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कुंभ के जगमगाते बाजार में भटकता हाशिए का समाज PDF Print E-mail
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Monday, 04 February 2013 10:17

अंबरीश कुमार, इलाहाबाद। कुंभ में एक बड़ा बाजार भी विकसित हो चुका है जो पहले के कुंभ से काफी अलग है। धर्म, आस्था और पुण्य के इस सबसे बड़े आध्यात्मिक समागम में इस हाशिए के समाज को भटकता हुआ देखा भी जा सकता है।यह इस बाजार का सबसे कमजोर खरीदार भी है। लेकिन साधु-संत और संन्यासियों का एक तबका ऐसा भी है जो भव्य आश्रम के अत्याधुनिक काटेज में रहता है और गंगाजल की जगह मिनरल वाटर पीता और पिलाता है। उनके देशी-विदेशी श्रद्धालु भी आभिजात्य वर्गीय होते हैं और उन्हें सारी सुविधाएं एक धार्मिक पैकेज की तरह कुंभ में मिल जाती हैं। इस कारण इलाहाबाद के सभी बड़े होटल बुक हो चुके हैं और दोगुनी कीमत पर भी नहीं मिल पा रहे हैं तो टैक्सी अब कानपुर से मंगवानी पड़ रही है क्योंकि दस फरवरी को मौनी अमावस्या का शाही स्नान होना है। उस दिन बड़ी संख्या में लोग यहां आएंगे। इसके बाद वसंत पंचमी का स्नान है।
दूसरी तरफ सिर पर मोटरी रखे पचहत्तर साल की दरपानी देवी अरैल के कल्पवासियों के बने तंबू की तरफ जाते हुए मिलीं। घर से जो दाल, चावल, नमक, तेल लेकर आई थीं वह खत्म हो चुका था। इसलिए राशन की दुकान से सामान लेकर आई थीं। बस्ती से आर्इं इस बुजुर्ग महिला से यह पूछने पर कि क्या कोई दिक्कत तो नहीं वे बोलीं-बबुआ ए तंबू में अंधेरा बा, क्योंकि पांच सौ में बिजली मिलत बा पर एतना पैसा नइखे। कल्पवासियों के लिए तो नेता लोगन को सोचना ही चाहिए। हालांकि सामने संगम की तरफ अद्भुत रोशनी नजर आ रही थी। समूचा कुंभ नगर जगमगा रहा था पर जिस तरह गांवों में दक्षिण टोले का हाल होता है वही हाल इनका भी दिखता है। कुंभ की प्राइम लोकेशन बड़े साधु-संतों और संन्यासियों ने अपने रसूख के हिसाब से ले ली और करीब महीना भर यहां रहने वाले कल्पवासी दूर के सेक्टर में पहुंचा दिए गए। इन लोगों की आस्था भी देखने वाली है जो नल का पानी पीने की बजाए संगम का पानी पीते हैं भले वह कैसा भी हो। इनमें ज्यादातर लोग गरीब हैं और काफी सामान लेकर आते हैं। एक समय खाना खाते हैं और शाम को आलू-मटर या चना-चबेना से काम चला लेते हैं। पुआल पर दरी-गद्दा बिछाकर सोते हैं और ठंड ज्यादा लगी तो पुआल को कंबल पर भी डाल कर ओढ़ लेते हैं।
दूसरे श्रद्धालु ऐसे भी मिले जो कुंभ में दो-तीन दिन के लिए आते हैं और यहीं चूल्हा-लकड़ी खरीद कर रेत पर खाना बनाते हैं और किसी न किसी आश्रम


के पंडाल में रात गुजार देंगे या रेत पर भी सो जाते हैं। ये यहां के फुटकर बाजार के बड़े खरीदार भी हैं। खास बात यह है कि इनका सामन बेचने वाले भी गरीब लोग हैं जो चूल्हा, चकला, बेलन, चिमटा से लेकर सब्जी तक बेचते नजर आ जाएंगे। जगह-जगह आसपास के गांव की महिलाएं  बिंदी, सिंदूर, कंघी, शीशा बेचती नजर आ जाएंगी। यहां का बाजार आस्था से जुड़ा है। इसलिए रुद्राक्ष, स्फटिक से लेकर तुलसी की माला और धार्मिक साहित्य भी यहां जमकर बिक रहा है।
लेकिन साधु-संत और संन्यासियों का एक वर्ग काफी अलग भी है जो अलग ढंग से रहता है और उसके यहां आने वाले श्रद्धालु भी अलग किस्म के होते हैं। ऐसे एक संन्यासी ने कुंभ में जगह ली। धार्मिक काम के नाम पर उनके यहां रिसार्ट जैसी सुविधाएं हैं और उसका भुगतान भी ठीक-ठाक होता है। बहुत से बड़े साधु-संतों का अपना मीडिया केंद्र भी है तो जनसंपर्क अधिकारी भी। इनका प्रसाद भी अच्छी पैकेजिंग के साथ दिया जाता है। एक स्वामी के आश्रम में अमेरिकी फल और मेवा से स्वागत हुआ तो दूसरे के यहां कैलिफोर्निया से आई रोस्टेड काफी पीने को मिली। लेकिन इस सबके साथ कुछ स्वामी पर्यावरण के क्षेत्र से लेकर योग और क्रिया योग के क्षेत्र में अपना योगदान दे रहे हैं। चिदानंद मुनि के आश्रम में करीब चालीस देशों से श्रद्धालु आए हुए हैं। उनका खानपान भी अलग होता है। उनके आश्रम के सामने ही एक मशीन लगाई गई है जिसमें दो रुपए का सिक्का डालने पर एक लीटर शुद्ध गंगा जल मिलता है। इसी तरह स्वामी सत्यम के यहां क्रियायोग को जानने-समझने के लिए जो कक्षाएं चल रही हैं उसमें भी विदेशी पुरुष और महिलाएं हिस्सा लेती हैं। स्वामी सत्यम ने कहा-हमारे यहां करीब ढाई सौ विदेशी श्रद्धालु आए हुए हैं। लेकिन वे सभी आश्रम में ही रुकते हैं और वही खाना खाते हैं जो हम लोग खाते हैं। हमारे यहां दूध या दूध से बनी किसी भी चीज का इस्तेमाल नहीं होता क्योंकि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जब कुंभ में गए तो इनके आश्रम गए थे।
इसी तरह कुछ संन्यासियों के आश्रम में उनकी संपन्नता और भव्यता भी दिखती है खासकर कई अखाड़ों के आश्रम में। इनमें बहुत से आश्रमों में विदेशी श्रद्धालु दिख रहे हैं। इनमें से कुछ के विदेशों में न सिर्फ भक्त हंै बल्कि आश्रम भी हैं। इनके लगातार विदेश दौरे भी होते रहते हैं। एक संन्यासी ने कहा-अब तो आस्था के इस क्षेत्र में भी ठेकेदारी शुरू हो गई है। किसी को नदी की सफाई का ठेका मिल जाता है तो किसी को जागरूक करने का। यह पहले नहीं होता था।

 

Last Updated on Monday, 04 February 2013 10:37
 
 

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