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हमारी पाकिस्तान नीति क्या है PDF Print E-mail
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Monday, 21 January 2013 11:11

बनवारी
जनसत्ता 21 जनवरी, 2013: पाकिस्तान की बर्बरता पर अपना मुंह खोलने में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को नौ दिन लगे। उस समय भी भारत सरकार के रवैये से यह नहीं लगा था कि उसने अपनी पाकिस्तान संबंधी नीति पर गंभीरता से पुनर्विचार करने का निर्णय लिया है। सरकार की प्रतिक्रिया पाकिस्तान को जवाब देने के लिए नहीं थी, भारत में उठे जनाक्रोश को संभालने के लिए ही की गई थी। दो दिन में ही प्रधानमंत्री से लेकर सेनानायक तक के रोष से भरे हुए बयान पुरानी बात हो गए और सरकार का सारा तंत्र दोनों देशों के बीच के तनाव को ढीला करने में लग गया। पाकिस्तान को इसी सब से बढ़ावा मिलता रहा है और अपनी निष्क्रियता से हम उसकी बर्बर आक्रामकता को बढ़ाते चले जा रहे हैं।
हम जानते हैं कि भारत के बारे में पाकिस्तान की नीति क्या है। पाकिस्तान का सैनिक और नागरिक नेतृत्व हमेशा भारत से शत्रुता की नीति पर चलता रहा है और उसने लगातार भारत को कमजोर करने और अधिक से अधिक नुकसान पहुंचाने की कोशिश की है। हम केवल उसकी कश्मीर में आतंकवाद फैलाने और उसे भारत से अलग करने की कोशिश पर ही ध्यान केंद्रित करते और करवाते रहे हैं। लेकिन कश्मीर तो केवल एक सुविधाजनक मुद्दा है जिस पर ध्यान केंद्रित रख कर वह भारत से अपनी शत्रुता को क्रियान्वित किए रहता है। यह सोचना नादानी ही है कि कश्मीर का कोई चमत्कारिक हल निकल आए तो भारत और पाकिस्तान के संबंध सुधर जाएंगे। जबकि भारत में सरकार और उसके बाहर एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो इसी गलतफहमी पर पाकिस्तान से संबंध सुधरने की आशा लगाए रहता है।
यह बात कम लोगों को याद है कि किस तरह 1947 में मोहम्मद अली जिन्ना भारत को कई टुकड़ों में बांटने में लगे हुए थे। ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि कोनराड कोरफील्ड जैसे अनेक ब्रिटिश अफसर इस अभियान में उनको सहयोग दे रहे थे और उनका मार्गदर्शन कर रहे थे। उन्होंने हैदराबाद और जूनागढ़ को तो भारत से अलग करने का प्रबंध कर ही लिया था। उसके बाद उनकी सारी शक्ति राजपूताने की रियासतों को भारत से अलग करने और पाकिस्तान में मिलाने पर केंद्रित थी। उनकी इस योजना को सफल बनाने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका भोपाल के नवाब और जोधपुर के महाराजा हनवंत सिंह निभा रहे थे। वे कोशिश कर रहे थे कि बीकानेर, जयपुर, जैसलमेर के अलावा कोटा और बूंदी जैसे रजवाड़ों का एक संघ बना कर उसे पाकिस्तान में मिला दिया जाए।
जोधपुर के राजा इन सभी रजवाड़ों का प्रतिनिधिमंडल लेकर उदयपुर के महाराजा भोपाल सिंह से मिलने गए थे और चाहते थे कि वे भी इस योजना में सम्मिलित हो जाएं। महाराजा भोपाल सिंह ने उन पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि वे पाकिस्तान में मिल सकते हैं, क्योंकि पहले भी वे मुगल राजाओं को अपनी बेटियां ब्याहते रहे हैं। लेकिन उदयपुर राज परिवार ऐसी बात सोच भी नहीं सकता। इस कटाक्ष को सुन कर बाकी राजा तो हतोत्साहित हो गए और उन्होंने अपनी रियासत के भारत में विलय पर हामी भर दी। लेकिन जोधपुर के राजा अपनी कोशिश में लगे रहे। मोहम्मद अली जिन्ना ने उन्हें एक कोरे कागज पर अपनी विलय संबंधी शर्तें लिखने के लिए कहा था और वादा किया था कि वे जो भी शर्तें हों, उन्हें स्वीकार होंगी। अगर जिन्ना अंतत: विफल हुए तो इसीलिए कि हनवंत सिंह अपने राजपूत और जाट सैनिक अफसरों और बहुसंख्यक हिंदू प्रजा की संभावित प्रतिक्रिया से डर कर अपने कदम आगे नहीं बढ़ा पाए।
