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बंगाल में एक दूसरे के खिलाफ जहर उगल रहे हैं नेता PDF Print E-mail
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Wednesday, 30 January 2013 10:21

प्रभाकर मणि तिवारी, कोलकाता। पश्चिम बंगाल में हाल के दिनों में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और विपक्षी वाममोर्चा के नेताओं के बीच तल्खी लगातार बढ़ रही है। एक-दूसरे के खिलाफ असंसदीय टिप्पणियों की होड़ में हर नेता दूसरे को पछाड़ने के फेर में है।

इससे राज्य में सियासत बेहद निचले स्तर पर पहुंच गई है। न तो सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के नेताओं का अपनी जुबान पर लगाम है और न ही विपक्षी माकपा के। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी तृणमूल कांग्रेस के नेताओं-मंत्रियों की जुबान पर अंकुश नहीं लगा पा रही हैं।
सत्तापक्ष के हमलों से आजिज आकर कई बार वाममोर्चा के नेता भी संयम खोकर असंसदीय टिप्पणी कर रहे हैं। एक-दूसरे पर हमलों में इस्तेमाल होने वाली असंसदीय भाषा ने बंगाल की राजनीतिक संस्कृति पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष के संबंध पहले कभी इतने कड़वे नहीं रहे हैं।
तृणमूल कांग्रेस की ओर से सांसद शुभेंदु अधिकारी, मंत्री ज्योतिप्रिय मल्लिक और अब वरिष्ठ सांसद सौगत राय के बीच लगता है असंसदीय भाषा के इस्तेमाल की होड़ लग गई है। दूसरी ओर, मोर्चा के घटक दल फारवर्ड ब्लाक के महासचिव देवब्रत विश्वास जवाबी हमला करने के फेर में तृणमूल पर राजनीतिक वेश्यावृत्ति का आरोप लगा रहे हैं।
सांसद शुभेंदु अधिकारी ने मेदिनीपुर जिले के माकपा नेताओं अशोक गुड़िया, अमिय साहू और लक्ष्मण सेठ को जहरीला नाग करार देते हुए लोगों से कहा कि आप जहरीले नाग के साथ जैसा व्यवहार करते हैं, वैसा ही इन नेताओं के साथ भी करना चाहिए। मंत्री ज्योतिप्रिय मल्लिक ने भी एक जनसभा में इसी भाषा में माकपाइयों को कोबरा बताते हुए कहा कि घर में अगर सांप घुस आए तो उसका फन कुचल देना चाहिए। उन्होंने तो माकपा नेताओं को रैलियों और सभाओं से परहेज करने की सलाह दी और कहा कि आम लोग अगर उनके साथ मारपीट कर दें, तो तृणमूल कुछ नहीं कर सकती। तृणमूल कांग्रेस विधायक सोनाली गुह ने महानगर के पार्क स्ट्रीट इलाके में हुई सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद कहा था कि बलात्कार की घटनाएं तो हमेशा होती रही हैं। कोलकाता या किसी बड़े शहर में ऐसी घटना होने पर ज्यादा शोर-शराबा होता है। लेकिन गांवों में इन घटनाओं पर ज्यादा शोर नहीं होता।
तृणमूल की सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने भी इस घटना को बलात्कार मानने से ही इनकार कर दिया था। एक निजी टीवी चैनल पर बातचीत करते हुए उन्होंने कहा था कि वह घटना उस महिला और उसके ग्राहकों के बीच हुई गलतफहमी का नतीजा थी। वहां कोई बलात्कार नहीं हुआ। तृणमूल के नए बने मंत्री बेचाराम मान्ना ने कहा था कि पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को कवि (सुकांत भट्टाचार्य) का भतीजा कहने में शर्म आती है। उनके शासनकाल में पूरे राज्य में खून की नदियां बही थीं।
अभी पिछले सप्ताह तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री को मारने की बात कह कर इस कड़ी को आगे बढ़ाया है। हालांकि विवाद बढ़ने पर उन्होंने इसका ठीकरा भी मीडिया के सिर फोड़ते हुए कहा कि उनके बयानों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। ममता ने सफाई दी कि


