मुखपृष्ठ
|
Saturday, 08 September 2012 10:31 |
कृष्णदत्त पालीवाल जनसत्ता 8 सितंबर, 2012: भारत में आज जो विकृत वैश्वीकरण का चेहरा उभर रहा है, वह हमारे किए-धरे का ही नतीजा है।
राजनीति में हमने गांधी-विचार दर्शन की न जाने कितनी बार हत्या की है। लोहियावाद, जयप्रकाश नारायण के समाजवाद, आंबेडकर के दलित चिंतन को शंकालु दृष्टि से नकार की राजनीति में फेंका है। नेहरूवाद के सहारे चिंतन के पश्चिमी मॉडल को अपनाया है और उधर ही मतवाले होकर मूल्यांधता में दौड़ लगा रहे हैं। हमारी राजनीति के सभी बड़े उद््देश्य केवल नारा बन कर रह गए। परिणाम यह हुआ कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भटक गया। पिछले वर्षों में विकास और प्रगति, बाजारवाद और ग्लोबल कल्चर के नाम पर नव सांस्कृतिक साम्राज्यवाद, लेट कैपिटलिज्म या बृहद पूंजीवाद ने तीसरी दुनिया के देशों में पैर फैलाना शुरू किया। गांव अंधाधुंध उजड़ने लगे और शहरीकरण का अंधड़ चला। यह सोचे बिना कि भारतीय चेतना के मूल में ग्राम समाज रहा है। कृषि-संवेदना में हम पले हैं। नदी, पर्वत-वन, उपवन, तालाब, अरण्य के साथ जिए हैं। यह नहीं सोचा कि अपनी कृषिजीवी संस्कृति-संवेदना से कट कर हम शहरीकरण, आधुनिकीकरण में कैसे जिएंगे। रातोंरात ‘विकास’ के नाम पर आधुनिकता में हमारा निर्वाह कैसे होगा। अचानक हमने पाया कि शहरीकरण ने गांवों को उजाड़ कर करोड़ों कृषकों, मजदूरों, शिल्पकारों, कलाकारों को झोपड़ियों में सड़कों के किनारे प्रकृति से काट कर जीने को विवश किया है। इसमें कृषक-मजदूर जीवन की अपनी लय, अपनी जीवन पद्धति बालू के ढेर की तरह ढह गई। कभी वैश्वीकरण-शहरीकरण के प्रभावों से उत्पन्न भटकावों को लेकर जॉन बर्जर ने लिखा था कि किसानों को पिछले वर्षों के अंधाधुंध औद्योगीकरण ने अपनी जमीन से उखाड़ कर शहरीकरण के अजनबीपन में ला फेंका है। शहरीकरण के सुख के झूठे यूटोपिया ने किसानों-मजदूरों-शिल्पकारों की एक पूरी पीढ़ी को अनेक अभिशापों के साथ निर्ममता से उन्मूलित कर दिया। जॉन बर्जर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘पिग अर्थ’ में यूरोप के अन्य देशों में किसानी संस्कृति के विनाश के भयानक परिणामों को लेकर लिखा है ‘‘पूंजीवाद की यह ऐतिहासिक भूमिका रही है, जिसकी एडम स्मिथ और मार्क्स ने कल्पना तक नहीं की थी कि वह इतिहास को ही नष्ट कर देता है। यह भूमिका वह किसानों को नष्ट करने में पूरा करता है, क्योंकि किसानों का ही एक ऐसा वर्ग है, जो परंपराओं को कायम रखता है। अतीत का बोध इतिहास की चेतना से जुड़ा होता है। पूंजीवाद अतीत से जुड़ी हर शृंखला को तोड़ देता है। पूंजी इसी तरह अपने को सुरक्षित रख सकती है कि वह अपने को अनवरत पुनरुत्पादित करती रहे। उसका मौजूदा यथार्थ उसकी भावी संपूर्ति पर निर्भर करता है। यही पूंजी का तत्त्वज्ञान है जो अपने को उपभोक्तावाद में परिणत कर लेता है। यह वह सिद्धांत है जो किसानों को पिछड़ा हुआ मान कर चलता है। किसान जीवन के तंतुजाल में पैठ कर उसे उन्मूलित कर देता है। उन्हें शहरों की ओर धकेल देता है, जहां वे झुग्गी-झोपड़ी में रहने के लिए विवश होते हैं। अपने अतीत बोध से वंचित हो जाते हैं।’’ और समय के साथ-साथ अपने समस्त कर्मकांडों, पर्व-अनुष्ठानों, तीज-त्योहारों, उत्सवों को भूल जाते हैं जो कभी उनकी जीवन प्रणाली को सातत्य प्रदान करते थे। इस तरह हम देखते हैं कि जिसे हम इतिहास में प्रगति या विकास का नाम देते हैं, वह स्वयं इतिहास को नष्ट कर देता है। गांधीजी को शहरीकरण वाली पश्चिमी आधुनिकता में विनाश का भयावह रूप दिखाई देता था। वे इस देश को हर कीमत पर उस ‘पश्चिमी आधुनिकता’ से बचाना चाहते थे। लेकिन इतिहास विधाता की यात्रा का पथ गांधी के ‘हिंद स्वराज’ के बीज-पाठ को पूरी तरह से त्याग कर चला। गांधीजी ने ‘प्रिय जवाहरलाल को’ को पत्र लिखा- हिंदुस्तानी में। गांधीजी ने लिखा- ‘‘मैं यह मानता हूं कि अगर हिंदुस्तान को सच्ची आजादी पानी है और हिंदुस्तान की मार्फत दुनिया को भी, तब आज नहीं तो कल देहातों में ही रहना होगा- झोपड़ियों में। महलों में नहीं। कई अबज आदमी शहरों में और महलों में सुख से और शांति से कभी नहीं रह सकते।’’ हिंदी में लिखे इस पत्र का उत्तर जवाहरलाल नेहरू ने अंग्रेजी में दिया। उन्होंने गांधीजी के विचारों का प्रतिवाद करते हुए स्पष्ट लिखा कि ‘‘मैं नहीं समझ पाता कि क्यों गांव अनिवार्यत: सत्य और अहिंसा की मूर्ति ही हो। गांव आमतौर पर बौद्धिक और सांस्कृतिक रूप से पिछड़ा होता है और पिछड़े वातावरण में प्रगति नहीं की जा सकती। संकीर्ण मानस वाले लोगों के झूठे और अहिंसक होने की संभावना ज्यादा है।’’ दरअसल, नेहरू जी को गांधी के गांव, सत्य और अहिंसा तीनों को लेकर परेशानी होती थी। नेहरू जी ने गांधी से असहमत होकर लिखा कि ‘‘मुझे यह भी लगता है कि यातायात के आधुनिक साधनों और दूसरी आधुनिक सुविधाओं को अनिवार्य रूप से बनाए रखना और विकसित करना चाहिए। उनको अपनाए बगैर कोई रास्ता नहीं है। अगर ऐसा है तो कुछ मात्रा में भारी उद्योग रहेगा ही। उसका कहां तक विशुद्ध ग्रामीण समाज से मेल बैठेगा?’’ 1928 में जब नेहरू जी समाजवाद के नए-नए प्रभाव में थे तब भी गांधी ने उन्हें समझाया था कि महलों में रहने वालों के लिए नहीं, गांवों में रहने वाले गरीबों के लिए, झोपड़ियों में रहने वाले किसानों के लिए हमें भावी भारत के नए सिद्धांतों का निर्माण करना चाहिए। लेकिन गांधी के वारिस ने गांधी के विचारों को मानना जरूरी नहीं समझा। 7 जून 1947 के अपने प्रार्थना प्रवचन में आखिरकार गांधीजी ने कह ही दिया कि ‘‘अब हिंदुस्तान का औद्योगीकरण होने वाला है। लेकिन मेरा औद्योगीकरण तो देहातों में होगा।’ आज
