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Wednesday, 12 September 2012 10:46 |
पुण्य प्रसून वाजपेयी जनसत्ता 12 सितंबर, 2012: करत करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान, रसरी आवत जात ते सिल पर पड़त निशान। झारखंड के संथाल परगना से निकलने वाली एक आदिवासी पत्रिका में इसी दोहे के जरिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आलोचना की गई है।
लेख में घोटालों और भ्रष्टाचार को लेकर प्रधानमंत्री से इस्तीफा मांगते विपक्ष को दोहे की याद दिलाते हुए कहा गया है कि आप अपने काम में लगे रहें, कभी न कभी तो प्रधानमंत्री पर असर पड़ेगा ही, जैसे कुएं से पानी निकालते-निकालते रस्सी के दाग पत्थर पर भी उभर आते हैं। आदिवासी बहुल इलाके झारखंड में ‘हम आदिवासी’ नाम की यह पत्रिका खूब पढ़ी जाती है। महज सोलह पन्नों की इस पत्रिका का मिजाज बताता है कि पहली बार मनमोहन सिंह का असर आदिवासी भी महसूस करने लगे हैं। यहां उन सवालों में खोने का वक्तनहीं है कि एक वक्त कांग्रेस को ही भारत की एकमात्र पार्टी मानने वाले आदिवासी भी क्या अब कांग्रेस को भूल रहे हैं। सवाल यह है कि इसी दौर में पश्चिमी मीडिया ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर आर्थिक सुधारों को लेकर न सिर्फ सीधा निशाना साधा, बल्कि इतिहास के पन्नों में विफल प्रधानमंत्री साबित होने की दिशा में बढ़ते कदम की लकीर भी खींच दी। आठ जुलाई को ‘टाइम’ पत्रिका ने मनमोहन सिंह को कवर पर छाप कर ‘अंडरअचीवर’ कहा, यानी उनकी उपलब्धियों को उम्मीद से कमतर बताया। हफ्ते भर बाद ही सोलह जुलाई को ब्रिटेन के अखबार ‘द इंडिपेंडेंट’ ने आर्थिक सुधारों के पुरोधा के तौर पर वित्तमंत्री के पद से शुरूहुए मनमोहन सिंह को एक कमजोर और बंधे हाथ के साथ प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे देखा। वहीं पांच सितंबर को ‘वाशिंगटन पोस्ट’ ने मनमोहन सिंह की खामोशी में एक त्रासदप्रधानमंत्री की छवि देखी, जो दांत के डॉक्टर के पास जाकर भी मुंह नहीं खोलते हैं। भारत के सबसे पिछड़े इलाके संथाल परगना से लेकर दुनिया के सबसे विकसित देश अमेरिका तक जब मनमोहन सिंह ही मनमोहन सिंह हैं तो यह लोकप्रियता है या फिर त्रासदी? यह सवाल इसलिए, क्योंकि मौजूदा वक्तमें देश के मुख्यधारा के मीडिया में भी अस्सी फीसद हिस्सा मनमोहन सिंह के ही इर्दगिर्द रचा हुआ है। ‘इंडिया टुडे’ तो कवर पेज पर ‘सरकार का मुंह काला’ तक लिखती है। लेकिन क्या कांग्रेस क्या सरकार, आह तक नहीं करती। उनकी आह सुनाई पड़ती है तो ‘टाइम’ पत्रिका या ‘वाशिंगटन पोस्ट’ की रिपोर्ट को लेकर, जिसकी कुल जमा आठ हजार प्रतियां ही भारत आती हैं। जबकि ‘हम आदिवासी’ तीस हजार छपती-बंटती है। देश भर में जितनी पत्र-पत्रिकाओं में मनमोहन सिंह निशाने पर हैं, अगर उसका आंकड़ा जमा करें तो दस करोड़ पार कर जाएगा। तो क्या यह माना जा सकता है कि मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री होकर भी भारत के भीतर भारत से इतर एक नया समाज बनाने में लगे रहे जिसकी जमीन आर्थिक सुधार पर खड़ी है। यह सवाल इसलिए, क्योंकि ‘टाइम’, ‘इंडिपेंडेंट’ और ‘वाशिंगटन पोस्ट’ के निशाने पर मनमोहन सिंह आर्थिक सुधार को न चला पाने को लेकर ही हैं। ये तमाम पत्रिकाएं मनमोहन