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अधिकारों की लड़ाई से जन्म ले रहा शिक्षक आंदोलन PDF Print E-mail
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Thursday, 31 January 2013 10:36

विनय कांत, गोरखपुर। अधिकारों की लड़ाई आंदोलन के रूप में तब्दील हो जाती है। अपनी मांगों के लिए कालेजों और विश्वविद्यालों के शिक्षक अब सड़कों पर उतर चुके हैं। अब तक अलग-अलग कालेज परिसरों में अपनी आवाज बुलंद कर रहे शिक्षक पहली बार सड़कों पर नारे लगा रहे थे। बीते सोमवार को भीषण सर्दी में भी सड़कों पर माहौल गरमाया था। किसी अनहोनी की आशंका से पुलिस शिक्षकों के काफिले के पीछे लगी हुई थी।
गोलघर स्थित नगर निगम दफ्तर के सामने गांधी प्रतिमा के सामने से हक की लड़ाई लड़ रहे शिक्षकों का कारवां आवाज दो हम एक हैं के नारे के साथ बढ़ चला। उत्तर प्रदेश विश्वविद्यालय महाविद्यालय शिक्षक महासंघ की अपील पर दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय और इससे संबंद्ध सात जनपदों गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर, महाराजगंज, बस्ती, संतकबीर नगर और सिद्धार्थनगर के कालेजों के श्क्षिक बीते सोमवार को सामूहिक अवकाश पर रहे। इनकी प्रमुख मांगों में एक जनवरी 2006 से नवंबर 2008 तक के एरियर का बकाया भुगतान और सेवानिवृत्ति आयु 62 से बढ़ा कर 65 किया जाना है। इसके अलावा भी शिक्षकों की और भी कई मांगे रहीं।
गुआक्टा के उपाध्यक्ष डा एसएन शर्मा कहते हैं कि 80 फीसद केंद्र दे रहा है। 20 फीसद ही राज्य सरकार को देना है। इसके बाद भी राज्य सरकार हमारे बकाए धन का भुगतान नहीं कर रही है। शिक्षक आंदोलन में शामिल सेंट एंड्रयूज डिग्री कालेज की डा सीमा शेखर, डा लिजी थॉमस और डा रईसा अली सवाल करती हैं कि धन का बहाना कर रही राज्य


सरकार पहले बताए कि वह बजट का कितना फीसद उच्च शिक्षा पर खर्च कर रही है।  डा सीमा शेखर कहती हैं कि केंद्रीय विश्वविद्यालयोें के शिक्षकों को बीमार होने का हक है और हमें नहीं है। हम लोगों को एलटीसी भी नहीं मिलता है। संत विनोबा पीजी कालेज देवरिया से धरना और प्रदर्शन में शामिल होने आई हुई डा नाजिश बानो सरकार से पूछती हैं कि जो लोग सेवानिवृत्त हो चुके हैं उनका फंड यूजीसी दे रही है, वह कहां जा रहा है।
महिला महाविद्यालय बस्ती से डा प्रणय सिंह, डा सीमा सिंह, डा कल्याणी द्विवेदी, डा तूलिका बनर्जी भी एरियर के भुगतान के मुद्दे पर सरकार के रुख से नाखुश दिखीं। प्राचीन इतिहास विभाग की डा तूलिका ने कहा कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों के शिक्षक हमसे अधिक योग्य नहीं हैं, जो उन्हें ज्यादा सुविधाएं मिल रही हैं। हम लोग भी यूजीसी मानकों को पूरा करके नियुक्त होते हैं। फिर राज्य के उच्च शिक्षा से संबद्ध हम शिक्षकों के साथ भेदभाव क्यों हो रहा है।
गुआक्टा के पूर्व अध्यक्ष डा वेद प्रकाश मिश्र ने बतलाया कि राज्य सरकार की हठवादी नीतियों के कारण हम लोगों का मामला सुलझाया नहीं जा रहा है। हीरालाल राम निवास स्नातकोत्तर महाविद्यालय बस्ती के डा राजेश चंद्र मिश्र के मुताबिक पिछले दो नवंबर को फुपुक्टर के प्रतिनिधिमंडल और सचिव स्तर की वार्ता में सरकारी हीलाहवाली मुनासिब नहीं है। जान बूझकर राज्य सरकार हमारे मामले को लटकाए हुए है। राज्य उच्च शिक्षकों की सेवानिवृत्ति आयु 65 साल किया जाए और सभी बकाये का भुगतान तुरंत किया जाए।

 
 

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