इसके बाद पाकिस्तान कश्मीर और असम को भारत से अलग करने की कोशिश में लगा रहा है। कश्मीर में आतंकवाद फैला कर और असम में मुसलिम घुसपैठ के द्वारा जन-भूगोल बदल कर। अगर अब तक उसकी यह योजना सफल नहीं हुई तो इसका कारण भारतीय सेना है, जो अत्यंत कठिन परिस्थितियों में अपने सैनिकों की जान जोखिम में डाल कर भी देश की अखंडता की रक्षा का संकल्प निभाती रही है। भारत का राजनीतिक नेतृत्व, चाहे वह किसी दल का रहा हो, हमेशा दुर्बलता दिखाता रहा है। उसकी दुर्बलता के कारण ही कश्मीर समस्या जटिल हुई, असम के अनेक जिले मुसलिम आक्रामकता के हवाले हो गए और 1965 में भारतीय सेना ने जो सफलता प्राप्त की थी उस पर पानी फिर गया।
यह हमारे राजनीतिक नेतृत्व की दुर्बलता ही है कि हम पाकिस्तान के अल्पसंख्यक हिंदुओं को तो मार दिए जाने या जबरन मुसलमान बनाए जाने को रोक नहीं पाए, कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की भी रक्षा नहीं कर पाए। कश्मीरी पंडितों को जिस तरह घाटी से निर्वासित होना पड़ा, वह भारतीय राज्य के लिए अत्यंत लज्जा की बात होनी चाहिए थी। लेकिन पाकिस्तानी बर्बर आक्रामकता अल्पसंख्यकों तक सीमित नहीं रही है। भारत की संसद पर आक्रमण हुआ, मुंबई पर आक्रमण हुआ, करगिल में आक्रमण हुआ; हम पाकिस्तान के दुस्साहस का कोई जवाब नहीं दे पाए। हम जानते हैं कि पाकिस्तान के आतंकवादी संगठनों की स्वतंत्र सत्ता नहीं है, वे पाकिस्तान के सैनिक और नागरिक नेतृत्व द्वारा समर्थित रहे हैं। हम अपने भोलेपन में यह आशा पाले रहते हैं कि आतंकवाद पाकिस्तान को भी मुश्किल में डाले हुए है, इसलिए देर-सबेर वह अपने आप इस रास्ते से अलग हट जाएगा।
पाकिस्तान शुरू से ही एक असहज राजनीतिक इकाई था। पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान में तो कोई समानता थी ही नहीं, इसलिए ढाई दशक


में पाकिस्तान का विभाजन हो गया और बांग्लादेश स्वतंत्र देश के रूप में अस्तित्व में आ गया। पर शेष बचे पाकिस्तान में भी पंजाबी, सिंधी, बलूच और पठानों में कोई समानता नहीं है। भारत पाकिस्तान को तोड़ने की नीति पर चलता तो अब तक पाकिस्तान बिखर चुका होता। लेकिन पाकिस्तान या चीन की सामरिक चुनौती से भारत हमेशा अपनी आंखें चुराता रहा है। हमारे राजनीतिक नेतृत्व में न अपनी सभ्यता का गौरव है, न अपने देश के स्वाभिमान की चिंता। वे इन सभी चुनौतियों को भविष्य पर डालते चले जा रहे हैं।
भारत और पाकिस्तान में सद्भाव और मित्रता पनपने की आशा में लगे लोग अक्सर यह तर्क देते हैं कि दोनों देशों के बीच एक ही तरह के लोग हैं। उनके पुरखे, उनका रहन-सहन और दुख-सुख एक जैसे हैं। इसलिए उनमें शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की आकांक्षा जगाई जा सकती है। यह तर्क पाकिस्तान के इतिहास की नासमझी पर आधारित है। भारत सदा से स्वतंत्र किसानों और दूसरे वर्गों का देश था, जिसे पहले मुसलिम काल में और फिर अंग्रेजी राज के दौरान एक सामंती ढांचे में लाया गया। स्वतंत्र होने के बाद भारत ने उस आरोपित सामंती ढांचे को समाप्त कर दिया। लेकिन पाकिस्तान में वह ज्यों का त्यों बना रहा है। पाकिस्तान की राजनीति में कुल मिला कर तीन-चार सौ परिवारों का वर्चस्व रहा है और साधारण परिवारों से नए लोगों के राजनीति में आने की संभावना बहुत कम रही है। इन राजनीतिक परिवारों के बारे में सब जानते हैं कि उनका एक पैर पाकिस्तान में रहता है और दूसरा यूरोप, अमेरिका या अमीर अरब देशों में। पाकिस्तान में उन पर कटाक्ष करते हुए कहा जाता है कि पाकिस्तान में जब नागरिक सरकार होती है तो वह अनिवासी पाकिस्तानियों की ही होती है।
