ही कुछ आटो चालक तीर्थयात्रियों से 150 रूपये तक झटक लेते हैं ।
गौरतलब है कि द्रमुक ने 1965 में भीषण हिंदी विरोधी आंदोलन चलाया था और इस दौरान छात्रों तथा अन्य संगठनों ने राज्य में हिंदी के आधिकारिक दर्जे को लेकर विरोध प्रदर्शन किए थे । इस मुद्दे ने अंतत: तमिलनाडु की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।
इसी मुद्दे के चलते 1967 के विधानसभा चुनाव में द्रमुक पार्टी कांग्रेस को हटाकर सत्ता में आने में सफल रही थी। इससे पूर्व द्रमुक कभी प्रदेश में सत्ता में नहीं आयी थी।  (भाषा)

 
 

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