सिंह का सच यह कह कर बताती हैं कि जुलाई 1991 में भारत के दरवाजे जिस तरह वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने दुनिया के लिए खोले वह अपने आप में एक अद्भुत कदम था। हर रिपोर्ट दुनिया की अर्थव्यवस्था में भारत की मौजूदगी दर्ज कराने का श्रेय मनमोहन सिंह को ही देती है। चाहे परमाणु करार हो या एक दर्जन सरकारी सेक्टर का दरवाजा विदेशी निवेश के लिए खोलने की पहल, मनमोहन सिंह की वाहवाही पश्चिमी मीडिया झूम-झूम कर करता है। मगर एक झटके में 2009 के बाद जब राडिया टैप से कलई खुलनी शुरू होती है कि असल में देश में सरकार बनी तो नागरिकों के वोट से है, लेकिन सारी नीतियां कॉरपोरेट के लिए कॉरपोरेट ही कैबिनेट मंत्रियों के जरिए बना रहा है, तो कई सवाल देश के भीतर खड़े होते हैं और कॉरपोरेट घरानों को भी समझ में आता है कि कौन-सा घराना यूपीए-एक के दौरान लाभ पा-पाकर बहुराष्ट्रीय कंपनी होने का तमगा पा गया और कौन-सा कॉरपोरेट संघर्ष करते हुए मंत्रियों और नौकरशाही के जाल में ही उलझा रहा। देश के पांच शीर्ष कॉरपोरेट इस दौर में खुद को बहुराष्ट्रीय बनाने निगम बनाने में इसलिए सफल हो गए, क्योंकि उन्हें देश की नीतियों और सरकारी फैसलों को प्रभावित करने की छूट उन्हें विकास के नाम पर मिली। और उसकी कमाई से देसी कॉरपोरेट ने दर्जन भर देशों की कंपनियों को खरीद लिया। यह खरीदारी खनन से लेकर स्टील और ऊर्जा से लेकर कार बनाने वाली कंपनियों तक रही। ये सवाल बीते ढाई बरस में कहीं ज्यादा तीखे या त्रासद इसलिए भी हुए, क्योंकि 2-जी स्पेक्ट्रम के साथ ही क्रिक्रेट के नाम पर आइपीएल के धंधे, राष्ट्रमंडल खेलों के कथित सफल आयोजन और देश के खनिज संसाधनों की लूट के लिए देश का दरवाजा ही नहीं
सुरक्षा की दीवार गिराने का सच भी सामने आया। सुरक्षा का सवाल इसलिए क्योंकि खनिज संपदा की लूट में जुटे देसी कॉरपोरेट के कर्मचारियों-अधिकारियों में विदेशी नागरिकों की भरमार है। जापान, चीन, आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कोरिया और अमेरिका के अधिकारी देश के उन पिछड़े इलाकों में खुले तौर पर देखे जा सकते हैं, जहां खनन से लेकर ऊर्जा संयंत्र बिठाने का काम चल रहा है। जबकि देश में इंदिरा गांधी ने ही कोल इंडिया के राष्ट्रीयकरण के साथ यह कानून भी जोड़ा था कि कोई विदेशी नागरिक भारत के खनिज संपदा वाले इलाकों में किसी भी तरह की कोई नौकरी नहीं कर सकता। नेहरू के दौर से ही खनिज संपदा देश की राष्ट्रीय सपंत्ति मानी गई। साथ ही यह माना गया कि देश की खनिज संपदा की जानकारी कभी विदेशियों को नहीं होनी चाहिए। यानी सुरक्षा के लिहाज से देश ने माना कि खनिज संपदा अपनी है और इस पर आंच नहीं आने दी जाएगी। लेकिन यह किसे पता था कि आर्थिक सुधार का मतलब खनिज संपदा को अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए खोलना भी होगा। तो क्या इस दौर में मनमोहन सिंह की आर्थिकी ने भारत को दुनिया का ऐसा केंद्र बना दिया जहां उपभोक्ता खुली मंडी के तौर पर भारत को देखे। कुछ हद तक यह माना जा सकता है, क्योंकि मौजूदा वक्तमें भारत के संचार, जहाजरानी, नागरिक उड््डयन, बुनियादी ढांचे, ऊर्जा, सूचना प्रौद्योगिकी और खनन के क्षेत्र में दुनिया की एक सौ पैंतीस निजी कंपनियां प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर काम कर रही हैं। और दुनिया के सौ से ज्यादा उद्योग अलग-अलग क्षेत्र में भारत को मशीन या टेक्नोलॉजी उपलब्ध करा रहे हैं। भारत में सीरिया या ईरान सरीखा सकंट नहीं है, बल्कि सरकार को अब भी जनता चुनती है, लेकिन दुनिया की सबसे ज्यादा निजी कंपनियों की अर्थव्यवस्था या कहें मुनाफा भारत पर टिका है। सीरिया या ईरान का जिक्र इसलिए क्योंकि ‘वाशिंगटन पोस्ट’ में मनमोहन सिंह की आलोचना छपने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय में बैठे मीडिया सलाहकारों ने यही फैलाया कि प्रधानमंत्री चंूकि गुटनिरपेक्ष सम्मेलन में ईरान के साथ खड़े हुए, सीरिया के सवाल को उठाया, और दुनिया के निजाम को बदलने का आह्वान करते हुए वक्तव्य दिया, इसलिए अब उन पर अमेरिका निशाना साध रहा है। इसमें दो मत नहीं कि ईरान या सीरिया को लेकर अमेरिका जैसा सोचता है वैसा भारत न सोच रहा है और न ही अमेरिका के अनुकूल कदम उठा रहा है। यानी अमेरिका की नाखुशी जगजाहिर है। लेकिन इस दौर में क्या मनमोहन सिंह भी सीरिया या ईरान के शासकों की तरह बर्ताव कर पा रहे हैं, जहां प्राथमिकता में पहले उनके अपने नागरिक हों, उनका अपना देश हो। जाहिर है, मनमोहन सिंह की साख देश में घटी इसलिए है क्योंकि वे आर्थिक वृद्धि दर के जरिए विकास की जो तस्वीर गढ़ते रहे हैं उसमें देश के अस्सी करोड़ नागरिक अपने को कहां पाते हैं यह एक अबूझ पहेली है। और जिन बीस-तीस करोड़ नागरिकों के लिए भारत के भीतर एक अलग विकसित समाज बनाने का जो ताना-बाना बुना जा रहा है उसका सच इतना त्रासद है कि पश्चिमी या देशी मीडिया की कोई भी सुर्खी कमजोर पड़ जाए। मसलन, जिस पहली दुनिया में मनमोहन सिंह को मान्यता है, उसी दुनिया (विश्व आर्थिक मंच) की सूची भारत को आधारभूत संरचना के विकास के लिहाज से उनसठवें नंबर पर रखती है। देश के भीतर के हालात ऐसे हैं कि सिर्फ पैंतीस करोड़ लोगों को आज की तारीख में चौबीस घंटे बिजली मिल सकती है। बाकियों को अंधेरे में रहना होगा। और उपलब्ध बिजली के बंटवारे के बाद किसानों के खाते में हर दिन सिर्फ आधे घंटे बिजली आएगी। कोयला, बॉक्साइट, गैस, पेट्रोल, डीजल, खाद, बीज और पानी तक की कीमत क्या होगी यह चुनी हुई सरकार तय नहीं कर सकती। बल्कि जिन कंपनियों ने इनका ठेका लिया है या कहीं जो उनके उत्पादन से लेकर वितरण तक के काम में लगी हैं उन्हीं का मुनाफा तय करता है कि आम नागरिक को कितनी कीमत चुकानी है। इस घेरे में पढ़ाई-लिखाई और इलाज को भी लाया जा चुका है। लेकिन इन सबसे जुड़ी कंपनियों को सरकार कितना सबसिडी जनता या देश के पैसे में से दे देती है यह भी एक हैरतअंगेज सच है। सरकार ने कॉरपोरेट सेक्टर को करों में बीते तीन बरस में दो लाख करोड़ से ज्यादा की छूट दे दी। यानी वह न चुकाए। और इसी तरह उत्पाद शुल्क में चार लाख तेईस हजार दो सौ चौरानबे करोड़ और सीमा शुल्क में छह लाख इक्कीस हजार आठ सौ नब्बे करोड़ की छूट दे दी। आप इसे कॉरपोरेट को मिलने वाली सबसिडी भी कह सकते हैं। तो कौन-सा भारत किस आर्थिक सुधार के जरिए खड़ा हो रहा है? और ‘वाशिंगटन पोस्ट’ की नजर में खामोश मनमोहन सिंह की त्रासदी वाली रिपोर्ट सही है या फिर ‘हम आदिवासी’ पत्रिका की रिपोर्ट?
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