भारत में यह गलतफहमी फैलाई जाती रही है कि अगर पाकिस्तान में लोकतांत्रिक व्यवस्था दृढ़ हुई तो वह भारत से अपने संबंध सुधारने के लिए तैयार हो जाएगा। लेकिन लोकतंत्र कोई चुनाव प्रणाली लागू कर देने से ही स्थापित नहीं हो जाता। पाकिस्तानी समाज लोकतांत्रिक समाज नहीं है। वहां सत्ता की होड़ में रहने वाले राजनीतिक परिवार एक दूसरे को नष्ट करने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। उनके लिए राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और राजनीतिक शत्रुता में कोई विशेष अंतर नहीं है। पाकिस्तान की राजनीति राजनीतिक षड्Þयंत्रों से भरी रही है, इसलिए वहां जनतांत्रिक मूल्यों का विकास नहीं हो पाया। पाकिस्तान में अनेक बार चुनी हुई सरकारें बनी हैं, लेकिन वे सैनिक नेतृत्व की कठपुतली ही रही हैं।
दरअसल, पाकिस्तान की एकता का आधार काफी कमजोर है। सब जानते हैं कि पाकिस्तानी सेना पाकिस्तान की एकता का एकमात्र आधार है। पाकिस्तान के राजनीतिक ही नहीं, आर्थिक जीवन में भी उसने अपना इतना विस्तार कर लिया है कि उसके बिना पाकिस्तानी सत्ता की कल्पना नहीं की जा सकती। जब आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियां बिगड़ने लगती हैं तो पाकिस्तानी सेना अंतरिम अवधि के लिए चुनी हुई सरकार को बर्दाश्त करने के लिए तैयार हो जाती है। पाकिस्तान में कोई स्थायी सैनिक शासन इसलिए नहीं रह पाता कि अमेरिकी सहायता की बदौलत पाकिस्तान के शासक वर्गों ने यूरोप और अमेरिका में अपने ऐसे रसूख बना लिए हैं कि वहां से नागरिक शासन के पक्ष में दबाव पड़ता रहता है।
भारत के राजनीतिक क्षेत्रों में यह बात स्पष्ट रहनी चाहिए थी कि पाकिस्तान में सेना के नियंत्रण से मुक्त किसी नागरिक शासन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। पाकिस्तानी सेना के प्रभाव को बने रहने के लिए एक सामरिक शत्रु घोषित किए रहना आवश्यक है। यह सामरिक शत्रु भारत है।
भारत को शत्रु के रूप में प्रचारित करने की सेना की मजबूरी समझी जा सकती है, पर पाकिस्तान में तो भारत को शत्रु के रूप में देखने के बारे में एक आम सहमति ही है। इसका उदाहरण वहां के स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई जाने वाली वे पाठ््य-पुस्तकें हैं जिनमें भारत के प्रति जैसी नफरत भरी हुई होती है वैसी दुनिया के किसी और देश की पाठ्य-पुस्तकों में किसी और देश के बारे में नहीं होती होगी।
अगर पाकिस्तान की भारत संबंधी नीति भारत को शत्रु मान कर और उसे बर्बाद करने का लक्ष्य बना कर तैयार की गई है तो क्या हम अपनी पाकिस्तान संबंधी नीति इस झूठी दिलासा पर टिकाए रख सकते हैं कि कभी पाकिस्तान को सद्बुद्धि आएगी और वह भारत से शत्रुता का रास्ता छोड़ देगा? भारत और पाकिस्तान के संबंधों पर बात करते हुए अक्सर हिंदू-मुसलिम भाईचारे का भी उल्लेख किया जाता रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हमने जिस हिंदू-मुसलिम भाईचारे की नीति अंगीकार की थी उसे अपने देश के भीतर बनाए रखना हमारा राष्टÑीय दायित्व है। लेकिन यही बात पाकिस्तान के संबंध में नहीं कही जा सकती।
पाकिस्तान जब तक भारत को शत्रु मान कर चल रहा है, हमें भी उसे शत्रु मान कर ही अपनी रणनीति बनानी होगी। जब तक पाकिस्तान को यह भय नहीं होता कि भारत उसे अपूरणीय क्षति पहुंचा सकता है तब तक पाकिस्तान के दृष्टिकोण में परिवर्तन की आशा नहीं की जा सकती। बड़ी सभ्यताएं अपनी नीतियां भावुकता पर नहीं बनातीं, वास्तविक परिस्थितियों पर बनाती हैं। इसलिए हमारी पाकिस्तान संबंधी नीति का लक्ष्य यह होना ही चाहिए कि हम पाकिस्तान में यह डर पैदा कर सकें कि उसका दुस्साहस उसे विनाश की ओर ले जा सकता है। इसके लिए आर्थिक, कूटनीतिक और सामरिक सभी तरीके अपनाए जाने चाहिए।

 
 

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