गांधी के गांव उजड़ गए और आधुनिकता के चक्कर में मदिरापान और तमाम कुकर्मों में गर्क हो गए हैं। गांधी के गांव गांधी की पराजय का पूरा इतिहास कह रहे हैं- हिंसा, जलन, झूठ, यौन क्रांति के अड्डे बन रहे हैं। हर गांव में अंग्रेजी स्कूल खुल रहे हैं और गांवों की पूरी युवा पीढ़ी शहरों की ओर भाग खड़ी हुई है। गांवों में केवल एक बूढ़ी लाचार पीढ़ी पड़ी सिसक रही है राजनीति के नरक के साथ। इक्कीसवीं शताब्दी के पहले दशक से ही वैश्वीकरण के समर्थकों का दबदबा बढ़ा है। वैश्वीकरण के पूंजीवादी तंत्र ने ‘विकास’ की गति को तेज कर दिया है। ‘विकास’ और ‘प्रगति’ पर लट्टू पीढ़ी मोबाइल फोन पर झूम रही है और टेलीविजन के उपभोक्ताओं की बांछें खिली हुई हैं। कारों और दुपहिया की संख्या-वृद्धि को आधार बना कर कहा जा रहा है कि इस दुनिया के सुखवाद का अर्थ ही और है। महानगरों की छाती पर खड़े शॉपिंग प्लाजा और मॉल विकास के प्रतीक कहे जा रहे हैं। विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि, विदेशी पूंजी निवेश, निर्यात में वृद्धि, जीडीपी में वृद्धि को चतुर्भुज ब्रह्म सिद्ध किया जा रहा है। आंकड़ों से यह खुशी भी फैलाई जा रही है कि नव शिक्षितों को उच्च तकनीकों के माध्यम से रोजगार दिया जा रहा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों से भारी पैकेज पाने वाली युवा पीढ़ी चौका-चूल्हे की संस्कृति को दूर से नमस्कार करके रेस्तरां संस्कृति में जी रही है। आधुनिकता ने ‘घर’ का अर्थ ही बदल दिया है। एक खुदगर्ज व्यक्तिवाद तगड़ा हुआ है और विकास के नाम पर भारत में पश्चिमवाद के नगाड़े बज रहे हैं। हम मीडिया क्रांति के डिजिटल युग में प्रवेश कर गए हैं और नित नई उपभोक्ता तकनीकों का लुत्फ उठा रहे हैं। वैश्वीकरण का तर्क पहले एसटीडी, पीसीओ, फिर कॉल सेंटर और अब प्रबंधन के क्षेत्र में बड़ी-बड़ी नौकरियां दे रहा है। हमारा नव मध्यवर्ग इस क्षेत्र के आकर्षण से झूम रहा है। यह सोचने के लिए अब कोई तैयार क्यों हो कि इस संपन्नता की कीमत क्या है? मोबाइल फोन शुरुआत में तो विदेशी कंपनियों ने हजार-दो हजार में बेचे। आज पांच हजार से लेकर लाख रुपए तक बेचा जा रहा है और इनसे बाजार पट गया है। इनमें न जाने कितनी डिवाइसें फिट कर दी हैं- फोटोग्राफी, कंप्यूटर, रिकार्डिंग और असीम स्मृति-कक्ष। इनके मालिक निरंतर लाभ के लिए नई-नई तकनीक इजाद करते हैं और इंटरनेट की सुविधाओं से संपन्न बना कर सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रतिमान बन गए हैं। महंगे कंप्यूटर, लैपटाप, महंगे जूते, महंगे पर्स सभी का सदाबहार बाजार भारत बन रहा है। यह भी चलन पनपा है कि एक-एक व्यक्ति तीन-तीन, चार-चार मोबाइल रखता है। जमीन के धंधेबाज भूमाफिया अपनी बादशाहत बढ़ा रहे हैं और तमाम युवा शराब, ताश और नए-नए नशे करके घूम रहे हैं। यह ठीक है कि कारों, कंप्यूटरों, टीवी के बाजार ने इस रोजगार में