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Sunday, 27 January 2013 13:10 |
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नयी दिल्ली । न्यायमूर्ति जे एस वर्मा को कांग्रेस की ओर से मध्य रात्रि के बाद सुझाव भेजे जाने को लेकर सोनिया गांधी ने उनसे माफी मांगी थी।
बलात्कार रोधी कानूनों में बदलाव के बारे में न्यायमूर्ति जे एस वर्मा को कांग्रेस की ओर से मध्य रात्रि के बाद सुझाव भेजे जाने को लेकर पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उनसे माफी मांगी थी।
सीएनएन आईबीएन पर करण थापर के ‘डेविल्स एड्वोकेट प्रोग्राम’ में न्यायमूर्ति वर्मा ने यह जानकारी दी । उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री पी चिदंबरम की समिति गठित करने में अहम भूमिका रही। समिति ने आपराधिक कानूनों में व्यापक सुधारों की सिफारिश की है। कार्यक्रम में न्यायमूर्ति वर्मा ने कहा ‘आधी रात के बाद एक व्यक्ति मेरे घर आया, मुझे जगाया और :कांग्रेस पार्टी की ओर से भेजे गए: सुझाव निजी तौर पर मुझे सौंपने की कोशिश की। लेकिन यह बात न जाने कैसे कांग्रेस अध्यक्ष को पता चल गई। अगले दिन उन्होंने खुद मुझे फोन किया और मुझसे माफी मांगी। मेरे लिए यह काफी असमंजस की स्थिति थी। मुझे उनसे कहना पड़ा कि वह माफी न मांगें।’ न्यायमूर्ति वर्मा उस तीन सदस्यीय समिति के अध्यक्ष हैं जिसका गठन सरकार ने 16 दिसंबर की रात चलती बस में एक युवती के साथ हुई सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद बलात्कार रोधी कानूनों में सुधार करने के बारे में सुझाव देने के लिए किया था। समिति ने अपनी सिफारिशें 23 जनवरी को सौंपीं। सामूहिक बलात्कार के लिए समिति ने न्यूनतम 20 साल की कैद और बलात्कार तथा हत्या के लिए उम्र कैद की सिफारिश की है लेकिन मौत की सजा दिए जाने का जिक्र समिति की सिफारिशों में नहीं है। समिति ने बलात्कारियों को कठोर सजा देने के लिए आपराधिक कानूनों में सुधार की भी सिफारिश की है। इन में ऐसे सभी लोग शामिल हैं जो पुलिस अथवा सरकारी नौकरी में हैं । बलात्कार करने और पीड़ित को संकट की अवस्था में छोड़ देने वालों के लिए अपराध की नयी श्रेणी बनाने और उन्हें कड़ी सजा देने की सिफारिश की गई है। इसमें महिलाओं को निर्वस्त्र
करना, उनके निजी जीवन में ताकझांक करना ,उनका पीछा करना, उन्हें देह व्यापार में धकेलना आदि शामिल हैं। न्यायमूर्ति वर्मा ने कहा कि उन्होंने समिति का अध्यक्ष बनने की सहमति तब दी जब चिदंबरम ने प्रधानमंत्री के कहने पर उन्हें फोन किया । उन्होंने कहा कि अब तक उन्होंने गृह मंत्री सुशील कुमार शिन्दे से एक बार भी बात नहीं की है। यह पूछने पर कि उन्होंने बलात्कार के लिए मौत की सजा देने की सिफारिश क्यों नहीं की न्यायमूर्ति वर्मा ने कहा कि इस बारे में महिला समूहों में आम राय थी। उन्होंने कहा कि बलात्कार कानूनों में बदलाव के लिए दशकों से आवाज उठा रही महिला नेताओं में यह आम राय थी। ‘यहां तक कि वर्तमान चलन भी मौत की सजा के खिलाफ है।’ न्यायमूर्ति वर्मा ने कहा कि निर्मम बलात्कार की परिणति जब मौत में होती है तब आरोपी पर धारा 302 :हत्या: अपने आप लागू हो जाती है । इस प्रकार मौत की सजा की गुंजाइश बन सकती है। दायित्व निर्वहन में असफलता को लेकर उनकी सिफारिशों के बारे में पूछने पर न्यायमूर्ति वर्मा ने कहा कि यह जरूरी है क्योंकि अगर शीर्ष अधिकारी अपने दायित्वों का सही तरीके से निर्वाह करें तो कई अपराध टाले जा सकते हैं। समिति ने कुछ राजनीतिक सिफारिशें भी की हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या ऐसा कर समिति ने इन्हें राजनीतिक रूप देने की कोशिश की है , न्यायमूर्ति वर्मा ने कहा ‘ हमें अपनी छवि बनाने से कोई लेना देना नहीं है ,जैसा कि आम तौर पर किसी राजनीतिक नेता का विचार हो सकता है ।’ उन्होंने कहा ‘लेकिन हमने अपनी सीमाओं का दायरा बनाया है । निर्वाचन संबंधी कानून महत्वपूर्ण हैं क्योंकि आखिरकार वास्तविक प्रतिनिधित्व को यही प्रभावित करते हैं। जब तक वास्तविक प्रतिनिधित्व नहीं होगा, तब तक संवैधानिक गारंटी को पूरा नहीं किया जा सकता।’ महिलाओं के बारे में विवादास्पद टिप्पणियां करने को लेकर राजनीतिक और धार्मिक नेताओं पर नाराजगी जाहिर करते हुए समिति ने सिफारिश की है कि उन राजनीतिक नेताओं को अयोग्य घोषित करने के लिए कानून बनाया जाए जो अपने बयानों से लैंगिक पक्षपात को बढ़ावा देते हैं।(भाषा)
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