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समाज सेवा और राजनीति PDF Print E-mail
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Friday, 07 September 2012 11:04

शंकर शरण
जनसत्ता 7 सितंबर, 2012: बिहार के एक छोटे शहर के चाय दुकानदार ने कहा, ‘कोई लोहार सोने की चेन नहीं बना सकता। बाबा रामदेव वैद्यक तक ही ठीक थे।’ यह कोई अकेला स्वर नहीं। दरअसल, बाबा की लोकप्रियता में तेजी से ह्रास हुआ है। वे योगाभ्यास के माध्यम से लोगों को स्वास्थ्य सचेत करने में बेहद सफल हुए। टेलीविजन के माध्यम से यह करते हुए वे घर-घर पहुंच गए। योग आसनों के लाभ बताने के साथ-साथ बाबा आर्थिक बिंदुओं पर टिप्पणियां, कटाक्ष आदि भी करते थे। फिर उन्होंने विदेशी बैंकों में जमा भारतीय काले धन को निशाना बनाया। उसे वापस लाने की मांग की। धीरे-धीरे वे भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष पर आ गए। इस बीच अण्णा हजारे भी लोकपाल विधेयक लाने का आंदोलन शुरू कर चुके थे। दोनों की धार भ्रष्टाचार-विरुद्ध थी। दोनों को अपार जन-समर्थन भी मिला। इसके बाद वह गड़बड़ी शुरू हुई, जिसे बोलचाल में भी राजनीति ही कहा जाता है!
अण्णा और बाबा कुछ समय साथ भी दिखे। लेकिन अण्णा के कुछ सहयोगियों के विशेष वैचारिक झुकाव और ‘कौन बड़ा’ की महत्त्वाकांक्षा, अहंकार ने यह साथ तोड़ दिया। उस झुकाव में अण्णा के मंच से भारत माता की तस्वीर हटा दी गई। बाबा ने अण्णा के मंच पर नीचा भाव मिलने पर रामलीला मैदान में अपना अलग रैली-धरना शुरू किया। दूर-दूर से लोग उन्हें समर्थन देने आए। दूसरी ओर, पहली बार संसद-सत्र के दौरान अण्णा के अनशन का दबाव इतना जबर्दस्त था कि संसद में कांग्रेस के साथ कई अन्य दलों ने लोकपाल विधेयक लाने का समर्थन किया। लेकिन इधर अण्णा का अनशन टूटा, उधर नेताओं का वादा भी। बाबा की रैली को भी एक रात पुलिस ने लाठी बरसा कर तितर-बितर कर दिया। इस तरह, अण्णा और बाबा, दोनों समझ गए कि सत्ताधारी और कई दूसरे नेता भी लोकपाल बनाने या विदेशों में जमा काला धन वापस लाने का काम नहीं करने वाले। फिर दोनों ने राजनीति में उतरने की क्रमश: घोषणा कर दी। हालांकि बाबा पहले से इसका संकेत दे रहे थे।
मगर दोनों ने इसकी कोई घोषित समीक्षा नहीं की कि अब तक के उनके आंदोलन का क्या बना! स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जब उनका एक सीमित, गैर-राजनीतिक लक्ष्य-पूर्ति का प्रयास सफल न हुआ, तब राजनीति जैसे विकट कर्म में उनकी सफलता की गारंटी क्या है? कुछ अजीब बात है कि इंजीनियरिंग, डॉक्टरी, व्यापार प्रबंध आदि के लिए भी विशिष्ट अध्ययन, प्रशिक्षण की जरूरत समझी जाती है। पर राजनीति जैसे जटिल कर्म के लिए किसी शिक्षण-प्रशिक्षण की परवाह नहीं की जाती। जिसे देखो, राजनीति में कूदने की घोषणा कर डालता है।