लगे सहायकों को नौकरियां दी हैं। मगर पहले से चले आ रहे कई रोजगार खत्म भी हो रहे हैं। किसान-मजदूर अपनी जमीनों से कट कर शहर में भटक रहे हैं। इनके पास न भविष्य का सहारा है न कोई सुरक्षा। यह हमारे विकास का असली चेहरा है। अमर्त्य सेन जैसे अर्थशास्त्री मान रहे हैं कि इस बार पश्चिमवाद का आक्रमण तीसरी दुनिया के देशों पर काफी घातक असर छोड़ रहा है। भारत स्वयं गांधी को भूल कर नव उपनिवेश बन रहा है और इस गुलामी का अंत दिखाई नहीं देता। ग्लोबल गांव का सपना मायावी है। एक तरह जीडीपी बढ़ रहा है दूसरी तरफ इसमें कृषि का हिस्सा घटता जा रहा है। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार विदेशी कर्ज चुकाने में ही खप जाता है। कटोरा लिए विदेश में खड़े दिखाई देते हैं- हमारा स्वाभिमान पता नहीं कहा चला गया है। अमेरिका रपट-रपट कर खड़ा हो रहा है और हम खड़े-खड़े गिर रहे हैं। विदेशी विश्वविद्यालयों से देश पाटा जा रहा है और पेट-भराऊ मूल्यहीन शिक्षा दी जा रही है। इस शिक्षा में भारत के ग्रामीण अर्थशास्त्र, ग्रामीण समाज शास्त्र को कहीं जगह नहीं है। विद्यार्थी विदेशों के पुस्तकीय ज्ञान-विज्ञान की जानकारी तो रखता है, लेकिन हमारे यहां के कृषि तंत्र, समाज तंत्र, व्यापार तंत्र आदि से अनभिज्ञ रहता है। फलत: देश- प्रेम, अतीत-इतिहास, परंपरा-संस्कृति, सभ्यता की बात उसे गाली लगती है। भारतीय भाषाओं और उनके साहित्य से उसे विरक्ति है, वह केवल अंग्रेजी के साम्राज्यवाद का नागरिक होकर रह गया है। अधिकतर बुद्धिजीवियों, प्रबुद्ध नागरिकों, राजनीतिज्ञों को जातिवाद पर केंद्रित सत्ता का खेल सिद्ध है। उन्हें इस बात की परवाह तक नहीं है कि जो विदेशी पूंजी निवेश भारत में हो रहा है वह विदेशी पूंजीपतियों के निरंतर लाभ का माध्यम बनेगा। हर क्षेत्र में उनका वर्चस्व बढ़ेगा और वर्चस्ववाद सर्वसत्तावाद का रूप ले लेगा। वही राजनीति और बाजार नीति का नियामक बन जाएगा और हम एमबीए, एमसीए की नौकरी करते रह जाएंगे। उत्तर आधुनिकता के सिद्धांतकार रह जाएंगे कि संस्कृति का कोई टिकाऊ अर्थ नहीं होगा और सभी अवधारणाओं, मूल्यों-मानकों-प्रतिमानों पर पतेला फिर जाएगा। ज्यां बोद्रिया तो अनेक तर्कों से यह सिद्ध कर रहे हैं कि छलनाओं-प्रपंचनाओं, मायावी यथार्थों का युग हर तरह की मूल वास्तविकता से मनुष्य को काट देगा। अपनी सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान की मूल वास्तविकताओं को खोकर बनी प्रतिकृतियों की यह दुनिया तर्कविहीन, अजनबी, व्यक्तिवादी संसार के मानसिक संतुलन को पागलपन में बदल कर दम लेगी। जेनेटिक इंजीनियरिंग, नव मीडिया, साम्राज्यवाद हमारी स्मृति के संदर्भों को मिटा कर बैलों की तरह खाने-पीने तक सीमित कर देंगे और हमारी ही इंद्रियां हमें पशु बना कर छोड़ देंगी जिसमें संबंधों का कोई अर्थ-संदर्भ नहीं होगा।
|
|
|
|