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अजेय कुमार जनसत्ता 10 जनवरी, 2013: पिछले महीने के मध्य में दो दुर्भाग्यपूर्ण और नृशंस घटनाओं ने साधारण जन का ध्यान आकर्षित किया।
पहली घटना चौदह दिसंबर को अमेरिका में हुई, जब एक बीस वर्षीय लड़के एडम लांजा ने पहले अपनी मां को गोली मारी और फिर एक घंटे के भीतर एक स्कूल में सत्ताईस लोगों को अपनी गोलियों का निशाना बनाया जिनमें बीस बच्चे थे और जिनकी उम्र छह वर्ष के आसपास थी। दूसरी घटना सोलह दिसंबर को दिल्ली में हुई, जब निम्न मध्यवर्ग की एक बहादुर लड़की सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई और लगभग दो सप्ताह तक मौत से लड़ते-लड़ते उसने आखिर में दम तोड़ दिया। सत्रह दिसंबर से ही लाखों लोग देश के कोने-कोने में सड़कों पर उतरने शुरू हो गए और उन्होंने अपने आक्रोश का इजहार किया। लगभग हर राजनीतिक पार्टी और हर संगठन को इस मुद््दे पर कहना पड़ा कि देश में क्या-क्या उपाय करने चाहिए ताकि महिलाएं सुरक्षित हों। हर टीवी चैनल ने इसकी भर्त्सना की और बहस चलाई। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति आरोपियों से सख्ती से निपटने के लिए वचनबद्ध होने का इजहार करते दिखे। यह बहस जारी है। अगर आप पहली घटना, यानी अमेरिका में बच्चों के कत्लेआम के बाद की स्थिति देखें तो वहां उसे एक खबर की तरह प्रसारित किया गया। कहीं कोई जनाक्रोश नहीं उमड़ा। अखबारों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सुर्खी एकाध दिन ही बनी। जीवन बहुत जल्दी सामान्य गति पर लौट आया। अभिभावकों ने कहीं कोई बयान दिया भी तो उस पर किसी ने खास तवज्जो नहीं दी। बराक ओबामा ने जरूर एक भावुकता भरा बयान दिया। वे उस स्कूल में गए और मृतकों के परिवारों के दुख में शामिल हुए। उम्मीद की जा रही थी कि राष्ट्रपति संवेदनाओं के इजहार तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि कुछ ठोस कदम भी उठाएंगे। आखिरकार वे जानते हैं कि अमेरिका में तीस करोड़ की आबादी है और रजिस्टर्ड बंदूकों की संख्या इकतीस करोड़ है। दुनिया में बंदूकों से लैस सबसे अधिक जनसंख्या अमेरिका में है। वहां संविधान के अनुसार शॉटगन और राइफल खरीदने की न्यूनतम आयु अठारह वर्ष है। यही कारण है कि हमारे यहां एक सामान्य आदमी जब अपने बैग में हाथ डालता है तो उसे एक कंघा, पेन या मोबाइल मिलता है, पर एक अमेरिकी का हाथ अपने बैग में सबसे पहले बंदूक पर जाता है। और वह अपनी तथाकथित सुरक्षा के लिए सबसे पहले उसी का इस्तेमाल करता है। आखिरकार यह स्थिति कैसे विकसित हुई, और आज भी, तमाम हादसों के बाद, वहां की नेशनल राइफल एसोसिएशन अपनी मनमानी करती है। अमेरिका में उसकी राजनीतिक ताकत इतनी ज्यादा है कि राष्ट्रपति तक यह कह कर चुप हो जाते हैं कि ‘हमें इन हादसों को भविष्य में होने से रोकने के लिए कार्रवाई करनी होगी।’ वर्ष 2009 में यानी ओबामा के ही कार्यकाल में जितने कदम बंदूक-विरोधी उठाए गए उससे तीन गुना बंदूक के समर्थन में कानून पास हुए। विशेषज्ञों का मानना है कि तब से यह क्रम तेज हुआ है। अमेरिका के पचास में से चालीस राज्यों में यह कानून है कि किसी भी ऐसे व्यक्ति को, जो छिपा कर बंदूक ले जाना चाहता है, परमिट मिल सकता है। दिसंबर 2011 में बंदूक को छिपा कर ले जाने की कानूनी इजाजत उत्तरी कैरोलीना राज्य में दी गई। पहले इसे खुले में, सबके सामने ले जाना होता था। मिसीसिपी राज्य में छिपा कर बंदूक ले जाने की इजाजत कॉलेज परिसरों और अदालतों में दे दी गई। ओहियो में तो रेस्तरां, बार और खेल के मैदानों तक में इसकी इजाजत है। 