एक कारण तो यह है कि राजनीति का मतलब केवल बड़े पद की कुर्सी पाकर हुक्म चलाना मात्र समझ लिया गया है। या फिर सारी बात केवल बंगला, अमला और रोब-रुतबा पाने की हो। तभी निठल्ले युवकों, रिटायर्ड बाबुओं से लेकर अपराधी तक राजनीति में आने के मंसूबे पालते रहते हैं। मगर जिनकी भावना शुद्ध है, वे भी राजनीति को उसी हल्केपन से लेते हैं। अण्णा और बाबा का राजनीतिक आगमन वही संकेत देता है। मगर जैसे केवल इच्छा मात्र से कोई जटिल मशीन दुरुस्त नहीं कर दे सकता, उसी तरह राजनीति भी है। बल्कि राजनीति निर्जीव मशीनें चलाने से कई गुना दुष्कर है, क्योंकि इसमें खुद सोचने-करने वाले ऐसे मानव समूहों से पाला पड़ता है, जिनकी क्रिया-प्रतिक्रिया का सदैव पहले से अनुमान नहीं किया जा सकता।
बहुत से लोग समाज सेवा और राजनीति को एक जैसा मान लेते हैं। लेकिन हर समाजसेवी या ज्ञानी भी अच्छा राजनीतिकर्मी नहीं हो सकता। नहीं तो चाणक्य को चंद्रगुप्त को और समर्थ रामदास को शिवाजी को खोजने की जरूरत नहीं पड़ी होती। यह ठीक है कि अण्णा और बाबा, दोनों ने समाजसेवा में उत्कृष्ट कार्य किया है।
मगर क्या ये राजनीति-कर्म निभाने की सामर्थ्य रखते हैं? एक उत्तर तो इसी से मिल जाता है कि दोनों भ्रष्टाचार मिटाने की लड़ाई लड़ने निकले, तो दो दिन भी साथ नहीं रह सके। अब अगर सदिच्छा के बावजूद आप दोनों एक-दूसरे को- एक अदद, वह भी सद्भावपूर्ण व्यक्ति को- साथ न रख सके, तब अनगिनत को जो पता नहीं किन-किन कारणों, इच्छाओं से आपके पीछे आने वाले हैं, आप कैसे संभालेंगे? यह तो बस एक प्रश्न है। ऐसे असंख्य जटिल प्रश्न हैं, जिनका व्यावहारिक, सक्रिय उत्तर देने की क्षमता किसी राजनेता में होनी चाहिए।
महान समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने लगभग सौ वर्ष पहले अपने प्रसिद्ध भाषण ‘राजनीति धर्म’ (पॉलिटिक्स ऐज ए वोकेशन) में कहा था, ‘राजनीति में शैतानी शक्तियां कार्य करती हैं। जो यह नहीं समझता वह दुधमुंहा बच्चा है।’ यह कहते हुए दुख होता है कि भारत में पिछले सौ वर्ष से ऐसे अनेक दुधमुंहे राजनीति में कूदते रहे हैं। वे अपनी सदिच्छा और कर्मठता आदि को ही राजनीति के लिए जरूरी आदि-अंत समझते रहे। यह बहुत बड़ी गफलत है। इसमें स्वतंत्रतापूर्व भी हमारे अनेक नेता पड़े रहे।
जब तक आप केवल समाजसेवी हैं, तब तक


आपमें निष्ठा और कर्मठता होना भर सफलता के लिए काफी है। आपका प्राय: कोई शत्रु नहीं होता। मगर राजनीति एक अलग दुनिया है। इसमें युद्ध, टकराव सतत और अनिवार्य हैं। इसलिए इसमें शत्रुओं की पूरी फौज होती है, जो कब, कैसे, किस उद्देश्य से आप पर हमला करेगी, इसका अनुमान अच्छे-अच्छे नहीं लगा पाते। बाहरी दुश्मनों, दबावों के अलावा आपके अपने लोगों में ही प्रतिद्वंद्वी, भीतरघाती आदि बनते रहते हैं। महत्त्वाकांक्षी राजनीतिकर्मी को इन सबके लिए तैयार होना पड़ता है।
इसीलिए राजनीति में केवल सद्भावना, धन या लोकप्रियता आदि के बल पर भी कूद पड़ना भोलापन है। पहली बार रामलीला मैदान में बाबा की लीला देख उनके समर्थकों को भी मायूसी हुई थी। क्योंकि उन्होंने देखा कि बाबा के पास इस मामूली-सी बात की भी कोई तैयारी न थी कि जब पुलिस आकर उनके समर्थकों को पीटेगी, तब वे क्या करेंगे! हक्के-बक्के होकर खुद भाग खड़े होने ने यही दिखाया कि बाबा के पास दूसरे पक्ष की एक सामान्य चाल का भी उत्तर न था। क्या उससे राजनीति करने की क्षमता दिखती है?
