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उप्र में राजनाथ तो बढ़ते गए, भाजपा घटती गई PDF Print E-mail
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Friday, 25 January 2013 10:13

अंबरीश कुमार, लखनऊ। राजनीति में चमत्कार से पद जरूर मिल सकता है पर बिखरा हुआ जनाधार मिलना बहुत मुश्किल है। राजनाथ सिंह के लिए सबसे बड़ी चुनौती उनका गृह प्रदेश ही बन गया है। उत्तर प्रदेश में भाजपा विधान सभा चुनाव में जो तीसरे चौथे नंबर के लिए संघर्ष कर रही थी उसमें कोई गुणात्मक बदला नहीं आया है जो आगामी लोकसभा चुनाव में कोई परिवर्तन नजर आए। राजनाथ की ताजपोशी पर पूर्वांचल के एक वरिष्ठ भाजपा नेता की टिप्पणी थी -उत्तर प्रदेश में भाजपा घटती गई पर राजनाथ सिंह का कद बढ़ता गया। इस टिप्पणी से राजनाथ सिंह के प्रति भाजपा के प्रदेश नेताओं का सदभाव आसानी से समझा जा सकता है।
हालांकि चंदौली के चकिया तहसील के भभौरा गांव में जश्न का माहौल है। यहां अब नरेंद्र मोदी को नहीं राजनाथ सिंह को लोग प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं। यह राजनाथ सिंह का गांव है जहां नारा गूंज रहा था, दिल्ली की दरकार है, राजनाथ सिंह की सरकार हो। उनके बड़े भाई काशीनाथ सिंह ने कहा- गांववालों की इच्छा है कि राजनाथ सिंह एक बार प्रधानमंत्री बने ताकि गांव का अस्पताल ठीक हो और टूटी फूटी सड़क बन जाए। जब वे मुख्यमंत्री थे तो बिजली भी आती थी और सड़क भी ठीक थी। प्रदेश की राजनीति में राजनाथ


सिंह की राजनीतिक प्रतिभा के सभी कायल हैं। राजनीतिक विश्लेषक वीरेंद्रनाथ भट्ट ने कहा -राजनाथ सिंह ने उत्तर प्रदेश में पार्टी को कांग्रेस के स्तर पर पहुंचा दिया है जहां सिर्फ दो नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी ही बचे हैं बाकि कोई नहीं। सब निपट गए इतने सालों में चाहे केशरी नाथ त्रिपाठी हो, कलराज मिश्र हो, कल्याण सिंह हो या ओमप्रकाश सिंह से लेकर टंडन आदि। अब राजनाथ सिंह से मुकाबला करने वाला कोई बचा ही नहीं है। पर इस सब में पार्टी भी निपटी है यह जरूर ध्यान रखना चाहिए। भाजपा का पिछले तीन लोकसभा चुनाव का रिकार्ड देख लें तो ग्राफ घटता हुआ ही नजर आएगा।
पिछली दो बार से दस सीटों पर ही अटकी हुई है। वैसे भी राजनाथ सिंह जिस राजपूत बिरादरी से आते हैं उसका वोट समाजवादी पार्टी को पिछले काफी समय से पड़ रहा है। राजपूत वोट यहां प्रदेश के क्षत्रप रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया और उनके दर्जन भर सिपहसालारों के साथ गोलबंद हैं। ऐसे में किसी तरह का जातीय वोट बैंक का फायदा पार्टी को हो यह नजर नहीं आता। पर प्रदेश में पार्टी की राजनीति में फिर उठापटक तय है। राजनाथ सिंह के खिलाफ जो गोलबंदी रही है वह अकेले भले न लड़ें पर एक दूसरे से हाथ जरूर मिला सकती है।

 

Last Updated on Friday, 25 January 2013 10:37
 
 

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