2010 में इंडियाना में निजी कंपनियां अपने कर्मचारियों को इसकी इजाजत देती हैं कि वे कंपनी के परिसर में खड़ी कारों में अपनी बंदूकें रख सकते हैं। न्यू हैम्पशायर और उसके साथ कई राज्यों ने तो सरकारी समारोहों तक में हथियार ले जाने की छूट दे दी है। बंदूक छिपा कर ले जाने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि हर व्यक्ति यह सोच सकता है कि दूसरे के पास बंदूक है, जो उसे नजर नहीं आ रही है। इसलिए हर कोई समझता है कि बंदूक ले जाने में ही समझदारी है। अमेरिका में बलात्कार की घटनाओं को देखते हुए (कहा जाता है कि वहां हर मिनट एक बलात्कार होता है) बड़ी संख्या में औरतें बंदूक रखने की पक्षधर हैं। इसी तरह युवाओं को भी इसमें कोई आपत्ति नहीं दिखती। खेल के मैदानों में, जहां दर्शक प्राय: टीमों के आधार पर बंट जाते हैं, कभी भी भावनाएं भड़क उठती हैं और बंदूक निकाल लेना आम बात है। प्राय: लोग जब पूरे परिवार के साथ छुट््िटयां मनाने जाते हैं तो घर का मुखिया बंदूक साथ रखना कभी नहीं भूलता। एक अमेरिकी परिवार का मुखिया स्वयंभू सिपाही की भूमिका निभाता है। यह उस देश का हाल है, जहां पुलिस व्यवस्था इतनी सक्षम है कि अगर 911 नंबर पर फोन लगाएं तो पुलिस तीस सेकेंड के भीतर हाजिर हो जाती है। फिर भी राज्य-व्यवस्था पर भरोसा इतना कम है। यह व्यक्तिवादी सोच का ही परिणाम है कि कोई व्यक्तिदूसरे पर भरोसा नहीं करता। कई परिवारों में औरतें अपनी बंदूक साथ रख कर सोती हैं, विशेषकर तब जब पति से झगड़ा हुआ हो। अमेरिका के कुछ राज्यों ने जब खेल के मैदानों, होटलों और पार्कों में बंदूक ले जाने की मनाही की तो बंदूक लॉबी ने इसे अदालत में चुनौती दी। लिहाजा, कई जगह, जिन्हें पहले ‘बंदूक मुक्त’ क्षेत्र घोषित किया गया था, आज वहां बंदूक ले जाने की अनुमति है। 2008 में कोलंबिया राज्य बनाम हेलर और 2010 में शिकागो बनाम मैकडोनाल्ड मामलों में अमेरिका
की सर्वोच्च अदालत ने अमेरिकियों की आत्मरक्षा के लिए हथियार रखने के संवैधानिक अधिकार का तर्क देकर बंदूक-विरोधी आंदोलन को क्षति पहुंचाई है। आज स्थिति यह है कि शिकागो में छोटी बंदूक से हर दिन एक मौत जरूर होती है। कनेक्टीक्ट के न्यूटाउन के सैंडी हुक प्राथमिक विद्यालय में जब एडम लांजा ने गोली चलाई और बच्चे मारे गए, तब कई अध्यापक सामने आए और उनमें से एक अध्यापिका विकी सोटो, जिसकी उम्र केवल सत्ताईस वर्ष थी, बच्चों को अपने पीछे छिपाते हुए मारी गई। ऐसी हर घटना को दो तरह देखा जाता है। बंदूक-विरोधी अभिभावकों का मानना है कि बंदूकधारी के पास तीन बंदूकें होना खतरनाक था और ये बंदूकें भी नवीनतम टेक्नोलॉजी की थीं। प्रति सेकेंड पांच गोलियां तीन सौ पचास मीटर प्रति सेकेंड की गति से इन बंदूकों से निकल सकती थीं। लिहाजा, कई बच्चों के छलनी जिस्मों पर गोलियों के कई निशान देखे गए। लांजा की मां ने ही गोलियां चलाने का प्रशिक्षण अपने बेटे को दिलवाया था। उसी प्रशिक्षण का नतीजा था कि सत्ताईस बच्चे और अध्यापक मौत के घाट उतार दिए गए। इसी घटना का दूसरा तर्क बंदूक-लॉबी की तरफ से आया। उनका मानना था, बल्कि उन्होंने मीडिया में यह प्रचारित करवाया कि अगर अध्यापकों के पास अपनी-अपनी बंदूकें होतीं तो यह नौबत न आती। अमेरिका में कानून है कि अगर कोई व्यक्तिजबर्दस्ती आपके घर में घुसने की कोशिश करे तो आप उस पर गोली चला सकते हैं। फ्लोरिडा यूनीवर्सिटी के एक अपराध-विशेषज्ञ के प्रायोजित अध्ययन के अनुसार प्रतिवर्ष पचीस लाख अपराध-बलात्कार और डकैती आदि अमेरिका में केवल इसलिए नहीं होते, क्योंकि लोगों के पास आत्मरक्षा के लिए बंदूकें हैं। ऐसे अध्ययनों को बंदूक लॉबी द्वारा खूब प्रचारित किया जाता है। कुछ माह पहले अमेरिका की एक संस्था- जिसका बड़ा दिलचस्प नाम ‘अमेरिका के बंदूक-स्वामी’ है- के कार्यकारी निदेशक और ‘नेशनल