वही स्थिति अण्णा की भी है। पिछली बार अनशन और जन-समर्थन बल पर उन्होंने सत्ताधारियों से लोकपाल कानून बनाने का जैसा-तैसा आश्वासन पा लिया। मगर सत्ताधारी मुकर जाएं, तब अण्णा के पास कोई अगली तैयारी ही नहीं थी। ले-देकर फिर वही अनशन। वह भी घोषित कर हिचकिचाहट का प्रदर्शन। फिर वापस लेकर एकाएक राजनीति में कूदने की घोषणा। मगर जब आप अपने चार निकट सहयोगियों को अनुशासित रखने में सफल न हुए, तब राजनीति किनके बल पर करेंगे? जब विश्वस्त अनुयायी कहने में नहीं, तब देश-विदेश के बहुरंगे, खतरनाक शत्रुओं से कैसे निपटेंगे? लगता है, बाबा या अण्णा ने ऐसे प्रश्नों पर कभी सोचा ही नहीं है।
यह राजनीति को समाज-सेवा जैसा सरल, विशेषज्ञता-रहित कार्य समझने की वही भूल है जो सौ वर्ष पहले गांधीजी ने की थी। बाबा और अण्णा इस मामले में मोहनदास गांधी
से भिन्न नहीं
लगते। तीनों
अच्छे समाजसेवी, निष्ठावान, मगर राजनीति की क्षमता और समझ से भी कोरे। गांधी तीन दशक राजनीति में सक्रिय रहे, इससे यह बात गलत नहीं होती। राजनीति में तेरह वर्ष तो राहुल गांधी को भी हो चुके। राहुल अगर किसी और बड़े पद पर आ जाएं, और जैसे-तैसे और सत्रह वर्ष गुजार दें, तो उसे सफल राजनेता होना तो नहीं कहा जाएगा।
कुछ यही गांधीजी के साथ भी हुआ था। उन्हें दक्षिण अफ्रीका में पीड़ित भारतीयों की सेवा करने, और कुछ हद तक ट्रेड-यूनियन जैसी गैर-राजनीतिक लड़ाई का अनुभव था। उसमें भी उन्हें किसी प्रतिद्वंद्विता का दूर-दूर तक सामना नहीं करना पड़ा था। दक्षिण अफ्रीका में भारतीय लोग नितांत दुर्बल, अशिक्षित, अल्पसंख्यक और असहाय थे। उनके बीच मिस्टर गांधी जैसे नि:स्वार्थ, पढ़े-लिखे समाजसेवी का एकछत्र महत्त्व पहले दिन से स्थापित हो गया था। उसी समाज-सेवा ने गांधी को प्रसिद्धि दी।
मगर उसी प्रसिद्धि और सीमित अनुभव के बूते जब गांधी ने भारत में सीधे राजनीति में पांव रखे, वह भी  महत्त्वाकांक्षा और तानाशाही भाव के साथ, तो यह भारत के लिए भारी दुर्घटना हुई। गांधी की हत्या हो जाने और स्वतंत्र भारत की प्रथम सरकार द्वारा ही गांधी-पूजा को सरकारी नीति बना देने आदि कारणों से राजनीतिक गांधी का मूल्यांकन किया ही नहीं जाता। अगर करें तो दिखेगा कि समाजसेवी रूप में गांधी जैसे सफल थे, राजनीतिकर्मी के रूप में वैसे ही विफल हुए।
प्रथम विश्व-युद्ध में अंग्रेजों के लिए भारतीयों की सैनिक भर्ती कराने के अभियान से आरंभ कर, खलीफत की पुनर्स्थापना का विचित्र आंदोलन, आदि से होते हुए अंत में करोड़ों पंजाबियों, बंगालियों के साथ विश्वासघात करते हुए, अपनी बात से पलट कर भारत-विभाजन करवाने तक और इस बीच सत्य-अहिंसा की कोरी रट के साथ, गांधी का एक भी अभियान न सफल, न सुखद रहा। न सिद्धांत, न व्यवहार में।
मोटे तौर पर भारत में तीन दशक की गांधी राजनीति में किसी उपलब्धि का उदाहरण नहीं है। उसी बीच, तुलना में अंग्रेजों, मुसलिम लीग और जिन्ना के हाथ में कई ठोस सफलताएं हैं। इसीलिए गांधी-प्रशंसा में शब्दों, मुहावरों, भावुकता की भरमार ज्यादा रहती है, उपलब्धि उल्लेख नगण्य। क्योंकि गांधी को समाजसेवा आती थी, राजनीति नहीं। जिस अतार्किकता से भारत का विभाजन हुआ और जिस विचित्रता के साथ- कि जिस समस्या के समाधान के लिए देश तोड़ दिया जाए और लाखों लोगों के साथ विश्वासघात करते उनकी बलि दे दी जाए, वही समस्या यथावत पाल कर रख ली जाए- उसका विश्व इतिहास में कोई सानी नहीं है।
लगता है, बाबा और अण्णा भी गांधीजी के ही नक्शे-कदम पर चल रहे हैं। मानो अच्छी-अच्छी बातें कहना, उपदेश देना ही राजनीति हो। कि उन बातों को लागू कर दिखाना किसी और का काम हो। जब दिख रहा है कि भ्रष्ट नेताओं का जमावड़ा लोकपाल नहीं बनाता, तो उसी से मांग करना, फिर मांग पूरी न होने पर उसे बुरा-भला कहना, यह कैसी रणनीति है? बाबा और अण्णा की राजनीति भी इसी रोने-धोने का दुहराव होगी।

 
 

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