उन्होंने तो यह कहा था कि वे खाद की कीमतों के मुद्दे पर प्रधानमंत्री से दस बार मिली हैं। इससे अधिक वे कुछ और नहीं कर सकती। क्या मैं जाऊं और पिटाई करूं? यही बात उन्होंने कही थी और मीडिया का एक वर्ग कह रहा है कि मैंने कहा कि मैं प्रधानमंत्री की पिटाई करूंगी। यह पूरी तरह से बेबुनियाद और आधारहीन बात है।
इस मामले में विपक्षी माकपा के नेता भी पीछे नहीं हैं। विधानसभा चुनाव के पहले पूर्व सांसद अनिल बसु ममता पर अभद्र टिप्पणी कर चुके हैं।  लेकिन दोनों दलों में फर्क यह है कि माकपा जहां ऐसे बड़बोले नेताओं की टिप्पणियों के लिए माफी मांगती रही है, वहीं ममता ने इन पर चुप्पी साधे रखी है। फारवर्ड ब्लाक के महासचिव देवब्रत विश्वास ने इसी हफ्ते एक रैली में सवाल किया कि तृणमूल कांग्रेस आखिर कब तक राजनीतिक वेश्यावृत्ति करेगी? वह भाजपा, आरएसएस और कांग्रेस के साथ तो सो चुकी है, अब किसके साथ सोएगी? हालांकि बाद में इस टिप्पणी पर बवाल होने पर उन्होंने और उनकी पार्टी ने माफी मांग ली। दिलचस्प बात यह है कि तमाम नेता ऐसे टिप्पणियों के बाद इसके लिए मीडिया को जिम्मेवार ठहराते हुए सफाई देते हैं कि उनके बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। ममता तो पहले से ही हर आरोप मीडिया के सिर थोपती रही हैं।
ममता बनर्जी सत्ता में आने के बाद से ही राज्य में जगह-जगह उत्सवों का आयोजन कर रही हैं। अभी सोमवार को ही उन्होंने सिलीगुड़ी में उत्तर बंगाल उत्सव का उद्घाटन किया। विपक्ष ने उन पर इन उत्सवों के जरिए सरकारी पैसों की बर्बादी का आरोप लगाया है। इसके जवाब में ममता ने कहा है कि उत्सव नहीं, तो क्या श्राद्ध करूं? राज्य को क्या गिद्धों का अभयारण्य बना दूं? कलकत्ता विश्वविद्यालय के एक अध्यापक कहते हैं कि हताशा और अनुशासनहीनता की वजह से तमाम नेता संयम खो रहे हैं। जब मुख्यमंत्री की ही भाषा संयत नहीं हो, तो बाकी लोगों से इसकी उम्मीद कैसे की जा सकती है।
आखिर नेताओं की टिप्पणियों में अशालीन और असंसदीय शब्दों का इस्तेमाल क्यों बढ़ रहा है? राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि प्रचार माध्यमों में सुर्खियां बटोरने की चाहत ही कई नेताओं से ऐसी टिप्पणियां करा देती है। माकपा ने अपने नेताओं को भाषण के दौरान संयत रहने की सलाह दी है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस नेता पार्थ चटर्जी कहते हैं कि अशालीन शब्दों का इस्तेमाल बंद होना चाहिए। उन्होंने अपनी पार्टी  के अलावा विपक्ष के नेताओं से भी मीडिया के उकसावे में नहीं आने और संसदीय भाषा का इस्तेमाल करने की सलाह दी है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रदीप भट््टाचार्य कहते हैं कि नेताओं की असंयमित टिप्पणियों के कारण मौजूदा राजनीतिक दौर में एक बड़ा संकट पैदा हो गया है।
उनका कहना है कि अगर नेता ही संयम खो देंगे, तो वे आम लोगों और पार्टी के समर्थकों को संयमित रहने का उपदेश कैसे देंगे। ऐसे तो पूरे राज्य में अनुशासनहीनता की स्थिति पैदा हो जाएगी। यहां प्रमुख राजनीतिक दलों के नेता दावा चाहे कुछ भी करें बंगाल में राजनीतिक बयानबाजी का स्तर लगातार गिरता जा रहा है।

 

Last Updated on Wednesday, 30 January 2013 10:36
 
 

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