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लोकतंत्र का महत्व 3 ‘डी’ से होता है: राष्ट्रपति PDF Print E-mail
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Thursday, 31 January 2013 16:49

नयी दिल्ली । संसद और विधानसभाओं में हंगामे पर गंभीर चिंता जताते हुए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने आज कहा कि अब समय आ गया है कि इस मुद्दे पर गौर किया जाए क्योंकि इसे केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि यह मनमानी करने वाले प्रशासन को सबक सिखाने के लिए जरूरी है। मुखर्जी ने कहा, ‘‘मेरे युवावस्था के दिनों में हमें पढाया गया कि लोकतंत्र का महत्व तीन ‘डी’ से होता है, ‘डिबेट’ :बहस:, ‘डिस्कशन’ :चर्चा:, ‘डिसेंट’ :विरोध: और फिर आखिर में ‘डिसीजन’ :फैसला:। लेकिन जब मैं जुलाई में संसद से सेवानिवृत्त हुआ, तो मैंने पाया कि एक और ‘डी’ ‘डिसरप्शन’ :सदन की कार्यवाही में बाधा: है।’’
मुखर्जी चेन्नई में 134 साल पहले शुरू हुए अंग्रेजी अखबार ‘द हिन्दू’ द्वारा स्थापित सार्वजनिक नीतियों और शासन के ढांचे से जुड़े थिंक टैंक ‘द हिन्दू सेंटर फार पालिटिक्स एंड पब्लिक पालिसी’ के उदघाटन के मौके पर अपनी बात रख रहे थे।
इस समारोह में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, पूर्व प्रधानमंत्री देवगौडा, भाकपा महासचिव प्रकाश करात, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, कई केन्द्रीय मंत्री और सांसद मौजूद थे।
राष्ट्रपति ने इस संबंध में चर्चा की जरूरत पर भी बल दिया कि संसदीय लोकतंत्र की संस्थाओं को कैसे मजबूत किया जाए।


/>सदन में व्यवधान पर बोलते हुए राष्ट्रपति मुखर्जी ने कहा कि हम इसे यह कहते हुए नजरअंदाज नहीं कर सकते कि संभवत: यह जरूरी है। जो लोग ऐसा कर रहे हैं, वे लोग संसद में हैं और बराबर के जिम्मेदार हैं। क्या यह इस मुद्दे पर गौर करने का सही समय नहीं है?
मुखर्जी ने कहा कि ऐसा कहा जाता है कि कई बार यह किसी मुद्दे का समाधान निकालने के लिए मनमानी करने वाले प्रशासन को लेकर जरूरी होता है।
राष्ट्रपति ने कहा कि हालांकि सवाल खड़े होते हैं कि व्यवधान सरकार पर दबाव बनाता है या सदन के सदस्यों के अधिकार छीनता है।
उन्होंने कहा कि या यह सरकार को लाभ पहुंचाता है क्योंकि जब प्रश्नकाल बाधित होता है तो यह नीति उल्लंघनों सहित अन्य मुद्दों पर सरकार से सवाल पूछने से सदस्यों को रोकता है।
आजादी के तुरंत बाद संसद की कार्यवाही को याद करते हुए उन्होंने कहा कि संसद में बजट और वित्त विधेयकों पर गहन चर्चा हुआ करती थी।
उन्होंने कहा कि आजाद भारत के पहले बजट का आकार 197 करोड़ रूपये का था जिसमें 171 करोड़ रूपये का राजस्व था। सैन्य खर्च 96 करोड़ रूपये और असैन्य खर्च 101 करोड़ रूपये था। पहली पंचवर्षीय योजना का आकार 2000 करोड़ रूपये का था। (भाषा)

 
 

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