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Saturday, 26 January 2013 11:31 |
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मनोज मिश्र
नई दिल्ली । रातोंरात भाजपा अध्यक्ष बदलने से दिल्ली भाजपा में मानों भूचाल आ गया है।
बुधवार को नए अध्यक्ष राजनाथ सिंह की ताजपोशी के समय दिल्ली के कई नेताओं के बर्ताव ने इसको सार्वजनिक कर दिया। प्रदेश अध्यक्ष तक को कहा जा रहा था कि धैर्य रखें। कुछ नेता नए अध्यक्ष को अपना मान कर जिस तरह मंच पर से बाकी लोगों को खदेड़ रहे थे वह ‘पार्टी विथ डिफरेंस’ होने का दावा करने वाली भाजपा की पोल खोलने के लिए काफी था। दिल्ली में साल के आखिर में विधानसभा चुनाव होने हैं और कभी भी नए प्रदेश अध्यक्ष के नाम की घोषणा हो सकती है। माना जा रहा है कि जो नया प्रदेश अध्यक्ष होगा वही स्वाभाविक रूप से इस बार मुख्यमंत्री पद का भाजपा का उम्मीदवार बन जाएगा। इसलिए मारामारी ज्यादा हो रही है। राजनाथ सिंह पहले भी भाजपा के अध्यक्ष रह चुके हैं। उनके पहले कार्यकाल में जिन नेताओं की मंडली उन्हें घेरे रहती थी, वह अचानक मंगलवार की रात से सक्रिय हो गई। भाजपा पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का दबाव है लेकिन अब संघ में भी फैसला योग्यता से ज्यादा लाबिंग से होने लगा है। भाजपा में ज्यादातर नेता तो संघ की पृष्ठभूमि वाले ही हैं और जो कहीं और से आए हैं वे भी संघ के नेताओं की गणेश परिक्रमा में पीछे नहीं रहते। निवर्तमान अध्यक्ष नितिन गडकरी अगर तभी पद छोड़ देते जब उन पर आरोप लगे थे तो वे आगे चलकर हीरो बन सकते थे और नए अध्यक्ष का चुनाव ज्यादा व्यवस्थित ढंग से हो सकता था। राजनाथ सिंह की ख्याति भी कोई चुनाव जिताऊ अध्यक्ष की नहीं रही है। लेकिन आनन फानन में उनका नाम तय होते ही गडकरी के जमाने में दरकिनार किए गए या किसी भी नेता के सितारे बुलंद होते ही उसके करीब आने की कोशिश में लगे नेता सक्रिय हो गए। दिल्ली भाजपा अध्यक्ष का चुनाव अब तक हो चुका होता लेकिन संगठन चुनाव की प्रक्रिया इतनी धीमी है कि इसे पूरा होते होते विधानसभा चुनाव आ जाएंगे। भाजपा के विधान में है कि मंडल, जिला, प्रदेश या राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव आधे चुनाव होने के बाद कराए जा सकते हैं। इस तरह भी चुनाव होने में अभी समय लगेगा। वैसे पार्टी नेतृत्व कभी भी बदलाव करने के लिए स्वतंत्र हैं। मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता के विरोधी आरोप लगाते हैं कि वे जानबूझ कर चुनाव की प्रक्रिया धीमी किए हुए हैं ताकि उन्हें ही दोबारा अध्यक्ष बना दिया जाए। चुनावी साल में जो अध्यक्ष बनेगा, वह स्वाभाविक रूप से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बन जाएगा। पिछले विधानसभा चुनाव से सालभर पहले भाजपा ने नगर निगम चुनाव में कांग्रेस के विजय रथ को रोक दिया था। तब डॉ हर्षवर्धन प्रदेश अध्यक्ष थे। भाजपा में उनको मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाने पर लगभग सर्वानुमति बन गई थी लेकिन अचानक चुनाव के दो महीने पहले वरिष्ठ नेता प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार
घोषित कर दिया गया। वे 1967 में दिल्ली के मुख्य कार्यकारी पार्षद (अब के मुख्यमंत्री) बने थे। आज के मतदाताओं में से 80 फीसद को उनके बारे में पता ही नहीं था। पूरा माहौल कांग्रेस के खिलाफ होने के बावजूद महज तीन फीसद वोट के अंतर से कांग्रेस तीसरी बार सत्ता पा गई। मल्होत्रा अभी विधान सभा में विपक्ष के नेता हैं लेकिन अबकी उस तरह के दावेदार नहीं हैं। उनसे पहले लगातार दस साल विपक्ष के नेता रहे जगदीश मुखी की दावेदारी भी पिछली बार के मुकाबले कमजोर मानी जा रही है। लेकिन फिर भी वे दावेदार तो हैं ही। उनके साथ भाजपा महासचिव विजय गोयल, सचिव आरती मेहरा, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ हर्षवर्धन, मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता, पूर्व मंत्री सुरेंद्र पाल रातावाल और विधायक करण सिंह तंवर से लेकर करीब दो दर्जन नेता भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं। भाजपा की लगातार हार के कई कारणों में प्रमुख कारण मध्यवर्ग के वोटों का विभाजन होना है। शीला दीक्षित ने भाजपा के इस वोट बैंक में सेंध लगाई और अब इसी वर्ग में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) सेंध लगाने की तैयारी में है। दूसरे दिल्ली की आबादी का समीकरण बदल गया है। जो वर्ग भाजपा को चुनाव जिताता था, उसका अनुपात कम होता गया। तीसरे 2006 के परिसीमन ने भाजपा को कुछ क्षेत्र विशेष तक सीमित कर दिया। अल्पसंख्यकों के वोट वैसे भी भाजपा को नहीं मिलने और दलितों की बड़ी आबादी में उसकी पैठ न के बराबर है। पिछले चुनाव में 12 आरक्षित सीटों में वह महज दो सीटों पर जीत दर्ज कर पाई। पूर्व मंत्री रातावाल जैसे कद्दावर नेता को हाशिए पर रखने का पार्टी को नुकसान हुआ है। रातावाल ने खुद को करोलबाग तक सीमित कर लिया है जबकि उनका पूरी दिल्ली में इस्तेमाल हो सकता है। यही हाल पार्टी ने पूर्व सांसद लालबिहारी तिवारी का भी किया है। तीन बार कांग्रेस के दिग्गज नेताओं को हरा कर सांसद बने तिवारी भाजपा में हाशिए पर पहुंचा दिए गए हैं। जबकि पूरबिया मतों के ही बूते शीला सरकार 15 साल से दिल्ली में राज कर रही है। परिसीमन ने पूर्वांचल और दूसरे प्रवासी मतदाताओं की हैसियत बढ़ा दी है। 70 में से आधी विधान सभा सीटों में प्रवासी ही निर्णायक हैं। वैसे 50 सीटों पर उनकी आबादी 20 फीसद से ज्यादा है। इसके अलावा शीला दीक्षित का अपना व्यक्तित्व उन्हें चुनाव में लाभ पहुंचाता है। विजेंद्र गुप्ता ने ढाई साल में लगातार आंदोलन करके अपनी सक्रियता का परिचय दिया है लेकिन उन्हें लोग दीक्षित के मुकाबले बराबरी का नेता नहीं मानते। डॉ हर्षवर्धन को भाजपा की ओर से शीला दीक्षित की काट माना जा रहा है। इसलिए शायद भाजपा नेतृत्व 2008 की गलती को इस बार नहीं दोहराए और उनका नाम मुख्यमंत्री के रूप में घोषित करे। लेकिन नेतृत्व के लिए विजेंद्र के दावे को नजरअंदाज करना कठिन होगा। विजय गोयल समर्थक तो राजनाथ सिंह से उनके संबंधों के भरोसे उनकी दावेदारी को ही सबसे मजबूत मानते हैं।
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Last Updated on Saturday, 26 January 2013 13:27 |