राइफल एसोसिएशन’ के सदस्य लैरी प्रैट ने डेनवर (कोलोरेडो) में स्थित एक सिनेमा हॉल में चार बंदूकों से लैस एक व्यक्तिजेम्स होल्मस द्वारा अंधाधुंध गोलियां चलाने के बाद बीबीसी को एक साक्षात्कार दिया, जिसमें उन्होंने कहा, ‘यह दुखद है कि उस सिनेमा हॉल को बंदूक-मुक्तघोषित किया हुआ था। इसलिए दर्शकों में किसी के पास बंदूक नहीं थी। ऐसा ही एक बार एक चर्च के बाहर भी होने वाला था। एक व्यक्तिने चर्च के पार्किंग-स्थल में अपनी कार दूसरी किसी कार में भिड़ा दी, और फिर उसने बंदूक निकाल कर एक औरत को वहीं ढेर कर दिया। चर्च के लोग बाहर निकल रहे थे, उनमें से एक ने अपने पास बंदूक छिपा कर रखी थी। उसने जब औरत के हत्यारे को देखा तो फौरन गोली मार दी और वह वहीं खत्म हो गया। इस तरह एक बड़ा गोलीकांड होते-होते बचा।’ प्रैट से पूछा गया कि क्या ओबामा या रोमनी बंदूक-कानूनों को सख्त कर सकते हैं, तो उनका जवाब था, ‘सख्त करने के बजाय उन्हें ढीला करने की जरूरत है। हमारे यहां सामूहिक हत्याएं तभी हुर्इं जब अपराधी को पता था कि उसे निहत्थे पीड़ित मिलेंगे और प्राय: अपराधी की राय ठीक निकली।’ यानी उनके अनुसार हर आदमी को गोली चलाने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। पिछले कुछ वर्षों में, विशेषकर जब से 9/11 की घटना हुई है और जब से अमेरिकी सेना का हस्तक्षेप इराक, अफगानिस्तान, लीबिया, पाकिस्तान आदि देशों में बढ़ा है, युद्ध का एक माहौल पैदा किया गया है। साधारण अमेरिकी नागरिक मानने लगा है कि न्यूयार्क में स्थित दो बड़े टावरों को ध्वस्त करने वाली काली शक्तियां हर जगह मौजूद हैं। कहीं कुछ भी कभी भी हो सकता है। हाल ही में, एक सर्वेक्षण में कहा गया है कि बहत्तर प्रतिशत अमेरिकी मानते हैं कि उनकी सुरक्षा खतरे में है। ‘इस्लामोफोबिया’ का प्रचलन आम है। कुछ देर के लिए सोचें कि अगर एडम सांजा के स्थान पर स्कूल में गोलियां चलाने वाला कोई मुहम्मद या खान होता तो क्या होता! उसे आतंकवादी कहा जाता, उसका संबंध अल-कायदा या तालिबान से खोज लिया जाता। अगर एडम सांजा खुद को गोली न मारता तो हो सकता है उसका साक्षात्कार लिया जाता, जिसे बड़े-बड़े चैनल प्रसारित करते, उसे नशेड़ी या ‘मानसिक रूप से बीमार’ घोषित किया जाता, उसके परिवार के सदस्यों से पूछा जाता कि उनका बेटा कहां गलत हुआ और क्यों। पर किसी खान या मुहम्मद से इस तरह के सवाल न पूछे जाते। इसी तरह कुछ माह पहले, जब ओक क्रीक में गुरद्वारे में गोलियां चलीं तो अमेरिकी मीडिया ने उतना उत्साह नहीं दिखाया। उसे सिखों के लिए शोक का विषय बतलाया गया, न कि सभी अमेरिकियों के लिए। एक कारण यह भी था कि उन दिनों ओलंपिक खेल चल रहे थे। दर्शकों के मनोरंजन में खलल डालना मीडिया दिग्गजों को ठीक नहीं लगा। कहा जाता है कि नेशनल राइफल एसोसिएशन के विरोध के कारण डेमोक्रेट उम्मीदवार अल गोर 2000 में चुनाव हार गए थे। इस बार भी नेशनल राइफल एसोएिसशन ने राष्ट्रपति चुनाव में ओबामा और रोमनी के लिए कई लाख डॉलर खर्च किए। लिहाजा, ओबामा कभी बंदूक-कानूनों पर किसी बहस में नहीं पड़ते। रोमनी ने तो पिछले साल अप्रैल में नेशनल राइफल एसोसिएशन की सभा को भी संबोधित किया था। अमेरिका में बंदूक-संस्कृति पनप रही है। लोगों ने अब गोलीकांडों को नियति-सा मान लिया है। बीते साल शिकागो में चार सौ पचीस लोग बंदूक की हिंसा के शिकार हुए जिनमें एक सौ सत्रह बच्चे थे। सैंडी हुक के गोलीकांड के बाद भी, एक सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग आधे लोग बंदूक-कानूनों में कोई बदलाव नहीं चाहते। हिंसा की इस मानसिकता को दुनिया भर में फैलने से रोकने की सख्त जरूरत है।
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